मित्रता है मानवता का सबसे मजबूत सेतु

अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस, 30 जुलाई 2026 पर विशेषः

आज का विश्व अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उत्कर्ष का साक्षी है, लेकिन इसके समानांतर एक कठोर सच्चाई भी हमारे सामने है-मनुष्य पहले से अधिक अकेला, तनावग्रस्त और संबंधों से विहीन होता जा रहा है। परिवार छोटे हुए हैं, संवाद सीमित हुआ है, विश्वास कमजोर पड़ा है और संवेदनाएं लगातार क्षीण हो रही हैं। ऐसे समय में अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को बचाने का एक सांस्कृतिक और नैतिक अभियान है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रत्येक वर्ष 30 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस इस विश्वास को मजबूत करता है कि मित्रता केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं, बल्कि देशों, संस्कृतियों, समुदायों और सम्पूर्ण मानवता के बीच शांति का सेतु है। 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिवस को मान्यता देते हुए स्पष्ट किया था कि यदि दुनिया में स्थायी शांति स्थापित करनी है तो उसके लिए हथियारों से अधिक प्रभावी माध्यम मित्रता, संवाद और पारस्परिक सम्मान है।
नयी सभ्यता और उपभोक्तावाद के इस दौर में हर रिश्ता लाभ और हानि की तुला पर तौला जाता है। यही कारण है कि वैचारिक मतभेदों से मनभेद, प्रतिस्पर्धा से विरक्ति, और स्वार्थ से संवेदनहीनता जन्म ले रही है। ऐसे समय में दोस्ती ही एकमात्र ऐसा रिश्ता है जो इन सभी दीवारों को गिरा सकता है। यह केवल ‘रिश्ता’ नहीं बल्कि एक मनःस्थिति, एक दृष्टिकोण, एक आध्यात्मिक अनुभव है। जहां यह पर्व दक्षिण अमेरिकी देशों में 20 और 30 जुलाई को मनाया जाता है, वहीं भारत, मलेशिया, बांग्लादेश जैसे देशों में यह अगस्त के पहले रविवार को धूमधाम से मनाया जाता है। युवाओं के लिए यह केवल गिफ्ट, सेल्फी और चॉकलेट तक सीमित रह गया है, जबकि इसकी मूल आत्मा है एक-दूसरे की भावनाओं को समझना, स्वीकार करना और निभाना।
भारतीय संस्कृति ने तो हजारों वर्षों पूर्व ही इस सत्य को स्वीकार कर लिया था। हमारे यहां ‘मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्’ अर्थात् समस्त प्राणियों को मित्र-दृष्टि से देखने की कामना की गई है। जैन दर्शन का मैत्री भाव, बौद्ध धर्म की मैत्री भावना, उपनिषदों का वसुधैव कुटुम्बकम् तथा संत परम्परा का प्रेम-दर्शन इसी वैश्विक मित्रता की आधारशिला हैं। मित्रता संसार का सबसे स्वाभाविक और सबसे स्वतंत्र संबंध है। जन्म से मिलने वाले रिश्तों के विपरीत मित्रता का चुनाव मनुष्य स्वयं करता है। इसमें न रक्त का बंधन है, न किसी सामाजिक अनुबंध की बाध्यता। यह विश्वास, आत्मीयता, सम्मान और स्वीकार्यता पर आधारित वह रिश्ता है जिसमें व्यक्ति बिना किसी भय और संकोच के स्वयं को अभिव्यक्त कर सकता है। सच्चा मित्र हमारी सफलताओं पर प्रसन्न होता है और हमारी असफलताओं में सबसे पहले हमारे साथ खड़ा दिखाई देता है।
श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता भारतीय संस्कृति में केवल दो मित्रों की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि मित्रता का मूल्य धन, पद और वैभव से कहीं ऊपर है। श्रीराम और विभीषण की मित्रता यह संदेश देती है कि सत्य और धर्म के आधार पर स्थापित संबंध कभी नष्ट नहीं होते। इतिहास में ऐसी अनेक मित्रताएं हमें यह सिखाती हैं कि सच्चा मित्र वही है जो हमारे व्यक्तित्व का विस्तार बने, हमारे विवेक को जागृत करे और कठिन समय में हमारा संबल बने। किन्तु आज एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने है-यदि मित्रता इतनी महान है तो समाज में वैमनस्य, हिंसा, घृणा और अविश्वास क्यों बढ़ रहा है? परिवारों में संवाद क्यों टूट रहा है? विचारों का मतभेद मनभेद में क्यों बदल जाता है? सोशल मीडिया पर हजारों ‘फॉलोअर्स’ होने के बावजूद मनुष्य भीतर से इतना अकेला क्यों है?
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने संबंधों को सुविधा का साधन बना लिया है। आज मित्रता भी स्वार्थ, उपयोगिता और अवसरवाद के तराजू पर तौली जाने लगी है। जब तक लाभ है तब तक मित्रता है, लाभ समाप्त होते ही संबंध भी समाप्त हो जाते हैं। ऐसी क्षणिक मित्रता वास्तव में केवल परिचय होती है, आत्मीयता नहीं। जहां स्वार्थ प्रवेश करता है, वहां विश्वास धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। तकनीक ने हमें जोड़ने का दावा किया, लेकिन उसने संवाद की आत्मा भी कहीं छीन ली। आज लोग घंटों मोबाइल स्क्रीन पर सक्रिय रहते हैं, परंतु अपने परिवार और मित्रों के साथ कुछ मिनट भी मन से नहीं बैठ पाते। इमोजी ने भावनाओं का स्थान ले लिया है और ‘ऑनलाइन’ रहने वाला व्यक्ति वास्तविक जीवन में भावनात्मक रूप से ‘ऑफलाइन’ होता जा रहा है। यही कारण है कि अकेलापन आज विश्व स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिना जाने लगा है।
विश्व के अनेक देशों में युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, नस्लीय भेदभाव और आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर दी हैं। ऐसे वातावरण में मित्रता केवल व्यक्तिगत सुख का माध्यम नहीं, बल्कि विश्व शांति की आवश्यकता बन गई है। यदि राष्ट्र मित्रता की भाषा सीख लें, यदि समाज संवाद का मार्ग अपनाए और यदि व्यक्ति दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझने लगे तो अनेक संघर्ष स्वतः समाप्त हो सकते हैं। मित्रता का वास्तविक अर्थ केवल साथ घूमना, हँसना और उत्सव मनाना नहीं है। मित्रता का अर्थ है दूसरे के सम्मान की रक्षा करना, उसकी अनुपस्थिति में भी उसके प्रति निष्ठावान रहना, उसकी कमियों को स्वीकार करते हुए उसके विकास में सहयोग देना तथा आवश्यकता पड़ने पर सत्य कहने का साहस रखना। जो मित्र केवल प्रशंसा करता है, वह हितैषी नहीं हो सकता। सच्चा मित्र वह है जो समय आने पर हमारी भूलों का भी निष्पक्ष संकेत करे।
आज आवश्यकता मित्रता की नई परिभाषा गढ़ने की है। मित्रता प्रेम से आगे बढ़कर करुणा का पर्याय बने। प्रेम में कभी-कभी अधिकार और अपेक्षाएं जन्म लेती हैं, जबकि करुणा में केवल समर्पण और परमार्थ होता है। जब मित्रता करुणा पर आधारित होती है, तब उसमें ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ के लिए कोई स्थान नहीं बचता। यदि हम अपने जीवन में कुछ सरल सूत्रों को अपनाएं तो मित्रता का यह संबंध अधिक सशक्त बन सकता है एक-दूसरे की अच्छाइयों और कमियों को सहजता से स्वीकार करना, संवाद को कभी समाप्त न होने देना, विश्वास और पारदर्शिता बनाए रखना, कठिन समय में साथ खड़ा रहना तथा मित्रता को समय देना। संबंध समय मांगते हैं, केवल संदेश भेजने से आत्मीयता नहीं बनती। अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस विशेष रूप से युवाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज की पीढ़ी डिजिटल माध्यमों से दुनिया भर से जुड़ रही है। यदि यही युवा विविध संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए वैश्विक मित्रता का संदेश फैलाएं तो आने वाला विश्व अधिक शांतिपूर्ण और मानवीय हो सकता है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक संगठनों को ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए जो संवाद, सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करें।
जैन आचार्यों ने मैत्री, प्रमोद, करुणा और मध्यस्थ जैसे चार भावों के माध्यम से मानव संबंधों का अद्भुत दर्शन प्रस्तुत किया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में केवल मैत्री का भाव विकसित कर ले तो न घृणा बचेगी, न हिंसा और न ही वैमनस्य। महावीर का संदेश-‘सभी जीव मेरे मित्र हैं, किसी से मेरा वैर नहीं’-आज के विश्व के लिए सबसे प्रासंगिक जीवन-दर्शन है। यह भी स्मरण रखना होगा कि मित्रता केवल समान विचारों वालों के बीच नहीं होती। विचार-भिन्नता स्वाभाविक है, लेकिन मन-भिन्नता विनाशकारी है। विचार-भेद से नए विचार जन्म लेते हैं, जबकि मन-भेद रिश्तों को तोड़ देता है। लोकतंत्र हो या परिवार, संस्था हो या समाज-जहाँ संवाद जीवित रहता है, वहाँ मित्रता भी जीवित रहती है।
आज जब रिश्तों की जमीन सूख रही है, संवेदनाएं बिखर रही हैं और मनुष्य स्वयं को भीड़ में भी अकेला महसूस कर रहा है, तब अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस हमें याद दिलाता है कि दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता नई तकनीक की नहीं, बल्कि नए विश्वास की है, नई प्रतिस्पर्धा की नहीं बल्कि नई करुणा की है, नई शक्ति की नहीं बल्कि नई मित्रता की है। हम अपने जीवन में कम-से-कम एक ऐसा संबंध अवश्य बनाएं जिसमें स्वार्थ नहीं, विश्वास हो। अपेक्षा नहीं, अपनापन हो। अधिकार नहीं, सम्मान हो और केवल साथ चलने का नहीं, साथ निभाने का संकल्प हो। यही मित्रता की सच्ची साधना है, यही मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यही विश्व शांति का सबसे विश्वसनीय मार्ग भी है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133 

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