मेवाड़ का सूर्य पुत्र जिसने कभी अधीनता स्वीकार नहीं की

प्रातः स्मरणीय वीरशिरोमणि महाराणा प्रताप की जयन्ती पर विशेष –

महाराणा प्रताप का नाम लेते ही हमारे सामने स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी राष्ट्र्वीर की भव्य मूर्ति आ जाती है। प्रातः स्मरणीय प्रणवीर प्रताप ने अपनी कष्ट सहिष्णुता, त्याग, संगठन शक्ति, प्रतिज्ञा पालन, देश प्रेम, कुशल नेतृत्व और अपार वीरता से इतिहास में एक उज्जवल, अनुकरणीय आदर्श की स्थापना की है, जिससे ये विश्व में स्वाधीनता प्रेम के एक चिर प्रकाशमान प्रतीक बन गये है। भारतीय इतिहास में महाराणा प्रताप, स्वाधीनता संग्राम के मूल प्रेरक माने जाते है।

मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया का नाम इतिहास में वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया, अंततः अकबर महाराणा प्रताप को अधीन करने में असफल रहा।

वीरशिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ में ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, विक्रम संवत 1597 को हुआ जो इस वर्ष 17 जून को आयेगी, इसी दिन प्रताप जयन्ती धूमधाम से मनायी जायेगी। महाराणा प्रताप के पिता का नाम उदयसिंह तथा माता का नाम महारानी जयवन्ती बाई था। उदयसिंह महाराणा सांगा के सबसे छोटे पुत्र थे।

राणा उदयसिंह की दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। प्रताप के उत्तराधिकारी होने पर इसके विरोध स्वरूप जगमाल अकबर के खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक में 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में हुआ था, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुभलगढ़ दुर्ग में हुआ, दुसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेन भी उपस्थित थे। स्मरण रहे कि पन्नाधाय ने अपने पुत्र 14 वर्षीय चंदन का बलिदान देकर सत्ता लिप्सा में डूबे हुए बनवीर से उदयसिंह की रक्षा की थी। कालांतर में उदयसिंह का विवाह पाली के अखेराज सोनगरा की पुत्री जयवन्ती बाई के साथ हुआ। संयोग से इसी समय उदयसिंह ने बनवीर को हराकर चितौड की राजगद्दी को प्राप्त किया तथा मेवाड के नए महाराणा बने।

प्रताप अपनी मां जयवन्ती बाई के पास कुम्भलगढ में रह कर शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने लगे। बचपन से ही उनमें न केवल हिन्दू संस्कृति अपितु राष्ट्र् भक्ति के संस्कारों का बीजारोपण किया। कुम्भलगढ में अपने निवास के दौरान प्रताप निकट रहने वाले भील समाज के बालकों के साथ खेलने लगे थे, भील समाज में वे कीका के नाम से लोकप्रिय हो गए थे। राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की थी। महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथय यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए। जिसमें सर्वप्रथम में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह, भगवानदास तथा राजा टोडरमल प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।

हल्दीघाटी का युद्ध (1576)

महाराणा प्रताप के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य अकबर की सेना (जिसका नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह ने किया था) के साथ हुआ था। महाराणा प्रताप के पास मुगलों की विशाल सेना के मुकाबले बहुत छोटी सेना थी, जिसमें उनके वफादार भील योद्धा भी शामिल थे। इस युद्ध में उनके प्रिय घोड़े चेतक ने अदम्य साहस दिखाया और वीरगति को प्राप्त हुआ। प्रताप को युद्ध भूमि से सुरक्षित निकालने के लिए झाला मानसिंह ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था।

भील सेना के सरदार, पानरवा के ठाकुर राणा पूंजा सोलंकी थे। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी। उदयपुर के पास गोगुन्दा के निकट हल्दीघाटी में एक संकरा पहाड़ी दर्रा था। महाराणा प्रताप ने लगभग 3,000 घुड़सवारों और 400 भील धनुर्धारियों के बल को मैदान में उतारा। मुगलों का नेतृत्व आमेर के राजा मान सिंह ने किया था, जिन्होंने लगभग 5,000-10,000 लोगों की सेना की कमान संभाली थी। इस युद्ध में मेवाड़ के महाराणा प्रताप विजय हुए थे।

हल्दीघाटी के युद्ध में शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया और महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। हल्दीघाटी के युद्ध में और दिवेर और छापली की लड़ाई में महाराणा प्रताप को सर्वश्रेष्ठ राजपूत राजा और उनकी बहादुरी, पराक्रम, चारिर्त्य, धर्मनिष्ठा, त्याग के लिए जाना जाता था। मुगलों के सफल प्रतिरोध के बाद, उन्हें हिंदुशिरोमणी माना गया।

छापामार युद्ध और दिवेर का विजय (1582)

हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और अरावली की पहाड़ियों में रहकर छापामार (गुरिल्ला) युद्ध की रणनीति अपनाई। 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ति हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने दिवेर के युद्ध को ‘‘मेवाड़ का मैराथन‘‘ कहा था। इसके बाद मुगलों का मेवाड़ पर दोबारा आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ।

ज्यों महाराणा प्रताप छप्पन के पहाड़ी स्थानों में बस्तियां बसाने और मेवाड़ के समतल भागों में खेतों को उजाड़ने में व्यस्त थे त्यों अकबर दिवेर के मार्ग से उत्तरी सैनिक चौकियों का पोषण भेजने की व्यवस्था में संलग्न रहा। प्रताप की नीतियों छप्पन की चौकियों को हटाने में तथा मध्यभागीय मेवाड़ की चौकियों को निर्बल बनाने में अवश्य सफल हो गये, परंतु दिवेर का केंद्र अब भी मुगलों के लिए सुदृढ़ था।

इस पृष्ठभूमि में दिवेर का महाराणा प्रताप का व मुगलों का संघर्ष जुड़ा हुआ था। इस युद्ध की तैयारी के लिए प्रताप ने अपनी शक्ति सुदृढ़ करने की नई योजना तैयार की। महाराणा ने गुजरात और मालवा की ओर अपने अभियान भेजना आरंभ किया और साथ ही आसपास के मुगल अधिकार क्षेत्र में छापे मारना शुरू कर दिया। इसी क्रम में भामाशाह ने, जो मेवाड़ के प्रधान और सैनिक व्यवस्था के अग्रणी थे, मालवे पर चढ़ाई कर दी और वहां से रुपए और अशर्फियां दंड में लेकर एक बड़ी धनराशि इकट्ठी की। इस रकम को लाकर उन्होंने महाराणा को चूलिया ग्राम में समर्पित कर दी। इसी दौरान जब शाहबाज खां निराश होकर लौट गया था, तो महाराणा ने कुंभलगढ़ और मदारिया के मुगली थानों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इन दोनों स्थानों पर महाराणा का अधिकार होना दिवेर पर कब्जा करने की योजना का संकेत था।

 महाराणा की फौज दिवेर पहुंची तो मुगल दल में भगदड़ मच गई। मुगल सैनिक घाटी छोड़कर मैदानी भाग की तलाश में उत्तर के दर्रे से भागने लगे। महाराणा ने अपने दल के साथ भागती सेना का पीछा किया। घाटी का मार्ग इतना कंटीला तथा ऊबड़-खाबड़ था कि मैदानी युद्ध में अभ्यस्त मुगल सैनिक विथकित हो गए। अन्ततोगत्वा घाटी के दूसरे छोर पर जहां कुछ चौड़ाई थी और नदी का स्त्रोत भी था, वहां महाराणा ने उन्हें जा दबोचा। दिवेर थाने के मुगल अधिकारी सुल्तानखां को कुं. अमरसिंह ने जा घेरा और उस पर भाले का ऐसा वार किया कि वह सुल्तानखां को चीरता हुआ घोड़े के शरीर को पार कर गया। घोड़े और सवार के प्राण पखेरू उड़ गए। महाराणा ने भी इसी तरह बहलोल खां और उसके घोड़े का काम तमाम कर दिया। एक राजपूत सरदार ने अपनी तलवार से हाथी का पिछला पांव काट दिया। इस युद्ध में विजयश्री महाराणा के हाथ लगी।

अंतिम समय और विरासत

 अपने जीवन के अंतिम वर्षों में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के अधिकांश हिस्सों (जैसे उदयपुर और कुंभलगढ़) को वापस जीत लिया था। 1579 से 1585 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुगल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उलजा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 ई. में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर दिया। महाराणा जी की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरन्त ही उदयपुर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।

महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया, उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था, पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लम्बी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अन्त 1585 ई. में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परन्तु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में चावण्ड में उनकी मृत्यु हो गई।

महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सिधारने के बाद आगरा ले आया। एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए। प्रताप की मृत्यु पर अकबर ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, बल्कि अपने सिद्धान्तों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था, जब की एक तरफ महाराणा प्रताप जी थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जानता था की महाराणा प्रताप जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आँसू आ गए।

महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छन्द में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है-

अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी

गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी

नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली

न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली

गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी

निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी

महाराणा प्रताप के संबंध में जनमानस में अपार आदर सम्मान था, उनके कृतित्व के संबंध में श्रृद्धा और विश्वास था। एक बार अकबर के दरबार में मेवाड से आए भाट ने प्रताप के द्वारा प्रदत्त केसरिया पकडी उतार कर बादशाह को सलाम किया, इस बेअदबी का कारण पूछने पर उसने कहा, ‘‘हुजूर यह पगडी महाराणा प्रताप ने मेरे सिर पर रखी है, जब उनका सर ही आपके सामने नहीं झुका तो उनके द्वारा बनाई पगडी को मैं कैसे झुका सकता था।‘‘

प्रातः स्मरणीय, वीर शिरोमणि, हिंदुआ सूर्य महाराणा प्रताप ने अपने तपस्वी, वीरव्रती जीवन द्वारा मेवाड ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से समस्त भारत का डंका बजाया और इसी लिए उनके लिए लिखा गया है कि –

माई ऐहडा पूत जण, जेहड़ा राणा प्रताप।

अकबर सूतो ओझके, जाण सिरहाने सांप ।।

 

श्रीमती संतोष शर्मा

 स्वतंत्र पत्रकार साकेत नगर

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