हमारे अंतरंग के भावों में परिवर्तन होना ही भक्ति है : आचार्य

जयपुर । श्री दिगंबर जैन मंदिर वरुण पथ मानसरोवर में चल रहे चातुर्मास के अंतर्गत परम पूज्य आचार्य गुरुवर विवेक सागर जी महाराज ने उपस्थित बंधुओं से कहा की अरिहंत भक्ति भावना जीव जगत के कर्मों की निर्जरा करने में सहायक होती है सोलह कारण भावना में दो प्रकार की व्यवस्था है एक भावना दूसरी भक्ति अपने अंतरंग विचारों का अध्ययन करके 10 प्रकार की भावनाओं से आपका मार्ग प्रशस्त हो गया तो आप भक्ति करने के योग्य हैं भक्ति के लिए चार प्रकार के सोपान होते हैं पूज्य पुरुष के गुणों में अनुराग होना ,पूज्य पुरुष का स्मरण करना, समान गुणों की प्राप्ति का प्रयत्न करना एवं उनके गुणों को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करना चिंतन करना क्योंकि किसी के प्रति अनुराग होगा तभी उसका स्मरण होगा किसी में अच्छाई होगी तो तभी उस महापुरुष को स्मरण किया जाएगा ऐसे ही हमारे अरिहंत भगवान के गुणों का अनुराग ही हमें उनके पास ले जाने के लिए बाध्य करता है अचेतन जिन प्रतिमाओं का स्वरूप वितरागीता है इनकी पूजा भक्ति से अरिहंत के स्वरूप का पता चलता है वीतराग मुद्रा को देखने से हमारे अंतरंग के भागों में परिवर्तन होना परिणामों में निर्मलता आना संसार से पार पाने में अपनी आत्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में निमित्त बनती हैं भक्ति से फल तभी प्राप्त होता है जब आपके मन में समर्पण का भाव आए ।
अध्यक्ष एम पी जैन ने बताया की इस अवसर पर परम पूज्य मुनि श्री 108 वैराग्य सागर जी महाराज ने उपस्थित बंधुओं को मंगल आशीर्वाद देते हुए कहा की जैन दर्शन में आज सोलह कारण भावना के अंतर्गत अरिहंत भक्ति भावना का महान दिवस है राग द्वेष के द्वारा जो पापों का बंध होता है उसको नष्ट करने के लिए अरिहंत भक्ति भावना होती है भक्त भगवान की भक्ति एवं दान करने से तथा मन वचन काया से शुद्धि पूर्वक भक्ति करना विनय भाव रखना अष्ट द्रव्य से पूजा करना पूजन करने से कर्मों की निर्जरा होती है एवं पुण्य का बंध होता है बंधुओं भगवान की भक्ति करते समय हमारी मुद्रा केवल और केवल वीतराग प्रभु पर केंद्रित होनी चाहिए संसार में सबसे बड़ा मंत्र तंत्र और औषधि यदि कोई है तो वह केवल वीतराग प्रभु का स्मरण करना क्योंकि तीर्थंकरों के पुण्य की विशेषता है कि देवता भी उनका अभिषेक कर पुणे का बंध प्राप्त करते हैं ।
प्रचार संयोजक विनेश सोगानी ने बताया कि धर्म सभा का मंगलाचरण के माध्यम से विधिवत शुभारंभ बीरेश जैन टीटी ने किया एवं भगवान महावीर स्वामी व तपस्वी सम्राट आचार्य रत्न सुमति सागर जी महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर परम पूज्य आचार्य गुरुवर विवेक सागर जी महाराज का पाद प्रक्षालन कर शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य बाबूलाल बिंदायका को प्राप्त हुआ । इस अवसर पर सभी सम्माननीय अतिथियों का तिलक एवं माल्यार्पण कर बीरेश जैन टीटी, विनेश सोगानी, राजेंद्र सोनी, मंजू बाकलीवाल एवं मंजू कासलीवाल ने स्वागत किया।

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