लखनऊ । विधानसभा में न्यायपालिका और विधायिका के बीच की तल्खी एक बार फिर देखने को मिली। जौनपुर के मुंगरा बादशाहपुर के पुलिस सबइंस्पेक्टर राघवेंद्र सिंह के तबादले पर हाईकोर्ट ने स्टे देते हुए जिस तरह की टिप्पणी की है उस पर सभी दलों ने कड़ी आपत्ति जताते हुए विधानसभा अध्यक्ष से कड़े कदम उठाने की मांग की। सभी ने कोर्ट की टिप्पणी को बेहद गंभीर बताते कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देने का काम किया जा रहा है। कोर्ट के ऐसे रवैये से प्रजातंत्र को चलाने के लिए बनी राजनीतिक व्यवस्था ही ध्वस्त हो जाएगी।
अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने कहा कि सदन की कार्यवाही पर टिप्पणी करने का हक किसी को नहीं है। उन्होंने सरकार को निर्देश दिया कि एडवोकेट जनरल को सदन की भावना से अवगत कराया जाए। अध्यक्ष ने कहा कि इस संबंध में विचार करने के लिए सभी दलों की बैठक बुलाई जाएगी। शून्यकाल के दौरान सदन में भाजपा की सीमा द्विवेदी ने औचित्य का प्रश्न उठाते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर जिस एसआइ का सरकार ने तबादला कर दिया था वह कोर्ट से स्टे लेकर चौथी बार फिर मुंगरा बादशाहपुर में तैनात हो गया है।
भाजपा के हुकुम सिंह ने कोर्ट के स्टे आर्डर का हवाला देते हुए कहा कि उसमें कोर्ट का जो नजरिया रहा है वह गंभीर है। कोर्ट द्वारा एसआई के तबादले को प्रथम दृष्टया जनहित में न मानते हुए उसे राजनीतिक हित में स्थानीय विधायक को खुश करने के लिए किया जाना बताया गया है। संसदीय कार्यमंत्री मुहम्मद आजम खां ने कहा कि जरूरी नहीं कि सभी सदस्य खराब हों इसलिए टिप्पणी ठीक नहीं है। विधायक तो जनता के हित में ही काम करते हैं, उनका खुद का क्या हित होता है? उन्होंने कहा कि कोर्ट का जो रुख है उससे तो प्रजातंत्र ही नहीं रह जाएगा। पूरी राजनीतिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। आजम ने कहा कि कोर्ट का नजरिया कहीं न कहीं चुनी हुई व्यवस्था के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए। कांग्रेस के प्रमोद तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज के फैसले का जिक्र करते कहा कि उसमें साफ है कि विधायक संस्तुति नहीं करेगा तो क्या करेगा। मंत्री राजेन्द्र सिंह राणा ने कहा, संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देने का काम किया जा रहा है।