हम तो डूबेंगे, तुम्हें भी ले डूबेंगे

खुद की उपेक्षा और पायलट को आगे बढ़ते देखना गहलोत को बर्दाश्त नहीं, शीर्ष पर रहे राजनीतिक क्षत्रप उतार आने पर बौखला जाते हैं
*ओम माथुर*
      जब किसी राज्य में कोई राजनीतिक क्षत्रप लगातार शीर्ष पर रहता है, तो उसे ये बर्दाश्त नहीं होता है कि कोई उसे वहां से हटा दें। लेकिन जब ऐसा मौका आता दिखता है,तो ऐसा शख्स हम तो डूबेंगे,तुम्हें भी ले डूबेंगे पर उतर आता है। भले ही इससे खुद के साथ ही पार्टी का भी नुकसान हो। राजस्थान में अभी यही हालत पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की है। करीब 50 साल उन्होंने सत्ता और कांग्रेस संगठन में पदों का सुख भोगा। लेकिन नीयत है कि भरती ही नहीं है। राजनीतिक रूप से बेहद चतुर और चालाक गहलोत हमेशा दूसरे कांग्रेसी दावेदार नेताओं का हक मार कर मुख्यमंत्री बने और कभी भी सत्ता में रहते हुए जब विधानसभा चुनाव हुए तो वह पार्टी को जीत नहीं दिला सके।
ओम माथुर

सत्ता और संगठन में प्रभावी रहते हुए उन्होंने अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने से वरिष्ठ कई नेताओं को निपटाने वाले गहलोत को अगर उनके बेटे की उम्र का कोई नेता चुनौती दे और उन्हें लगे कि वह अब उनका स्थान लेने जा रहा है, तो जाहिर है गहलोत बर्दाश्त कैसे करें। सत्ता के बगीचों में रहने वाले नेताओं को जब राजनीतिक बियाबान नजर आता है,तो वह घबरा जाते हैं और अभी अशोक गहलोत इसी घबराहट का शिकार है। उन्हें यह मंजूर नहीं हो रहा है कि सचिन पायलट उनके रहते राजस्थान कांग्रेस में किसी महत्वपूर्ण पद पर आसीन हो और जैसे ही इस बात की उम्मीद बनने लगी कि पायलट प्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष बनाए जा सकते है, गहलोत ने एक बार फिर मानेसर का पिटारा खोल दिया। बिना किसी संदर्भ के, बिना किसी जरूरत और बिना किसी मौके के।

      गहलोत ने दावा किया कि सितंबर,2022 की घटनाएं पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत नहीं थी। बल्कि पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावनाओं को लेकर पार्टी विधायकों का विरोध था, क्योंकि तब सरकार बचाने के लिए जो सौ विधायक उनके साथ कई दिन होटलों में रुके थे,वह चाहते थे कि पायलट के अलावा उन सौ में से किसी को भी मुख्यमंत्री बना दिया जाए। उस समय कांग्रेस विधायक दल की बैठक का बहिष्कार कर गहलोत समर्थक विधायक शांति धारीवाल के घर जुटे थे और पर्यवेक्षक बनकर आए मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन को बैरंग लौटना पड़ा था। तब कहा गया था कि अशोक गहलोत को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सचिन पायलट को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। तब इस घटनाक्रम को आलाकमान के खिलाफ बगावत माना गया था। लेकिन अब गहलोत इसे अपने खिलाफ साजिश बताते हुए छवि को नुकसान पहुंचाने की बात कह रहे हैं।
    पायलट और गहलोत में कभी भी नहीं बनी। गहलोत जहां सोनिया गांधी के करीबी माने जाते थे,वहीं राहुल गांधी पायलट को पसंद करते थे। लेकिन तब सोनिया की पार्टी पर पकड़ थी और अशोक गहलोत को कांग्रेस का बड़ा फाइनेंसर भी माना जाता था। इसलिए वह गांधी परिवार के ज्यादा करीब थे। 2018 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और सत्ता में लौटी। लेकिन गहलोत ने साम दाम दंड भेद अपनाकर सीएम पद पर कब्जा कर लिया। इसके बाद दोनों के संबंध और बिगड़ गए और 2020 में गहलोत ने पायलट के लिए निकम्मा और नाकारा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। हालांकि पायलट ने कभी भी खुले मंच से गहलोत के शब्दों का जवाब नहीं दिया। लेकिन भीतर ही भीतर वह अपने गुट को राजस्थान में मजबूत करते रहे और आज राजस्थान के अधिकांश जिलों में गहलोत पायलट का अलग-अलग गुट है। कांग्रेस पिछले सात आठ सालों से दोनों के मतभेदों के बीच चल रही है। लेकिन पिछला विधानसभा चुनाव हारने के बाद गहलोत को कांग्रेस में कोई अहमियत नहीं मिल रही है। यही उनकी पीड़ा का असली कारण है। ऐसा पहली बार है जब गहलोत ढाई साल से कांग्रेस संगठन में बिना किसी पद के हैं। जबकि पायलट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव है
      सवाल ये है कि अचानक गहलोत को मानेसर कांड फिर क्यों याद आ गया। अचानक क्यों उन्हें अपनी राजनीतिक छवि की चिंता होने लगी। अचानक क्यों उन्होंने पायलट पर फिर अंगुली उठा दी। इसका जवाब यही है कि राजस्थान में पायलट का कद बढ़ने वाला है और यह गहलोत को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। लेकिन इस बार लगता है आलाकमान भी उनकी सुनने को तैयार नहीं है। पिछले दिनों राहुल गांधी ने पुष्कर में हुए कांग्रेस के मंथन शिविर में पीसीसी अध्यक्ष डोटासरा और विधानसभा में विपक्ष के नेता टीकाराम जूली की तारीफ थी। साथ ही पायलट को भी महत्व दिया था। जबकि गहलोत राहुल गांधी को किशनगढ़ एयरपोर्ट पर रिसीव करने के बाद पुष्कर आने की बजाय वापस जयपुर लौट गए थे। तब भी ये चर्चा चली थी कि क्या राहुल गांधी, गहलोत से नाराज है। गहलोत के बयान के तीन दिन बाद भी उन्हें इस बार अपने समर्थक नेताओं का ही समर्थन नहीं मिल रहा है। इसलिए वह खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। माना जा रहा है कि अब गांधी परिवार को गहलोत पर भरोसा नहीं रहा। साथ ही राहुल गांधी अब कांग्रेस में ज्यादा मजबूती और स्वतंत्रता के साथ फैसला ले रहे हैं। कर्नाटक में सफलतापूर्वक सीएम बदलवाकर उन्होंने खुद की कांग्रेस पर पकड़ को साबित कर दिया है।
   अशोक गहलोत के बयान को भाजपा ने मौके की तरह लपका है। इस बयान से जो कांग्रेस में फूट जाहिर हुई उसका पार्टी आने वाले निगम और पंचायत चुनाव में लाभ उठाना चाहेगी। जिसके लिए अभी तक पार्टी को यह फीडबैक मिल रहा है कि इन दोनों चुनाव में भाजपा को झटका लग सकता है। शायद इसीलिए वह अदालत के आदेश के बावजूद इन चुनावों को टालने के तरीके ढूंढती रही है। भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ ने साफ कहा कि पायलट को आज भी गहलोत बच्चा समझते हैं और वह उन्हें कभी भी नुकसान पहुंचाने का मौका नहीं छोड़ते। सवाल ये भी है कि क्या कांग्रेस आलाकमान अशोक गहलोत को पूरी तरह उपेक्षित कर राजस्थान में कुछ हासिल कर सकता है? ऐसे में गहलोत अगर खुलकर मैदान में आ गए तो कांग्रेस को राजनीतिक रूप से नुकसान ही उठाना पड़ेगा। जाहिर है पायलट अध्यक्ष बन भी गए ,तो भी राजस्थान में कांग्रेस गुटबाजी से आसानी से आजाद होगी नहीं। क्योंकि जिस तरह का पायलट का व्यवहार है,वह गहलोत से जुड़े नेताओं को ना तो मुख्यधारा में आने देंगे और ना अपने आसपास फटकने देंगे।

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