पर्युषण महापर्व 8 सितंबर से, तप-साधना और आत्मचिंतन में जुटेगा जैन समाज

15 सितंबर को संवत्सरी महापर्व पर होगी क्षमायाचना, ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ के साथ महापर्व का समापन

5 सितंबर 2026 । जैन धर्मावलंबियों का प्रमुख आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व 8 सितंबर से शुरू होगा। आठ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में जैन समाज के श्वेताम्बर समुदाय (स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथ) के लोग तप, उपवास, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, ध्यान और साधना के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास करेंगे। 15 सितंबर को संवत्सरी महापर्व के अवसर पर आत्मालोचना और परस्पर क्षमायाचना के साथ पर्युषण पर्व का समापन होगा।

श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने बताया कि पर्युषण जैन समाज के लिए आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण का विशेष अवसर है। इसका मूल उद्देश्य बाहरी दुनिया से कुछ समय के लिए दूरी बनाकर अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों का मूल्यांकन करना है।जैन परंपरा में इस दौरान तप, त्याग और साधना को विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने बताया कि चातुर्मास प्रारंभ होने के 49वें अथवा 50वें दिन संवत्सरी पर्व की साधना की जाती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में चातुर्मासरत श्रमण-श्रमणियों के सान्निध्य में जैन धर्मावलंबी पर्युषण की आराधना करेंगे। इस दौरान स्वाध्याय, उपवास, प्रतिक्रमण, क्षमायाचना और दान प्रमुख रूप से किए जाएंगे।

जैन स्थानकों में होंगे प्रवचन और आगम वाचन

पर्युषण के दौरान जैन स्थानकों में प्रतिदिन प्रातः धार्मिक प्रवचन और स्वाध्याय के कार्यक्रम होंगे। जैन आगम सूत्र ‘अन्तकृत दशांग सूत्र’ का मूल एवं भावार्थ सहित वाचन किया जाएगा, वहीं दोपहर के समय “कल्पसूत्र” का मूल एवं भावार्थ सहित वाचन श्रद्धालुओं को सुनाया जाएगा। इसके बाद सेवा, संयम, ध्यान, साधना और सद्व्यवहार जैसे विषयों पर प्रवचन होंगे। प्रातः और सायंकाल प्रतिक्रमण के माध्यम से श्रद्धालु अपने कार्यों और व्यवहार का आत्मनिरीक्षण करेंगे। संवत्सरी के दिन विशेष आत्मालोचना का पाठ होगा। इस दौरान श्रद्धालु जाने-अनजाने हुई भूलों और अपराधों के लिए क्षमा मांगेंगे तथा परस्पर ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहकर क्षमायाचना करेंगे।

थाली में भी संयम, जीवन में भी संयम

पर्युषण के दौरान जैन समाज में खान-पान में भी संयम रखा जाता है। अनेक श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास, एकासन, आयंबिल सहित विभिन्न प्रकार की तप साधनाएं करेंगे। श्रद्धालु आठ दिन हरी सब्जियों का पूर्णतया त्याग करके सादे भोजन को प्राथमिकता दी जाएगी। सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा का भी पालन किया जाएगा। इसका उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि स्वाद, इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास करना है। अधिक तड़क भड़क वस्त्रों का भी त्याग कर साधा, सफेद वस्त्रों को धारण कर धर्म आराधना करेंगे।

क्रोध, मान, माया और लोभ से मुक्ति का संदेश

श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने कहा कि जैन दर्शन में आत्मशुद्धि के लिए क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों पर नियंत्रण को महत्वपूर्ण माना गया है। पर्युषण व्यक्ति को अपनी कमजोरियों को पहचानने, गलतियों की समीक्षा करने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि पर्युषण का वास्तविक उद्देश्य कुछ दिनों तक धार्मिक गतिविधियों तक सीमित रहना नहीं, बल्कि संयम, क्षमा, अहिंसा और आत्मनिरीक्षण को जीवन का हिस्सा बनाना है। संवत्सरी पर होने वाली क्षमायाचना इसी भावना को मजबूत करती है।

श्वेतांबर परंपरा में आठ दिवसीय पर्युषण का समापन संवत्सरी महापर्व के साथ होता है। वहीं दिगंबर परंपरा में दस दिवसीय दशलक्षण पर्व मनाया जाता है, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी के अवसर पर होता है।

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