भारत की आत्मा एवं प्रकृति के संरक्षक हैं आदिवासी

विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त 2026) पर विशेषः
विश्व आदिवासी दिवस केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजनभर नहीं है, बल्कि यह उस मूल चेतना का अभिनंदन है जिसने मानव सभ्यता को प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की कला सिखाई। भारत के आदिवासी समुदाय केवल जनसंख्या का एक वर्ग नहीं हैं, बल्कि वे इस राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति, पर्यावरणीय संतुलन, आध्यात्मिक संवेदना और स्वाधीनता चेतना के जीवंत प्रतिनिधि हैं। यदि विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु भारत की संकल्पना को वास्तविक अर्थों में साकार करना है, तो आदिवासी समाज को विकास का विषय नहीं, बल्कि विकास का सहभागी और नेतृत्वकर्ता बनाना होगा। भारत की विकास यात्रा तब तक पूर्ण नहीं कही जा सकती जब तक जल, जंगल और जमीन से जुड़ा वह समाज, जिसने हजारों वर्षों से प्रकृति की रक्षा की है, सम्मान और समान अवसर के साथ राष्ट्रीय प्रगति का अभिन्न भाग न बने। आदिवासी समाज ने कभी प्रकृति का दोहन नहीं किया, बल्कि उसका संरक्षण किया। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संकट और जैव विविधता के संरक्षण की चिंता कर रही है, तब आदिवासी जीवन-दर्शन आधुनिक विश्व के लिए एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत करता है।
आदिवासी प्रकृति के पुत्र और संस्कृति के प्रहरी है। ‘जो प्रकृति से जुड़ा है, वही मनुष्यत्व का संरक्षक है’-यह वाक्य आदिवासी समाज पर अक्षरशः लागू होता है। आदिवासी शब्द मात्र एक सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि एक दर्शन है, सहजता, सामूहिकता, संतुलन और सह-अस्तित्व का दर्शन। करीब 90 प्रतिशत खनिज सम्पदा, वनौषधियां और जैव विविधता इन्हीं के क्षेत्रों में विद्यमान है। उनका जीवन सभ्यता के केंद्र से नहीं, बल्कि संवेदना के मूल से संचालित होता है। वे भले ही ‘वनवासी’ कहलाए गए, परंतु उनका जीवनदर्शन हमें शहरीकरण के आडंबर से बाहर निकालकर स्वाभाविक जीवन की राह दिखाता है। नए भारत में विकास का पर्याय यदि केवल बहुराष्ट्रीय निवेश, चकाचौंध और स्मार्ट सिटी बन गया है, तो आदिवासी समाज उसके विस्थापित मूल्य हैं। जल-जंगल-जमीन के नाम पर किए गए सौदे, खनिज लूट, धार्मिक कन्वर्जन, सांस्कृतिक विघटन और जबरन भूमि अधिग्रहण की घटनाएं केवल उनकी आर्थिक दशा ही नहीं बिगाड़ती, बल्कि उनकी पहचान, भाषा और परंपरा को भी निगलती जा रही हैं। आज आदिवासी समाज ऋण, अशिक्षा, पलायन, अस्वास्थ्यकर जीवन, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से ग्रस्त है। तथाकथित विकास ने उन्हें ‘पराया’ बना दिया है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस परायेपन का दूर करने के लिये पिछले वर्षों में जनजातीय समाज के सम्मान और सशक्तीकरण को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में स्थान दिया है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय हो, जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी और कौशल विकास की योजनाओं का विस्तार हो, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों का व्यापक विस्तार हो, अथवा प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन जैसी पहलें-इन सबने यह स्पष्ट किया है कि नए भारत की विकासधारा में आदिवासी समाज को केंद्र में रखने का प्रयास किया जा रहा है। यह केवल योजनाओं का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दृष्टिकोण में परिवर्तन का संकेत है। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी सरकारी योजना की सफलता तभी सुनिश्चित होती है, जब समाज के भीतर से ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व सामने आएं जो सेवा, संस्कार और संगठन के माध्यम से परिवर्तन की चेतना जगाएं। गुजरात के सुप्रसिद्ध जैन संत डॉ. गणि राजेन्द्र विजयजी ने इसी दिशा में पिछले दो-तीन दशकों में जो कार्य किया है, वह केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि जनजातीय पुनर्जागरण का एक व्यापक अभियान है। उन्होंने आदिवासी समाज को दया का पात्र नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की शक्ति माना। शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति, आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक संरक्षण, महिला सशक्तीकरण और नैतिक जागरण जैसे अनेक क्षेत्रों में उनके नेतृत्व में जो कार्य हुए, उन्होंने हजारों परिवारों के जीवन में नई आशा का संचार किया। मेरा सौभाग्य है कि मैं प्रारंभ से ही उनके मिशन से जुड़ा रहा हूं।
सुखी परिवार फाउंडेशन इस जनजागरण यात्रा का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरा। वर्ष 2007 में आयोजित विशाल आदिवासी सम्मेलन भारतीय सामाजिक इतिहास की एक स्मरणीय घटना सिद्ध हुआ। लाखों की संख्या में उपस्थित आदिवासी समाज का उत्साह, अनुशासन और आत्मविश्वास यह प्रमाणित कर रहा था कि यदि सही नेतृत्व और विश्वास मिले तो जनजातीय समाज राष्ट्र की सबसे बड़ी सकारात्मक शक्ति बन सकता है। उस ऐतिहासिक सम्मेलन में तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति ने इस आयोजन को नई ऊंचाई प्रदान की। विशाल जनसमुदाय को देखकर उनके मन में जो प्रसन्नता और आत्मीयता दिखाई दी, वह केवल एक राजनीतिक क्षण नहीं था, बल्कि जनजातीय चेतना के प्रति उनके विश्वास का सार्वजनिक प्रकटीकरण था। उसी मंच से उन्होंने सुखी परिवार फाउंडेशन को एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय के संचालन का दायित्व सौंपा। साथ ही जनजातीय विकास के लिए लगभग 15,000 करोड़ रुपये की वनबंधु योजना सहित अनेक महत्वपूर्ण घोषणाएं की गईं। यह सम्मेलन केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनजातीय विकास की राष्ट्रीय दिशा निर्धारित करने वाला प्रेरक अवसर सिद्ध हुआ।
गणि राजेन्द्र विजयजी के प्रभावी नेतृत्व, समाज के प्रति समर्पण और जनजातीय क्षेत्रों में किए गए रचनात्मक कार्यों ने इस सम्मेलन को एक ऐतिहासिक आयाम दिया। उस मंच से उठी सेवा, संस्कार और समरसता की भावना ने जनजातीय समाज और शासन के बीच विश्वास का एक नया सेतु निर्मित किया। अनेक लोगों की दृष्टि में यह सम्मेलन उस सकारात्मक सामाजिक वातावरण का भी प्रतीक बना, जिसने आगे चलकर नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए व्यापक जनविश्वास का आधार तैयार किया। इसे भारतीय जनजीवन में सामाजिक और आध्यात्मिक शक्तियों के समन्वय के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। आज विकसित भारत की चर्चा केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रह सकती। यदि भारत को विश्वगुरु बनना है तो उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पर्यावरणीय मूल्यों और सामाजिक समरसता को भी समान महत्व देना होगा। इस दृष्टि से आदिवासी समाज भारत की सबसे बड़ी पूंजी है। उनके पास प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का अनुभव है, औषधीय ज्ञान है, जैव विविधता की समझ है, लोककला है, सामुदायिक जीवन का अनुकरणीय मॉडल है और सबसे बढ़कर मानवीय संवेदनाओं से भरा जीवन-दर्शन है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, ड्रोन, जैव प्रौद्योगिकी और वैश्विक नवाचार के युग में आवश्यकता इस बात की है कि आदिवासी समाज को इन आधुनिक साधनों से जोड़ा जाए, किंतु उनकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे। उनकी भाषाओं का डिजिटलीकरण, लोक परंपराओं का दस्तावेजीकरण, वन उत्पादों का वैश्विक विपणन, स्थानीय उद्यमिता का विकास, डिजिटल शिक्षा और टेलीमेडिसिन जैसी व्यवस्थाएं उन्हें आधुनिकता से जोड़ते हुए उनकी अस्मिता को भी सुरक्षित रख सकती हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत की स्वतंत्रता की पहली ज्वालाएं जंगलों और पहाड़ों से ही उठी थीं। बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, रानी दुर्गावती, कोमाराम भीम, गोविंद गुरु और असंख्य जनजातीय वीरों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। दुर्भाग्य से मुख्यधारा के इतिहास में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। आज आवश्यकता केवल उनके स्मरण की नहीं, बल्कि उनके जीवन-मूल्यों को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बनाने की है।
विश्व आदिवासी दिवस हमें यह संदेश देता है कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल ऊंची इमारतें, स्मार्ट शहर और औद्योगिक निवेश नहीं है। विकास का अर्थ है-मानव गरिमा, सांस्कृतिक सम्मान, सामाजिक न्याय और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन। आदिवासी समाज इन सभी मूल्यों का जीवंत प्रतीक है। आज जब भारत अमृतकाल में विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब यह स्मरण रखना आवश्यक है कि भारत की आत्मा महानगरों की चमक में नहीं, बल्कि उन वनों, पर्वतों और जनजातीय बस्तियों में भी धड़कती है, जहां प्रकृति आज भी संस्कृति का उत्सव मनाती है। विकसित भारत का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब आदिवासी समाज केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र के नेतृत्व, नीति-निर्माण और विकास का सक्रिय भागीदार बने। विश्व आदिवासी दिवस पर हमारा संकल्प बने कि आदिवासी समाज की संस्कृति का संरक्षण होगा, उनकी भाषाओं का संवर्धन होगा, उनके अधिकारों की रक्षा होगी, उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच मिलेगा और उनके जीवन-दर्शन से प्रेरणा लेकर भारत विश्व को संतुलित, समावेशी और मानवीय विकास का मार्ग दिखाएगा। यही विकसित भारत की वास्तविक पहचान होगी और यही विश्वगुरु भारत की सबसे मजबूत नींव होगी।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

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