चंदन सिंह भाटी
जैसलमेर पश्चिमी राजस्थान का सरहदी पीत पाषाणों और दुर्गम रेगिस्तानी शहर
जैसलमेर में कोरोना ने भले ही पर्यटन को लील लिया मगर पर्यटक अब नव वर्ष
का स्वागत करने जैसलमेर आने को आतुर हैं ,लम्बे समय बाद क्रिसमस
सेलिब्रेशन के लिए कोई दस हजार से अधिक पर्यटक जैसलमेर पहुंचे ,अब नव
वर्ष संध्या पर पर्यटकों का बूम आने की सम्भावना हैं ,पर्यटकों को यहां
की पीले पत्थर की नक्कासीदार हवेलिया किले प्रभावित करते ,हैं मगर
पर्यटकों सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र हे कैमल राइडिंग ,सम ,खुहड़ी के
मखमली ,लहरदार धोरों के ऊपर सज्जे धज्जे ऊंट सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र
होते हैं ,इन ऊंटों के श्रृंगार में ऊंट मालिक बीस से पच्चीस हजार रूपये
खर्च करते हैं ,ऊंटों का श्रृंगार महिलाओं के श्रृंगार से भारी होता हैं
,जितना अधिक ऊंट श्रृंगारित होगा पर्यटकों में उसकी ज्यादा मांग होने के
साथ ऊंट सवारी की मुंहमांगी कीमत भी मिलती हैं ,यही ऊंट मालिक के रोजगार
का साधन होता हैं ,
सलामत खान , जो जैसलमेर से 40 किलोमीटर दूर एक गाँव की एक ढाणी में रहते
हैं, वो गोरी को अल्हड़ युवती की तरह सजाएँगे.पहले होगा विशेष केश
विन्यास, फिर सोलह श्रृंगार. बोरला, नथ, घुंघरू, लूम्बी बाँधने के बाद
चमचम करते शीशे की कारीगरी के वस्त्र धारण करवाए जाएंगे और इसका खर्चा
बैठेगा मात्र 20 -25 हज़ार रुपए.
साज-श्रृंगार की कथा में नया क्या है, यह तो घर-घर की कहानी है? है
जनाब, ये गोरी किसी गाँव की सामान्य युवती नहीं है, बल्कि एक ऊँटनी
है!गोरी थार रेगिस्तान में अकेली श्रृंगार-प्रेमी ऊंटनी नहीं है.
राजस्थान के मरू प्रदेश के दर्ज़नों ऊँट मेलों के अवसर पर ब्यूटीशियन के
पास करीने से संवरने जाते हैं.
इसे शहरीकरण का असर कहें या व्यावसायिक मजबूरी, ऊँट-साज ख़ुद को
ब्यूटीशियन और अपने घर, झोंपड़े, टेंट को पार्लर कहलाना ज़्यादा पसंद करते
हैं.आज से कुछ वर्ष पहले ऊँटों का श्रृंगार करने वाले लोग जैसलमेर और
बाड़मेर के गाँव-गाँव में हुआ करते थे. ये सामान्यतः ऊँट-पालक प्रजातियों
जैसे रेबारी और देवासी परिवारों के सदस्य थे.पर ऊंटों की घटती संख्या के
साथ ऐसे लोग भी कम होते गए. इसका असर ये हुआ की ऊंटों की श्रृंगार कला,
इसे खांटी मारवाड़ी में ‘लव’ करना कहा जाता है, अब सिर्फ कुछ विशेषज्ञों
के पास सिमट कर रह गई है.
पर्यटन व्यवसायी शैतान सिंह देवड़ा , “ऊंटों का लव (श्रृंगार )करना पहले
एक सामान्य ग्रामीण कला थी. प्रतिष्ठित और धनाढ्य परिवारों के लोग खाली
समय में अपने ऊँट की सज्जा रेबारी और देवासी लोगों से करवाते थे, बदले
में कुछ अन्न, धान दे देते थे.”वे कहते हैं, “चूँकि अब लोग कम रह गए तो
यह कला अब व्यवसाय के रूप में परिवर्तित हो गई है. बचे-खुचे ब्यूटीशियन
अब पैसा बना लेते हैं, अपनी मांग ज़्यादा और आपूर्ति कम होने के कारण.”
आज से कुछ वर्ष पहले तक ऊंटों का श्रृंगार दो कारणों से किया जाता
था.पहला उन्हें अलग पहचान देने के लिए, दूसरा मालिक का सामाजिक रसूख
जताने के लिए. जितना रईस मालिक, उतना सजा-धजा उसका ऊँट. पर अब यह काम
मेलों में आने वाले सैलानियों के लिए होता है.जैसलमेर और बाड़मेर में
ऊंटों के लिए सालाना जलसे होते हैं. इनमें सबसे मशहूर जैसलमेर का मरू
उत्सव माघ पूर्णिमा से तीन दिन पहले शुरू हो कर ख़त्म होता है.इसमें मेले
में करीब 50,000 पर्यटक और 300-400 ऊंट आते हैं. इस बार मरू मेला कोरोना
की भेंट चढ़ने के कारन निरस्त हो जाने से पर्यटक नए साल के उत्सव में
शामिल को आतुर हैं ,
देवड़ा के अनुसार राजस्थान में ऊंटों की संख्या हर साल 10 प्रतिशत की दर
से घट रही है. इसके कई कारण हैं, जैसे कि सड़कों का फैलाव, गाड़ियों का चलन
और चरागाहों का अभ्यारण्यों में शामिल हो जाना.
जैसलमेर में पहले हर घर के आगे ऊंटों की संख्या गृहस्वामी की संपन्नता
का प्रतीक होती थी. पर अब समय बदल गया है. उनके खुद के परिवार में भी
पहले ऊँट हुआ करते थे, पर अब उनकी जगह वाहन खड़े होते हैं. “जजमान कम होने
से कारीगर भी विलुप्त होते जा रहे है. अगर ये मेले नहीं होते तो ‘लव’
करना ख़त्म हो गया होता.”विलुप्त होती इस कला को बचाने में मेलों से मदद
मिली है. ऊंट प्रेमी और विशेषज्ञ कहते हैं ऐसे आयोजन और होंगे तो कारीगर
बचे रहेंगे और गाँव की गोरियां भी सजती रहेंगी.