लोकतंत्र के प्रहरी “चुनाव आयोग” के सिद्ध अपराध की सजा, लोकतंत्र को देशद्रोही बताकर दी जा रही है।
वैसे भी अस्सी साल में देश का गला, लोकतंत्र के गीत गाते- गाते, बैठ चुका है। आवाज कर्कश हो गई है। चीखें बेमानी हो चुकी हैं।
इतिहास के उन नायकों से हमें आँखें मिलाते हुए डर लगता है, जिन्होंने हमारे नागरिक होने का अधिकार हमें सौंपा था .. संविधान के दस्तावेज बनाए थे .. हमें हमारी आवाजें दी थी.. आज हमने अपने स्वतंत्र अधिकारों को उन कुचलने वाले पांव के नीचे बिछा दिया, जिन्हें पूजने का ढोंग हमारी आदत बन चुकी है।
यह अचानक नहीं हुआ। एक लंबी तैयारी रही है। उन हथियारों को बकायदा तराशा गया है। मस्तिष्कों को भोथरा किया गया है सी स्वार्थों की सतही परिभाषाएं गढ़ी गई हैं.. धीरे- धीर ही सही, आज वे अपने मकसद में कामयाब हैं।
अभी डेढ़-दो दशक पहले तक हम अपराधी को नायक मानने में हिचकिचाते थे। अनजान निर्भया के लिए सड़कों पर उतर आते थे। बोफोर्स, टूजी, कोल, सरीखे घोटालों का सत्य जाने बगैर सत्ताओं को उखाड़ फेंकते थे। वैचारिक या राजनैतिक भिन्नता को शत्रुता की नजरों से नहीं जोड़ते थे।
फिर आया एक नारा “अच्छे दिन आयेंगे..”
नारे की गूँज में कठुआ, हाथरस, उन्नाव की चीखें वासनामयी आनंद में बदल गई। नोटबंदी में बर्बाद हुए घरों को कुर्बानी और कोरोना में हुई मौतों को नियति मान लिया गया। घोटाले अधिकार और अनैतिकता चातुर्य बनकर सामने खड़े हो गए। हरेन पंड्या से लेकर जज लोया की हत्या हादसा बन गई। उमर खालिद, बिल्किस बानो के नाम में आतंक की बू आने लगी। पुलवामा से पहलगाम तक के सारे सवालों को राममंदिर और तीन सौ सत्तर से झुठलाया गया। शंख घंटी, थाली, की आवाजों के बीच ना गरीबी की मार दिखाई थी ना बेकारी की मातमी चीखें सुनाई दी।*
इस बीच देश के ढहते सामरिक और आर्थिक ढांचे को बचाने की जगह आभासी आंकड़ों से ढकने की सफल कोशिशें, प्रधानमंत्री द्वारा खोटे सिक्कों की तरह दूसरे देशों से बटोरा गया सम्मान, गृह मंत्री के तुगलगी फरमान, रक्षा मंत्री के नीबू मिर्ची टंगे मिसाइल, छुटभैया नेताओं के भड़काऊ भाषण, भोंडे प्रदर्शन, बहरुपिए परिधान, कैमरो के बीच ध्यान, सार्वजनिक मंचों पर अश्लिल इशारें, पूरे बारह वर्षों से, आज तक देश का मनोरंजन करते रहे हैं । देश को मनोरंजन मानते रहे। देश को मनोरजन बनाते रहे हैं। किसी दूसरे ने अगर उनके रास्ते पर चलकर वही सब कर दिया तो संस्कृति और संस्कार की दुहाई दी जाने लगी।
सरकार गिराने, वोट चुराने, संस्थानों के दुरपयोग को विपक्ष की रुदाली बताया गया।
स्थानीय निकाय चुनावों से लेकर हरियाणा, बिहार, बंगाल की जीत पर जश्न मनाते हुए हम यह भूल गए कि यह राजनीति की जीत और लोकतंत्र की हार है।
क्या सचमुच यह मान लिया जाना चाहिए कि हमारे भीतर लोकतंत्र को लेकर कोई आग्रह, कोई इच्छा नहीं बची है। हम सिर्फ तालियां बजाने या नारे लगाने के लिए ही बचे हैं।
इस पर मुझे मेरी समीचीन कविता याद आती है-
कविता- भीड़
क्या आपको
वह भीड़ दिखाई नहीं दे रही
जो आपकी ओर बेतहाशा बढ़ी चली आ रही है
या
आप मानकर चल रहे हैं
वह आपके पास से
वैसे ही गुजर जाएगी
जैसे पटरी किनारे खड़े रहते
कोई ट्रेन धड़धड़ाते हुए सामने से निकल जाती है
आप भूल रहे हैं
भीड़ ने पटरियां उखाड़ दी हैं
आप नहीं जानते
पटरी से उतरी भीड़
क्या कर सकती है
शोर को अनसुना कर
बहरे होने का
नाटक मत कीजिये
नारो के बीच
आपका नाम
पुकारा जा रहा है
क्या आपको पता है
उस भीड़ के रास्ते मे
बेटे का प्ले ग्राउंड
और बेटी का कोचिंग सेंटर पड़ता है
आपके बच्चे भीड़ के शिकार
या भीड़ में शामिल हो सकते हैं
देश-धर्म का वास्ता देकर
उनसे उनकी उम्र छीनी जा सकती है
लेकिन आप
यह सब नही सोच रहे
आप चैनल और सोशल मीडिया की ओट में
दूसरे बेटे- बेटियों के किस्से कुतरते रहे हैं
क्या सचमुच
आप जिंदा रहना भूल चुके हैं?
या सांस लेते रहने को जिंदा रहना समझ रहे हैं?
कन्फर्म कीजिये कि आप सांस ले रहे हैं ?
क्योंकि आपको कोई दुर्गंध महसूस नहीं हो रही
जबकि आपके आस-पास
इंसानियत की लाश अर्से से सड़ रही हैं
घर के किसी कोने में
एक चूहा या छिपकली मरने पर
पूरा घर सर पर उठा लेते हैं
आप आदमी को बस ख्यालों में रचते हैं
आप अपने शव की शिनाख्त से इतना क्यों बचते हैं
आप का नाम संज्ञा से संख्या बन चुका है
आप अपने गिने जाने को लेकर बहुत खुश हैं
आप गिने जा रहे हैं
मरने वाले, बचने वाले या डरने वालों के समूह में
*जिंदा लोगो की
कभी गिनती नहीं होती*
अपने गिने जाने पर टोकिये
भीड़ को रोकिए
अपने आप को भीड़ बनने से रोकिए
कुछ कीजिये
कुछ कीजिए , हजूर!
रास बिहारी गौड़