पर्युषण महापर्व : आत्मशुद्धि से आत्मजागरण की ओर

जैन धर्म का प्रमुख आध्यात्मिक महाकुंभ पर्युषण महापर्व इन दिनों देशभर में त्याग, तपस्या, संयम, साधना और आत्मचिंतन के साथ मनाया जा रहा है। यह केवल आठ दिनों तक चलने वाला धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा को जगाने, जीवन को परिष्कृत करने और संबंधों को मधुर बनाने का अनुपम अवसर है। इस महापर्व का शीर्ष दिवस संवत्सरी 14 सितंबर को मनाया जाएगा और इसके पश्चात 15 सितंबर को क्षमापना एवं विश्व मैत्री दिवस के रूप में एक-दूसरे से क्षमा मांगने और क्षमा करने की भावना को अभिव्यक्त किया जाएगा। वास्तव में पर्युषण का यह क्रम व्यक्ति को आत्मशुद्धि से विश्वमैत्री तक ले जाने वाली एक सुंदर आध्यात्मिक यात्रा है। पर्युषण का वास्तविक अर्थ है-बाहर से भीतर की ओर लौटना, आत्मा में अवस्थित होना और अपने जीवन में जमी हुई कषायों, विकारों एवं प्रमाद की परतों को हटाना। मनुष्य का अधिकांश जीवन बाहरी उपलब्धियों, प्रतिस्पर्धाओं, इच्छाओं और दूसरों को देखने-परखने में बीत जाता है। वह संसार को बदलने की चिंता करता है, लेकिन स्वयं के भीतर झांकने का अवसर बहुत कम निकालता है। पर्युषण उसे ठहरने, अपने भीतर उतरने और स्वयं से साक्षात्कार करने का संदेश देता है। यही कारण है कि यह पर्व जप, तप, स्वाध्याय, ध्यान, सामायिक, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और आत्मावलोकन के माध्यम से जीवन को भीतर से निर्मल बनाने का अवसर बनता है।
आज दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें पर्युषण की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। परिवारों में संबंधों की गर्माहट कम हो रही है, समाज में वैचारिक दूरियां बढ़ रही हैं, आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने मनुष्य को अधिकाधिक पाने की दौड़ में लगा दिया है और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अनेक बार संवाद की जगह टकराव को जन्म देती है। राष्ट्रों के बीच अविश्वास, संघर्ष, हिंसा और आतंक की घटनाएं मानवता को चुनौती दे रही हैं। ऐसी स्थिति में जैन धर्म का पर्युषण महापर्व यह संदेश देता है कि बाहरी शांति का मार्ग भीतर की शांति से होकर जाता है। जब तक मनुष्य अपने भीतर के क्रोध, मान, माया, लोभ, अहंकार, आग्रह और द्वेष को कम नहीं करेगा, तब तक परिवार, समाज और विश्व में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती। पर्युषण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश आत्मावलोकन है। प्रतिक्रमण इसी आत्मावलोकन की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। ‘प्रति’ अर्थात वापस और ‘क्रमण’ अर्थात लौटना-अर्थात् अपनी भूलों से वापस लौटकर अपने वास्तविक स्वरूप की ओर आना। असत्य से सत्य की ओर, अशुभ से शुभ की ओर, प्रमाद से अप्रमाद की ओर और वैर से मैत्री की ओर लौटना ही प्रतिक्रमण की सार्थकता है। मनुष्य से जाने-अनजाने में भूलें होती हैं। समस्या भूल होने में उतनी नहीं है, जितनी उसे स्वीकार न करने में है। जो व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर लेता है, उसके भीतर सुधार की संभावना पैदा होती है, जो अपनी भूल को सही साबित करने में लगा रहता है, वह अपने विकास का मार्ग स्वयं बंद कर देता है।
संवत्सरी इसी आत्मशोधन की चरम अभिव्यक्ति है। वर्षभर के व्यवहार, विचार और कर्मों की समीक्षा करते हुए व्यक्ति स्वयं से प्रश्न करता है-मैंने किसे दुख पहुंचाया? किसके प्रति मेरे मन में द्वेष पैदा हुआ? मेरे शब्दों से किसका मन आहत हुआ? मेरे व्यवहार में कहां अहंकार आया? कहां लोभ, क्रोध या आग्रह ने मुझे संचालित किया? इस आत्ममंथन से भीतर का बोझ हल्का होता है। क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का परिचायक है। अपनी गलती स्वीकार करने के लिए साहस चाहिए और दूसरे की गलती को क्षमा करने के लिए उससे भी बड़ा हृदय चाहिए। पर्युषण का अंतिम संदेश क्षमापना और विश्व मैत्री है। यह केवल औपचारिक रूप से ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कह देने का अवसर नहीं है, बल्कि अपने भीतर से वैर और कटुता को विसर्जित करने का संकल्प है। क्षमा तभी सार्थक है जब वह मन से हो। यदि शब्दों से क्षमा मांग ली जाए और हृदय में शिकायत बनी रहे, तो क्षमापना अधूरी रह जाती है। इसी तरह किसी से क्षमा मांगने का अर्थ स्वयं को छोटा करना नहीं, बल्कि संबंधों को बड़ा बनाना है।
भगवान महावीर का संदेश-“मित्ती मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणइ”-अर्थात् सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा वैर नहीं है-आज की दुनिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मौपम्य की दृष्टि देते हुए कहते हैं कि जो सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही श्रेष्ठ दृष्टि वाला है। दोनों परंपराओं का मूल संदेश एक ही है-दूसरे के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख की तरह अनुभव करना। आज जब व्यक्तिगत संबंधों में कड़वाहट और दूरियां बढ़ रही हैं, तब पर्युषण परिवारों को भी नई दृष्टि दे सकता है। पति-पत्नी, माता-पिता और संतान, भाई-बहन, मित्र और सहकर्मी-यदि एक-दूसरे की अपेक्षाओं के बजाय एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का प्रयास करें, तो अनेक विवाद अपने आप समाप्त हो सकते हैं। हर व्यक्ति अपने अधिकार की बात करता है, लेकिन यदि कर्तव्य और संवेदना को भी उतना ही महत्व मिले, तो संबंधों में मधुरता लौट सकती है। क्षमा संबंधों की मरम्मत करने वाली ऐसी शक्ति है, जो टूटे हुए विश्वास को भी धीरे-धीरे जोड़ सकती है। पर्युषण का संदेश केवल जैन समाज तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अहिंसा, संयम, क्षमा, मैत्री और सह-अस्तित्व सार्वभौमिक जीवन-मूल्य हैं। धार्मिक आस्था अलग हो सकती है, पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन मनुष्य को मनुष्य के रूप में सम्मान देना किसी एक धर्म की सीमा नहीं है। हिंसा किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। हिंसा प्रतिशोध को जन्म देती है और प्रतिशोध नई हिंसा को। इसके विपरीत संवाद, सहिष्णुता, क्षमा और मैत्री समाधान की संभावनाओं को जन्म देते हैं।
आज विश्व आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक प्रतिस्पर्धा के चरम दौर में है। राष्ट्र अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे हैं, बाजार अधिकाधिक विस्तार चाहता है और तकनीक ने मनुष्य की क्षमताओं को अभूतपूर्व बनाया है। लेकिन यदि तकनीकी प्रगति के साथ नैतिक प्रगति नहीं हुई, तो विकास मानवता के लिए संकट भी बन सकता है। इसलिए आज दुनिया को केवल शक्तिशाली राष्ट्र नहीं, बल्कि संवेदनशील राष्ट्र चाहिए, केवल समृद्ध समाज नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में विश्वास करने वाले समाज चाहिए और केवल सफल व्यक्ति नहीं, बल्कि संयमी एवं करुणाशील व्यक्ति चाहिए। पर्युषण इसी संतुलन का संदेश देता है-पहले स्वयं को बदलो, फिर संसार को बदलने की कोशिश करो। भीतर का क्रोध शांत होगा तो बाहर का संघर्ष कम होगा। भीतर का अहंकार घटेगा तो संबंधों में सहजता आएगी। भीतर लोभ कम होगा तो शोषण घटेगा। भीतर मैत्री बढ़ेगी तो समाज में विश्वास बढ़ेगा। इसलिए पर्युषण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्ति और समाज के नैतिक पुनर्निर्माण का अभियान बन सकता है।
पर्युषण का सच्चा उत्सव तब होगा, जब आठ दिनों की साधना हमारे शेष जीवन की जीवनशैली बन जाए। संवत्सरी का आत्ममंथन केवल एक दिन तक सीमित न रहे और क्षमापना का भाव केवल एक अवसर की औपचारिकता न बने। हम प्रतिदिन स्वयं से पूछें कि आज मैंने किसके लिए प्रेम बढ़ाया, किसके दुख को समझा और किस कटुता को अपने भीतर से कम किया। यही आत्मोन्नयन की दिशा है। वास्तव में पर्युषण एक ऐसा आध्यात्मिक सवेरा है, जो मनुष्य को प्रमाद की नींद से जगाता है और अज्ञान के अंधकार से आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। 14 सितंबर की संवत्सरी हमें अपनी भूलों का बोध कराए और 15 सितंबर का विश्व मैत्री दिवस हमें सबके प्रति क्षमा, करुणा और मैत्री का भाव दे-तो यही पर्युषण की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। आज की अशांत दुनिया को यदि किसी शक्ति की सबसे अधिक आवश्यकता है, तो वह है-अहिंसा, क्षमा और सह-अस्तित्व। पर्युषण महापर्व इसी शाश्वत संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का श्रेष्ठ अवसर है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133 

Leave a Comment

This site is protected by reCAPTCHA and the Google Privacy Policy and Terms of Service apply.

error: Content is protected !!