मुंबई, 2 सितंबर 2026: विश्व अल्ज़ाइमर माह के मौके पर टाटा ट्रस्ट्स ने डिमेंशिया की ओर ध्यान खींचा है। यह स्वास्थ्य से जुड़ी एक बड़ी चुनौती है, जो भारत की बुजुर्ग आबादी को हमारे अंदाजे से पहले अपनी चपेट में ले सकती है। ट्रस्ट्स का अभियान ‘वजूद रहे मौजूद’ कहता है कि सिर्फ प्रभावित परिवारों को ही नहीं, बल्कि पूरे इकोसिस्टम के स्तर पर हमें जल्द कदम उठाने होंगे।
भारत की बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि 2050 तक भारत में 60 साल और उससे ऊपर के लोगों की संख्या 34.7 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी। यह आबादी करीब उतनी ही होगी, जितनी आज पूरे अमेरिका की है। इस बदलाव से भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, परिवारों और देखभाल के ढांचे पर पड़ने वाली जिम्मेदारियां जड़ से बदल जाएंगी। ऐसे में बुढ़ापा और उससे जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियां, जिनमें डिमेंशिया भी शामिल है, शोध और कदम उठाने का फौरी क्षेत्र बन जाती हैं।
अल्जाइमर्स एंड डिमेंशिया जर्नल के मुताबिक, आज भारत में अनुमानित 88 लाख बुजुर्ग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं। एक दूसरे अध्ययन में यह बात सामने आई कि भारत में डिमेंशिया के करीब 90 प्रतिशत मामलों की जांच ही नहीं हो पाती। यह चुनौती तेजी से बढ़ रही है। एम्स और यूएससी के 2023 के एक अध्ययन का अनुमान है कि 2036 तक डिमेंशिया के साथ जी रहे भारतीय बुजुर्गों की संख्या 1.69 करोड़ तक पहुंच सकती है, यानी यह आंकड़ा उम्मीद से पहले ही करीब दोगुना हो जाएगा। इससे साफ है कि भारत की कोशिश जल्द पहचान तक ही सीमित नहीं रह सकती। उसे डिमेंशिया का ज्यादा मजबूत और सहयोग पर टिका इकोसिस्टम भी खड़ा करना होगा।
कैम्पेन की फिल्म में मनोचिकित्सकों, न्यूरोलॉजिस्ट और बुजुर्गों के इलाज के विशेषज्ञों के अनुभव हैं, और साथ ही देखभाल करने वालों तथा शुरुआती चरण के डिमेंशिया के साथ जी रहे मरीजों के अपने अनुभव भी। ये अनुभव यह बात सामने रखते हैं कि डिमेंशिया सिर्फ याददाश्त छीनने वाली बीमारी नहीं है। इसमें मरीज धीरे-धीरे अपने होने का एहसास ही खोता चला जाता है। इसीलिए ‘वजूद रहे मौजूद’ डिमेंशिया को लेकर जागरूकता बढ़ाने के साथ हमसे यह भी कहता है कि शुरुआती लक्षणों पर नजर रखें और उन्हें बुढ़ापे का असर मानकर टाल न दें।
इस अभियान की अहमियत पर टाटा ट्रस्ट्स के सीईओ श्री सिद्धार्थ शर्मा ने कहा, “अगले तीन दशकों में डिमेंशिया भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे अहम बातचीत में से एक होगा। हमारी कोशिश है कि भारत में डिमेंशिया को लेकर एक साझा समझ बने, जो सबूतों पर टिकी हो। ऐसी समझ, जो बीमारी से आगे बढ़कर उस व्यक्ति और उसकी देखभाल करने वाले की असल जिंदगी को देखे, और उनके इर्द-गिर्द देखभाल का पूरा इकोसिस्टम खड़ा करे।”
यह अभियान बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में टाटा ट्रस्ट्स के बड़े काम पर टिका है, जिसमें बुढ़ापे को स्वास्थ्य से आगे बढ़कर विकास की प्राथमिकता माना गया है। इस क्षेत्र में ट्रस्ट्स का शुरुआती काम, जिसमें तेलंगाना में शुरू की गई एल्डर स्प्रिंग हेल्पलाइन शामिल है, एल्डर लाइन (14567) की बुनियाद बना। बाद में भारत सरकार ने एल्डर लाइन को पूरे देश में फैलाया, जिससे बुजुर्गों तक जानकारी, काउंसलिंग और मदद की पहुंच बढ़ी।
इन अनुभवों के आधार पर ट्रस्ट्स ने अपना दायरा बढ़ाया और बुजुर्गों की देखभाल के पूरे इकोसिस्टम को मजबूत करने की ओर बढ़े। इसमें सामाजिक मेलजोल के केंद्र, देखभाल का ढांचा खड़ा करना और मानसिक स्वास्थ्य की उन चिंताओं की ओर ध्यान दिलाना शामिल है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। डिमेंशिया भी उन्हीं में से एक है। इसी के तहत सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च की टाटा लॉन्गिट्यूडिनल स्टडी ऑन एजिंग (टीएलएसए) को सहयोग दिया जा रहा है, ताकि समुदाय पर आधारित शोध से डिमेंशिया को लेकर सबूत जुटाए जा सकें। साथ ही डिमेंशिया इंडिया अलायंस को भी सहयोग दिया जा रहा है, ताकि डिमेंशिया के साथ जी रहे लोगों और उनकी देखभाल करने वालों के लिए जागरूकता, क्षमता तथा मदद और देखभाल का सिलसिला बेहतर हो। ये सारी कोशिशें मिलकर उस ढांचे, जानकारी और क्षमता को पुख्ता करना चाहती हैं, जो भारत की बुजुर्ग होती आबादी की बदलती जरूरतों का जवाब देने के लिए चाहिए।
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए स्वास्थ्य के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. अनुरा कुरपाड ने कहा, “लोग अक्सर याददाश्त, व्यवहार या रोजमर्रा के कामकाज में आए बदलाव को बुढ़ापा कहकर टाल देते हैं। लेकिन ये बदलाव डिमेंशिया के शुरुआती संकेत हो सकते हैं और इन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। डिमेंशिया का इलाज अभी मौजूद नहीं है, फिर भी जल्दी हुई जांच बहुत कुछ बदल सकती है। इस विषय पर मौजूद अध्ययन बताते हैं कि बचाव के लिए एक अहम दौर होता है। हमें उस दौर का इस्तेमाल करना होगा और डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और जीवनशैली से जुड़ी ऐसी दूसरी जोखिम वजहों पर व्यवस्थित तरीके से काम करना होगा, जिन्हें बदला जा सकता है।”
डिमेंशिया की देखभाल में मौजूद कमी पर डिमेंशिया इंडिया अलायंस की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुश्री रमणी सुंदरम ने कहा, “डिमेंशिया की जल्द पहचान करना पहला जरूरी कदम है, पर यह अकेले काम नहीं कर सकता। आज भारत में पूरी तरह से चलने वाले डिमेंशिया केयर सेंटर 50 से भी कम हैं। हमें ज्यादा मजबूत और आपस में जुड़ा डिमेंशिया इकोसिस्टम चाहिए। ऐसा इकोसिस्टम, जो मरीजों और उनकी देखभाल करने वालों का साथ दे, परिवारों को इस मुश्किल सफर से गुजरने के लिए साधन और जानकारी दे, और स्वास्थ्य सेवा, समुदाय, कार्यस्थल और नीति बनाने वालों को साथ लाकर समय रहते असरदार जवाब दे सके।”
इस पहल को अपने सहयोग के जरिए टाटा ट्रस्ट्स स्वास्थ्य सेवा देने वालों, नीति बनाने वालों, कॉरपोरेट नियोक्ताओं और समुदायों से कहते हैं कि वे शुरुआती चेतावनी के संकेतों को पहचानें और जल्द चिकित्सकीय स्क्रीनिंग को प्राथमिकता दें, ताकि मरीज जितने लंबे समय तक संभव हो, अपनी गरिमा, अपने फैसले लेने की क्षमता और जीवन की गुणवत्ता बनाए रख सकें।