वैरी गुड़

जब से होश संभाला मैंने,
मैं हँसता रहा,/
मेरे एड्मिसन को लेकर, घर में चल रहे तनाव,/
व एड्मिसन हो जाने पर, घर में छाई ख़ुशी ने,/
मुझे,स्कूल नहीं जाऊँगा, जैसी मासूम जिद,/
करने का कोई मौका दिए बगैर,स्कूल में धकेल दिया./
मन रोया बहुत, मैं हँसता रहा ………… .
स्कूल में भी घर का एहसास,अभी पूरा भी न हुआ था,/
तुम्हारी मीठी मुस्कराहट पे यकीं कुछ कुछ होने लगा था./
उस दिन भूल से मेरी पेंसिल घर रह जाने पर./
जब सबके तुमने मुझे “जंगली” कहकर झकझोर दिया,/
मन तो रोया बहुत, मैं हँसता रहा……
तुम्हे नहीं मालूम , तुम कहकर भूल गयी थी./
पर मैं अपनी आत्मा पे इस जंगली को ढो रहा था,/
किसी के भी किसी बात पर हंसने पर मुझे अपने,/
“जंगली ” होने का एहसास हो रहा था/
मेरी प्राईमरी स्कूलिंग , इस एहसास से निकलने में पूरी हो गयी./
मन रोया बहुत, मैं हँसता रहा……………..
स्कूल में कई बार मेरे सही सवालों को भी तुम्हारे द्वारा अनदेखा करने/
औरो के बेकार सवालों पर शाबाशी देने,/
मेरे खेल में शैतानी औरो की शैतानी में खेल ढूदते रहने पर भी/
तुम्हे प्रभावित करने की चाह में, तुम्हारे भद्दे रिमार्क से,
मम्मी के आंशु व पापा के सम्मान को बचाने के लिए./
कई बार खुद की नजरो में सही होने पर भी,/
सौरी बोल, अंदर ही अंदर घुटता रहा/
मन रोया बहुत, मैं हँसता रहा …………..
उस बार जब मैं टेस्ट में एक नंबर से फेल हो रहा था,
बहुत रोया झिझाया,
तुमने न जाने क्या क्या समझाया,/
पर नंबर नहीं बढाया,
सच : बहुत बुरे हो तुम !/
यही ख्याल था मन में समाया,
तुम्हे दिखला दू,
इसी ख्याल से बहुत मेहनत की थी,/
बहुत अच्छे नम्बर अगले ही टेस्ट में लाकर,/
जब तुम्हारी ओर घमंड से देखा, तुम शांत मुसकुरा रहे थे./
तुमने आगे आ,मेरे सर पर हाथ फेर जब “वैरी गुड” कहा,/
उस पल ऐसा लगा,मैं जीत कर भी हार गया ओर तुम हार कर भी जीत गए/
तुम्हारी मुस्कुराहट देख घमंड चूर-चूर हो गया था/
मन रोया बहुत, मैं हँसता रहा ………………..
कभी प्रिंसिपल के डर से,
तो कभी प्रक्टिकल के डर,/
कभी टेस्ट के मारे, तो कभी प्रोजेक्ट के मारे/
अपनी इच्छाओं, अरमानो और चाहत का गला घौटकर./
मनमारकर तो कभी दुबारा तुमसे
“वैरी गुड़” सुनने की आशा लेकर/
मैं मेहनत करता रहा, साल बीतते रहे,
मैं आगे बढ़ता रहा, इस कठोर मेहनत से/
मन रोया बहुत, मैं हँसता रहा ………
तुमसे बिछड़ा तो बिछड़ने का कोई गम न था/
नई दुनिया, नए लोगो में जाने का जोश कम न था./
नई दुनिया में आकर अजनबी परिस्थितियों में हो रहे-
भेदभाव व् अनदेखी, व्यभिचार और भ्रष्टाचार से/
जब मेरे दूसरे साथी घबराकर टूटने लगे,
मैं ध्रुवतारे सा अडिग खड़ा रहा/
अन्याय से लड़ा और आज भी लड़ रहा हु/
यकीं है, हार सकता नहीं.
जीत मेरी होगी/
तुम्हारी बचपन में शिक्षा,अब पूरी होगी/
सच कहता हूँ, अच्छा किया, जो हर बात पे “वैरी गुड़ ” नहीं कहा,/
ये अधूरी चाहत मुझे कोई गलत काम नहीं करने देती/
आज हर जुबां मेरे अच्छे कामो पर,
जब मुझे “वैरी गुड” कहती है./
मैं तुम्हे नमन करता हूँ,
ये जीत तुम्हारी होती है/
आज मन भी हंस रहा है, और हंस रहा हूँ मैं……………

-सुधीर तोमर
C-670, Panchsheel Colony
Ajmer, India 305001
09414556307

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