मूर्ति के दर्शन के वक्त आंखें बंद न किया कीजिए

आंख एक खिड़की है, अच्छी व उपयोग चीजें ही अंदर आने दें
आंख हमारे शरीर की एक खिड़की है, जिसके माध्यम से हम बाह्य जगत से जुड़ते हैं। यूं ध्वनि व स्पर्श के जरिए भी हम ब्रह्मांड से संपर्क में हैं, लेकिन दृश्यमान जगत से संबंध का माध्यम तो नेत्र ही हैं। उसी के जरिए हम जगत से जुड़े अनुभव आत्मसात करते हैं, जिसे कि दर्शन कहते हैं। इसकी बड़ी महत्ता है। इसका हम पर सीधे प्रभाव पड़ता है। इसी कारण महात्मा गांधी ने यह स्लोगन दिया कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत करो। तात्पर्य ये है कि अगर हम बुरा देखेंगे तो हमारे भीतर बुरे विचार आएंगे। बुरा सुनेंगे तो बुरे ख्याल मन में प्रवेश करेंगे और अंतत: हम बुरा करने लग जाएंगे। कामुक दृश्य देखने को भी इसलिए मना किया जाता है क्योंकि उससे मन काम-वासना से भर जाता है। इसी प्रकार हिंसक फिल्में देखेंगे तो मन में हिंसा का भाव जागृत होगा।
आइये, अब विषय के विस्तार में चलते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि सुबह जागने पर दोनों हथेलियों को जोड़ कर उसके दर्शन करने चाहिए। इससे शुभ दिन की शुरुआत होती है। इसके लिए एक श्लोक सर्वविदित है-
ओम् कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती।
करमूले च गोविंद, प्रभाते कुरुदर्शनम्।।
अर्थात हथेली के सबसे आगे के भाग में लक्ष्मी, मध्य भाग में सरस्वती और मूल भाग में श्रीगोविंद निवास करते हैं। यानि कि जुड़ी हुई हथेलियों को देखने से मां लक्ष्मी, मां सरस्वती व परात्पर परब्रह्म गोविंद के दर्शन होते हैं।
शास्त्रानुसार दोनों हाथों में कुछ तीर्थ भी होते हैं। चारों उंगलियों के सबसे आगे के भाग में देव तीर्थ, तर्जनी के मूल भाग में पितृ तीर्थ, कनिष्ठा के मूल भाग में प्रजापति तीर्थ और अंगूठे के मूल भाग में ब्रह्म तीर्थ माना जाता है। इसी तरह दाहिने हाथ के बीच में अग्नि तीर्थ और बाएं हाथ के बीच में सोम तीर्थ व उंगलियों के सभी पोरों और संधियों में ऋषि तीर्थ है।
शिव स्वरोदय में बताया गया है कि सुबह उठने पर नासिका में जिस तरफ का स्वर चल रहा हो, उसी तरफ के हाथ से सबसे पहले धरती पर स्पर्श करना चाहिए। उसी के दर्शन करने चाहिए। चूंकि धरती को माता माना गया है, इसलिए सुबह उठते ही धरती पर अपने पैर रखने से पहले माता से क्षमा याचना इन शब्दों में करनी चाहिए-
ओम् विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमश्वमेव।

दर्शन से हम कितने प्रभावित होते हैं, इसका एक उदाहरण देखिए। किसी अनजान व्यक्ति को देखने मात्र से सुखद अनुभूति होती है, जबकि किसी के दर्शन से मत वितृष्णा से भर जाता है। ऐसा क्यों? क्योंकि हर व्यक्ति का अपना आभा मंडल होता है। जैसी उसकी आभा होगी, वैसी ही अनुभूति होगी। इसी सिलसिले में दर्शन से जुड़े एक श्लोक को भी अपने संज्ञान में लीजिए-
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधव:।
कालेन फलते तीर्थं सद्य: साधुसमागम:।।
अर्थात संत-महात्माओं के दर्शन मात्र से ही पुण्य की प्राप्ति हो जाती है, क्यों कि वे तीर्थों के समान पवित्र होते हैं। तीर्थवास करने का सुपरिणाम तो कुछ समय के पश्चात ही प्राप्त होता है, परन्तु संतों की सत्संगति का सुपरिणाम तुरन्त ही प्राप्त होता है।
दर्शन कितना असर डालता है, इसका अंदाजा हमारे यहां प्रचलित मान्यता से होता है। बुरा दिन बीतने पर कहा जाता है कि आज सुबह न जाने किसका मुंह देख लिया? घर से बाहर प्रस्थान करने पर पानी से भरा घड़ा लिए हुए स्त्री, झाडू लगाती सफाई कर्मचारी, शव यात्रा आदि के दर्शन को शुभ माना जाता है।
दर्शन का एक बारीक तथ्य समझिए। हनुमान जी तो एक हैं, मगर उनकी अनेक मुद्राएं हैं। आप जिस मुद्रा पर ध्यान एकाग्रचित्त होंगे, वैसे ही गुण आपके भीतर प्रविष्ट करेंगे।
वास्तुशास्त्री बताते हैं कि घर में बने मंदिर में एक ही भगवान की एकाधिक मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए। विशेष रूप से अगर दोनों मूर्तियां आसपास या आमने-सामने हों तो उनके दर्शन करने से घर में क्लेश होता है। इसी प्रकार खंडित मूर्ति के दर्शन करने को अच्छा नहीं माना जाता। खंडित दर्पण में स्वयं को देखने, खंडित पात्र में खान-पान को वर्जित माना गया है।
एक महत्वपूर्ण बात। कई लोग मंदिर जाने पर मूर्ति के आगे खड़े हो कर आंखें बंद करके प्रार्थना करते हैं, वह गलत है। सदैव मूर्ति के दर्शन करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए, तभी सुफल मिलता है। उसके सतत दर्शन करते रहिए और उसकी ऊर्जा को भीतर प्रवेश करने दीजिए। सीधी सी बात है कि दर्शन के जिस प्रयोजन से हम मंदिर गए हैं तो मूर्ति के सामने आंखें बंद करने से वह प्रयोजन ही बेकार हो जाएगा।
ऐसा नहीं कि केवल दृश्य ही हम प्रभाव डालता है। हमारे भाव पर भी निर्भर करता है कि हम किसी दृश्य को किस भाव से देखते हैं। कोई सज्जन किसी स्त्री को देख कर उसमें मां या बहिन का रूप देखता है तो कोई दुर्जन किसी पर स्त्री को देख कर वासना से ग्रसित हो जाता है। तभी तो कहा जाता है कि कोई सुरूप है या कुरूप, यह हमारी दृष्टि पर निर्भर करता है।

-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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