भगत सिंह को याद करते हुए शायद ही कोई मन हो जो गीला नहीं होता हो। भगत सिंह को पढ़ते- जानते, कभी भी मैं पूरी तरह उनके क्रान्तिकारी स्वरूप पर नहीं टिक पाया और ना उनकी आंदोलनकारी हिंसा को गांधी दर्शन के विरोध में देख पाया। *सत्रह – अठारह वर्ष की उम्र में छद्म नाम से लिखे गए उनके लेखों में जो वैचारिक परिपक्वता दिखती है, वह उनकी मेधा और भविष्य की संभावनाओं का आभासी पता देती हैं। “मैं नास्तिक क्यों हूँ” सरीखे साहसी लेख सिद्ध करते हैं कि उनका संघर्ष केवल राजनैतिक नहीं था वे समाज के अंधेरों से लड़ने के लिए विचार की मशाल लेकर चल रहे थे।*
भगत सिंह को सोचते हुए मस्तिष्क में एक ऐसा साहसी और विचारवान नायक जन्म लेता है, जो जेल प्रवास में अनिवार्य मृत्यु के सामने खड़ा होकर दर्जनों किताबों से अपने लिए अज्ञात लोक का उजाला बटोर रहा है। यह किस्सा आज भी रोमांच पैदा कर देता है कि फाँसी के लिए जेलकर्मी के बुलावे पर वे जो किताब पढ़ रहे थे, उसे पूरी करने की मामुल सी राहत मांगी। किताब का नाम था “लेनिन की जीवनी ” यह भी तथ्य है कि गांधीजी को देखकर उनके मन में स्वतंत्रता के आंदोलन में कूदने का विचार आया। दुर्भाग्य से ‘लेनिन’ और ‘गांधी’ को नकारने वाले, भगत सिंह की तस्वीर दिखाकर, सत्ता के शिखर पर बिराजे हैं।
*इस संदर्भ में असीम तिवारी की वाल से साभार लिया गया आलेख पठनीय है -*
आज भगत सिंह एक सौ उन्नीस वर्ष के होते, यह वाक्य लिखते ही इतिहास उँगली पकड़कर रोक देता है, वे तेईस से आगे कभी हुए ही नहीं, उनके हिस्से में चौबीसवाँ जन्मदिन नहीं आया, तीस की बेचैनी नहीं आई, चालीस की पुनर्विचार वाली उम्र नहीं आई, बालों में सफेदी नहीं आई, पुराने लेख दोबारा पढ़कर उनसे असहमत होने का अवसर नहीं आया, अंग्रेज़ों ने उनसे केवल जीवन नहीं छीना था, उनका भविष्यकाल भी जब्त कर लिया था
हम प्रायः भगत सिंह की मृत्यु के बारे में सोचते हैं, जबकि असली क्षति उस जीवन में छिपी है, जो उनकी मृत्यु के बाद शुरू हो सकता था। वे कौन सी किताबें लिखते, किन निष्कर्षों को बदलते, आज़ाद भारत की पहली सुबह देखकर प्रसन्न होते या उसके भीतर कोई नया धोखा पकड़ लेते, संसद को देखकर क्या कहते, विभाजन के दिनों में कहाँ खड़े होते, खेतों और कारखानों के बारे में उनकी सोच किस दिशा में जाती, क्या वे राजनीति में आते, किसी दल से निकाले जाते, अपना दल बनाते, जेल जाते, चुनाव हारते, अख़बार निकालते, प्रतिबंधित होते, साथियों से झगड़ते, किसी पुराने वाक्य के आगे लिखते कि उस समय मैं गलत था, हमें इनमें से कुछ भी जानने का अवसर नहीं मिला।
तेईस वर्ष किसी विचारक की अंतिम उम्र नहीं होती, वह तो दिमाग की पहली खुली खिड़की होती है, उस उम्र तक मनुष्य उत्तर कमाता नहीं, प्रश्न कमाना शुरू करता है, भगत सिंह भी कोई तैयार मूर्ति नहीं थे, वह लगातार बदलता हुआ युवक थे, धार्मिक संस्कारों से निकले, ईश्वर के विचार से टकराए, रोमानी क्रांतिकारिता से आगे बढ़े, बम और पिस्तौल की चमक के पीछे छिपी सीमाएँ पहचानीं, संगठन, अध्ययन, किसान, मज़दूर और समाज के पुनर्निर्माण की ओर गए, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं थी कि उन्होंने बहुत कम उम्र में अंतिम सत्य पा लिया था, उनकी विशेषता यह थी कि किसी सत्य को अंतिम मानकर बैठ जाने से उन्हें चिढ़ थी
साम्राज्य ने एक जीवित मसौदे को फाँसी दी थी, हमने उसे अंतिम संस्करण मानकर छाप दिया
इसके बाद जो हुआ वह और भी विचित्र था, उनकी हर तस्वीर को भविष्यवाणी बना दिया गया, चेहरे की गंभीरता को मृत्यु की तैयारी, आँखों की चमक को बलिदान का संकेत, बचपन की हर घटना को शहादत की भूमिका, जैसे वह जन्मे ही इसलिए थे कि एक दिन फाँसी पर चढ़ सकें, हमने उनके जीवन से आकस्मिकता निकाल दी, शरारत निकाल दी, अधीरता निकाल दी, गलती की संभावना निकाल दी, वह सब निकाल दिया जो किसी मनुष्य को मनुष्य बनाता है, फिर बची एक सुंदर और सुरक्षित प्रतिमा, जिसे कोई भी अपने जुलूस के आगे लेकर चल सकता था
किसी मृत नायक पर अधिकार करना आसान है, वह बीच भाषण में उठकर नहीं कहेगा कि मेरे शब्दों का अर्थ यह नहीं था, वह किसी पार्टी के पोस्टर से अपना चेहरा नहीं हटाएगा, वह अपने नाम पर नफ़रत बेचने वालों का कॉलर नहीं पकड़ेगा, वह अपने प्रशंसकों से यह नहीं पूछेगा कि तुमने मेरी तस्वीर तो पूरी पढ़ ली, मेरे लेख का दूसरा पन्ना क्यों छोड़ दिया, इसलिए भगत सिंह पर सबका दावा है, जीवित होते तो शायद किसी का दावा पूरा न रहने देते
हम उन्हें साहसी कहते हैं और बात समाप्त कर देते हैं, जबकि साहस उनके व्यक्तित्व का सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा भर था, भीतर एक बेचैन पाठक था जो अपनी मान्यता को भी वह सुविधा नहीं देता था जो हम अपने पूर्वाग्रहों को देते हैं, वह स्वयं को गलत साबित हो सकने की जगह देता था, यही कारण है कि उसका दिमाग उसकी उम्र से बड़ा दिखाई देता है, वह दूसरों के विश्वास पर हमला करने से पहले अपने विश्वास की तलाशी लेता था, उसने अपने भीतर जो अदालत चलाई, उसकी कठोरता अंग्रेज़ों की अदालत से कम नहीं थी, अंतर इतना था कि अंग्रेज़ों की अदालत को उसका शरीर चाहिए था, उसकी अपनी अदालत को सच
सोचिए, चालीस वर्ष का भगत सिंह तेईस वर्ष के भगत सिंह को कैसे पढ़ता, संभव है कुछ बातों पर गर्व करता, कुछ पर मुस्कराता, कुछ काट देता, कुछ के नीचे मोटी रेखा खींचता, संभव है उसके युवा प्रशंसक उसी से नाराज़ हो जाते कि आप पहले वाले भगत सिंह क्यों नहीं रहे, और वह हँसकर कहता कि जो विचार तेईस की उम्र में रुक जाए वह क्रांति नहीं, समाधि है
यही वह भगत सिंह है जिसे फाँसी ने हमसे छीना, शहीद भगत सिंह हमारे पास हैं, वृद्ध भगत सिंह हमारे पास नहीं हैं, उनका बलिदान हमारे पास है, उनका विकास हमारे पास नहीं है, उनका प्रसिद्ध चेहरा हमारे पास है, समय के साथ बदलता चेहरा हमारे पास नहीं है, हमारे पास वह एक क्षण है जिसमें उन्होंने मृत्यु को देखा, वे असंख्य क्षण नहीं जिनमें वह जीवन को देखते, परखते, उससे लड़ते और कभी कभी उसके सामने अपनी राय बदलते
किसी तस्वीर में हमेशा जवान रह जाना रोमानी बात नहीं है, वह हत्या का सबसे स्थायी प्रमाण है
आज जब हम उनका जन्मदिन लिखते हैं तो अनजाने में उन सभी जन्मदिनों की गिनती भी करते हैं जो उन तक कभी पहुँचे ही नहीं, चौबीस, पच्चीस, तीस, पचास, अस्सी, एक सौ उन्नीस, हर संख्या एक अनुपस्थित भगत सिंह है, हर संख्या एक ऐसी किताब है जो लिखी नहीं गई, एक बहस है जो हुई नहीं, एक प्रश्न है जो स्वतंत्र भारत से पूछा नहीं गया, एक असहमति है जिससे हम बच निकले
*फाँसी के फंदे ने एक गर्दन कसी थी, लेकिन उसके साथ हज़ारों अजन्मे वाक्य भी मर गए थे*
इसलिए आज भगत सिंह को याद करते हुए मेरी आँख उनके आख़िरी दिन पर नहीं, उनके उस अगले दिन पर अटकती है जो कभी आया ही नहीं, उस सुबह पर जिसमें वह चौबीस वर्ष का होने की ओर बढ़ता, किसी नई किताब का पन्ना मोड़ता, किसी पुराने विचार को काटता, कोई नया वाक्य लिखता, शायद अपने समय से फिर झगड़ता, शायद हमसे भी
*आज भगत सिंह एक सौ उन्नीस वर्ष के होते, तब हमारे पास उनकी सफेद दाढ़ी होती, दर्जनों किताबें होतीं, बदले हुए विचार होते, असफलताएँ होतीं, पछतावे होते, नई लड़ाइयाँ होतीं, हमारे पास एक पूरा मनुष्य होता, हमारे पास अब केवल तेईस साल हैं, और भारतीय इतिहास में तेईस से अधिक अधूरा कोई अंक नहीं है!*
Aseem Tiwari
*रास बिहारी गौड़*