भाजपा में होता है नेता को उसकी हैसियत दिखाने काम

लोकसभा चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में गत चार फरवरी को संसदीय क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान हुए एक वाकये ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि भाजपा में नेता की निजी कोई हैसियत नहीं होती। होती भी है तो उसे नकार दिया जाता है। असल में उसके पीछे सोच यही है कि नेता अपने आप में कुछ नहीं होता। जो कुछ होता है वह संगठन के दम पर होता है।
हुआ यूं कि जब पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी को मंच पर नहीं बैठाया तो उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज करवाई। उनका तर्क था कि वे तीन लोकसभा क्षेत्रों के प्रभारी हैं और अजमेर में चौथी बार विधानसभा का चुनाव जीते हैं। मगर हाल ही शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष बने शिव शंकर हेडा ने उनके तर्क को यह कह कर नकार दिया कि हाईकमान के निर्देशों के तहत उन्हें मंच पर नहीं बैठाया जा सकता। इस बारे में कुछ लोगों का मानना है कि अगर देवनानी को मंच पर बैठाया जाता तो भी कोई पहाड़ नहीं टूटने वाला था, मगर हेडा ने प्रदेश के निर्देशों की आड़ में देवनानी को उनकी हैसियत दिखाने की कोशिश की। दोनों के बीच नाइत्तफाकी सर्वविदित ही है।
खैर, बात भाजपा की रवायत की। इस संगठन में किसी भी नेता की हैसियत संगठन ही तय करता है। लाल कृष्ण आडवाणी के इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। जिसने पूरी जिंदगी संगठन को सौंप दी और संगठन को फर्श से अर्श तक लाए, आज उसे हाशिये पर धकेल दिया गया है। ऐसा ही भूतपूर्व उपराष्ट्रपति व भूतपूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के साथ हुआ। कभी राजस्थान के एक ही सिंह कहलाने वाले शेखावत जब उपराष्ट्रपति पद से रिटायर हो कर राजस्थान लौटे तो उनकी जमीन खिसका दी गई। वसुंधरा का खौफ इतना था कि भाजपा नेता उनका औपचारिक स्वागत करते तक से कतराते थे। बात अगर स्थानीय स्तर की करें तो पांच बार सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत, पूर्व विधायक नवलराय बच्चानी, पूर्व विधायक हरीश झामनानी की आज क्या हालत है, किसी से छिपी नहीं है।

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