*शासक और शासित के विचार ने सत्ताओं को जन्म दिया। सत्ता के विविध उपक्रम यथा राजनीति, धर्म, नस्ल, पूंजी, समाज, विचार, ने अपनी सुविधा और समय के हिसाब से शोषण और ताकत के नए- नए उपकरण ईजाद किए हैं.।* *इन उपकरणों के बरक्स मानव समाज कलाओं के भीतर अपने मन की इच्छाओं को अभिव्यक्त करता रहा है.. शोषण को जुबान देता रहा… सुरक्षा कवच गढ़ता रहा है या कहें शासित अंधड़ के बीच शोषित की झोपड़ी में दीप सा टिमटिमाता रहा है।*
*यह टिमटिमाहट ही उम्मीद की रोशनी है। यह टिमटिमाहट ही मनुष्यता की विराट विरासत का उजाला है।*
*यही वजह है कि सत्ताएं कला- साहित्य के विध्वंश को अपना शौर्य समझती रही हैं। यदा- कदा अपनी निरंकुशता को आवरण देने के लिए संरक्षण का ढोंग भी करती रही। अपवाद स्वरूप, जिन कुछ सत्ताओं ने कला साहित्य को प्रश्रय दिया है, वे ही अपने समय के बाद भी किताबों के पृष्ठों पर धड़कती हुई मिली।*
*पिछली सदी में दुनिया भर के विध्वंश (क्रांति, औपनिवेशिक शासन, दास प्रथा, विश्वयुद्ध) के बीच मानवता को जिंदा रखने की जिद अगर कहीं दिखाई देती है तो वह कलाओं के कैनवास, शब्दों के समूह या सुरों की सरगम में ही सुनाई देती है।*
*इस सदी की शुरुवात में पूंजी की सत्ता के वर्चस्य ने राजनीति, धर्म, समाज की शेष। सभी सत्ताओं को अधिरोपित किया। पूंजी के चमकीले आभा मंडल ने मनुष्य को उत्पाद और मनुष्यता को मुनाफ़े में बदल दिया।*
*परिणामत: पूंजी ने अपने राजनैतिक धार्मिक सिपहसलारों के माध्यम से ऐसा समाज गढ़ना शुरू किया, जहां कला- साहित्य के लिए कोई स्थान शेष ना हो और अगर हो भी तो उसका समूचा उपयोग सत्ता के आचरणों को वैधता देने के लिए हो।*
*भारत के संदर्भ में इन दिनों यह तेजी से देखने को मिल रहा है कि पूंजी और धर्म के गठजोड़ से बनी राजनैतिक सत्ताएं अपनी सारी ताकत कला साहित्य को आभासी अस्तित्व देने में लगी है। उनके शिक्षा द्वारों पर अशिक्षित साक्षर द्वारपाल तैनात कर दिए गए हैं। संबधित संस्थानों को स्व -प्रचार का केंद्र बना लिए है।*
*इस समूचे प्रतिकूल वातावरण में भी कला साहित्य अपने आप को जीवित रखे हुए है सूखी जमीन के भीतर से नमी बटोरकर अपनी जड़ों को सुरक्षित रख रख रही है।क्योंकि उसे पता है आने वाले कल की सत्ता के भीषण तप से थककर मनुष्य को उसकी छाया में सुस्ताना होगा।*
*सत्ताएं आदिम होती है, अमर नहीं..*
*शब्द आदिम है , आधुनिक हैं और अमर भी…*
*रास बिहारी गौड़*