नेपाली स्वर साम्राज्ञी : अरुणा लामा

9 सितंबर, नेपाली स्वर कोकिला अरुणा लामा के वीं 82वें जन्मदिन पर विशेष…….
आज 9 सितंबर
नेपाली स्वर कोकिला अरुणा लामा को स्मरण करने का दिन है…..
आज से ठीक 82 वर्ष सन् 1945 को  आज ही के दिन दार्जलिंग, घूम की सुरम्य वादियों में  पिता सूर्य बहादुर लामा  और माता सनमाया लामा के  घर एक बालिका ने जन्म लिया। जिन्हें गोरखा-नेपाली समुदाय अरुणा लामा के नाम से जानती है ।  अरुणा लामा को हममें से अधिकांश लोग  लोग उन्हें एक महान नेपाली गायिका के रूप में जानते हैं। पर, वे एक सफल गायिका तो थीं ही, साथ ही बहु आयामी व्यक्तित्व की स्वामिनी भी थी। अपने पति शरण प्रधान के साथ मिलकर गीत संगीत के माध्यम से हमेशा समाज को प्यार, सम्मान और मानवीय मूल्य देने की कोशिश में जुटी रहीं। उनकी हर रचना और पेशकश समाज के हित में हुआ  करती थी।
     मगर … इधर होनी को कुछ और ही मंजूर था। उन्होंने दाम्पत्य जीवन के अभी 10 वर्ष भी पूरे नहीं किए थे कि 4 मई, 1974 को जीवन के हर राह के साथ-साथ गीत-संगीत की राह पर भी कदम से कदम मिलाकर चलने वाले पति शरण प्रधान का सन् 1974 में असमय देहांत हो गया। पति के देहांत की वजह से उनके जीवन में भयंकर तुषारापात हुआ। वो काफी मर्माहत हुई। होनी के इस निर्मम प्रहार से वौ लगभग टूट सी गई, सब कुछ बिखर गया सा लगने लगा। उन्हें कुछ समझ ही नही आया कि ये क्या हो गया! ऐसे कठिन समय में नेपाली संगीत जगत के दिग्गज हस्ती बड़े भाई तुल्य गुणी एवं प्रख्यात नेपाली संगीतकार कर्म योन्जन ही थे जिन्होने अरुणा जी को हौसला, हिम्मत और नैतिक बल दिया। उनके ही हौसले की बदौलत  आहिस्ता आहिस्ता वे सम्भल पाई और  अपनी जिंदगी को नए आयाम और अर्थ देने के लिए कमर कस कर खड़ी हो गईं और चल पड़ी खुद को संभालने साथ ही मजलूम और बेसहारा लोगों को सहारा देने में जी जान से जुट गई। इस दरमियान उन्हें दार्जिलिंग में अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण कार्यालय में नौकरी करने का अवसर भी मिला। इस नौकरी की वजह से उन्हें ढेरों सेवाकार्य करने का मौका मिला और उन्होंने बहुत से जनहित के कार्य बढ़ चढ़ कर   कर किए।  अब वह सिर्फ  गीत-संगीत की सेवा ही नहीं बल्कि  सामाजिक हित , समाजोपयोगी और आवश्यकतानुसार उनके सहयोग और उन्नति के कार्यों को भी सफलतापूर्वक अंजाम देने लगीं। उन्होंने दार्जिलिंग के कई सड़क, मंदिर, गुम्बा, स्कूल के निर्माण, में आवश्यकतानुसार  आर्थिक सहयोग ओर बहुत सारे कामों को अंजाम तक पहुंचाने में दिल खोलकर अपना सहयोग दिया। इस तरह  समाज उत्थान और लोगों के हित के लिए अनगिनत काम कर उन्होंने बेहतरीन उदाहरण पेश किए। पति के असामयिक मौत के बाद जिस जीवन संघर्ष से जूझना पड़ा, उनसे वे हार नहीं मानी बल्कि हिम्मत से उन सबका मुकाबला किया। अब बतौर एक सरकारी कर्मचारी के रूप में उनका जीवन संघर्ष अधिक कठिनाई से भरा था। पति का साथ छूटने के समय वो महज 30 साल के आसपास थीं। अपनी दो संतान  पुत्र,सुप्रीतराज प्रधान और  पुत्री, सपना प्रधान की जिम्मेदारी के साथ जीवन गुजारना आसान नहीं था। फिर भी वे डटी रहीं। साथ-साथ संगीत साधना और समाज हित के कार्यो में बराबर जुटी रहीं।  आखिरकार, 52 वर्ष 4 महीने की अल्पायु में 4 फरवरी, 1998 को नेपाल के काठमांडू में उन्होंने अंतिम सांस ली।
    बहरहाल, वैसे तो उन्होंने अनगिनत नेपाली गीत, लोक गीत, देशभक्ति और जातीय गीत सहित कुछेक नेपाली फिल्मों के गीत भी गाए हैं। उन्हें ‘पहाड़ी बुलबुल’ का खिताब से भी नवाजा गया। मगर उनके द्वारा गाए – “ए कांछा मलाई सुन को तारा ….” और “पोहोर साल खुशी फाट्दा ….” बस यै  दो  गीत ही उन्हें समस्त नेपाली (गोरखा) जनमानस के हॄदय में बरसों बरस जीवित रखने के लिए पर्याप्त हैं। अरुणा लामा जैसे व्यक्तित्व के स्वामी कभी मरा नहीं करते।  बस, आंखों से ओझल भर हो जाते हैं। अरुणा लामा हमारे हॄदय में बसी थीं, बसी हैं और बसी रहेंगी…।00
      ” जय गोरखा “
 – श्याम कुमार राई
        ‘सलुवावाला’
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