*फूलों का बिखरना तो तय था लेकिन*
*कुछ इसमें हवाओ की सियासत बहुत थी*
*ममता बनर्जी की तृणमूल या फूल की पत्तियां के बिखरने पर परवीन शाकिर का उक्त शे’र कुछ इस तरह मानस में कौंधता है गोया शायरा ने इसी मौके के लिए यह कहा हो।* *ममता के साथ जो क्या हुआ या हो रहा है, वह बिल्कुल अपेक्षित था क्योंकि हर अतिवाद अंततोगत्वा इसी नियति का शिकार होता है।*
*यहां ममता से बड़ा सवाल उन मतदाताओं का है, जो पिछले पंद्रह वर्ष से उस पर विश्वास कर रहे थे और इस बार भी भले ही कम प्रतिशत में सही, लेकिन अपना विश्वाश व्यक्त किया था। यह विश्वाश ममता के साथ उस विचार के प्रति प्रतिरोध या असहमति भी थी, जो अपने प्रभाव से एक जीती-जागती राजनीतिक पार्टी को उसी की कब्र में दफन कर रहा है। मजेदार बात कि ममता की पार्टी के जिन सांसदों /विधायकों पर भ्रष्टाचार, अतिवाद के आरोप है वे सब उन्हीं आरोपों का संरक्षण लेकर दूसरे दल में जाकर मंत्री/मुख्यमंत्री बन रहे हैं।*
*राजनीति का यह परिहास आज के समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है।*
*इतना निवेदित करना जरूरी समझता हूँ कि मुझ सहित एक बड़ा वर्ग ना ममता बनर्जी का वोटर है और ना ही प्रशंसक..।* *लेकिन उसका मैदान में निर्भीकता से लड़ते हुए दिखाना एक अदृश्य आश्वस्ति देता था .।*
*महत्व इस बात का नहीं है कि वे अपने विधायकों, सांसदों को संभाल नहीं पाई या लोकप्रियता को समझ नहीं पाई या फिर राजनीति के अंधेरे में अपना अलग सूरज उगाती रही। सवाल स्वार्थ, डर या मजबूरियां से पाला बदलते राजनेताओं का भी नहीं है । *सवाल है उस परंपरा का है,जहां विजित सब कुछ है और पराजित के लिए एक बड़ा शून्य।*
*यूं यह सब पहले भी होता रहा है किंतु इन दिनों जिस बेशर्मी और नग्नता के साथ हो रहा है, वह पूरे समाज की शुचिता को भंग कर रहा है। यह घटिया आ तर्क बल पा रहा है कि प्यार और युद्ध में सब जायज है..हत्या से लेकर लूट तक।*
*पिछले कई दशकों से राजनीति में बड़ी के सापेक्ष छोटी बुराई को चुनने की लोकतांत्रिक मजबूरी हमारा सच रही है। लेकिन अब सारी बुराइयां एक बड़ी बुराई में समहित हो रही है। ठीक वैसे ही जैसे नदियां समंदर में जाकर अपना आस्तित्व खो देती है और उनका समूचा मीठा जल खारा होकर धरती का बड़ा भाग घेर लेता है। एक मात्र बुराई के साथ छोटी बुराई ना चुन पाने का विकल्प विचार के शेष रास्ते ना केवल बंद कर देता है, बल्कि बुराई के असीम विस्तार की संभावनाएं निरंकुशता को वैधता देने लगती हैं, जैसे कि बुलडोजर से टूटते मकान हो या कुचला गया कोई आंदोलन एक बड़े जनमानस को सुख देने लगा है।*
*यह भी ठीक है कि अवसरवाद के गारे से बनी दीवारें किसी हल्के धक्के से गिर जाती हैं। यह भी उतना ही सच है कि उन्माद के तूफान हर आंगन में तबाही मचाते हैं। इस अवसर परएक बार फिर नवाज देवबंदी का शे’र याद आता है -*
*जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है*
*आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है*
*उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया*
*मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है अगला नम्बर आपका है*
*रास बिहारी गौड़*