केंद्रिय अस्पताल के ताले, कैसे मिले मरीजों को चिकित्सा

-मूलचंद पेसवानी- गंगापुर। जहां सरकारें आमजन को बेहतर चिकित्सा सुविधाऐं देने का दावा कर रही है वही गंगापुर उपखण्ड मुख्यालय पर स्थित भारत सरकार के श्रम एवं नियोजन मंत्रालय , अभ्रक खान श्रम हितकारी कोष राजस्थान द्वारा निर्मित केन्द्रीय अस्पताल पर कई सालो से ताले लग जाने से शानदार भवन समेत करोडो की सम्पति बेकार पडी हुई है वही इसको राज्य सरकार को सुपूर्द नही किये जाने से राजकीय विभाग संचालित किये जाने में दिक्कत आ रही है। केन्द्रीय मंत्री डाॅ. सी. पी. जोशी के जिले से सांसद निर्वाचित होने पर अस्पताल की समस्या दुर होने की आस जगी थी परन्तु कार्यकाल खत्म होने तक भी किसी प्रकार के सकारात्मक संकेत नही मिलने से यह आस भी अधुरी ही लगती है। जानकारी के अनुसार राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. मोहन लाल सुखाडिया ने 30 अक्टुबर 1960 को क्षैत्र के अभ्रक खान पर कार्य करने श्रमिको का निःशुल्क उपचार कराने के उद्देश्य से अस्पताल का शिलान्यास किया था। अस्पताल के शुरूआत में हर दिन करीबन 50 श्रमिक उपचार के लिये भर्ती रहते थे। इन बीमारो मजदुरो को अस्पताल में दवाईयाॅं व दोनो वक्त का भोजन निःशुल्क मिलता था। मरीजो के मनोरंजन के लिये हर पखवाडे ओपन में रात्रिसमय में रूपहले पर्दे पर अस्पताल परिसर में ही हिन्दी फिल्में दिखाई जाती थी जिसका कस्बेवासी भी लूत्फ उठाते थे। मरीजो के लिये पुस्तकालय की सुविधा भी थी। अस्पताल के प्रारम्भिक समय में 4 डाॅक्टर , 10 नर्सिंग स्टाफ , चार मिडवाइफ, 6 लिपिक, 3 सफाईकर्मी, एक – एक लैब टेक्नीशियन व बिजली कर्मचारी , तीन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, एक वाहन चालक , एक रेडियोग्राफर , दो रसोईये आदि का स्टाफ दिया गया था। चिकित्साकर्मियो के लिये अस्पताल परिसर में ही आवास सुविधा मुहैया कराई गई थी जो कि ताले लगने के बाद से ही खण्डर में तब्दील हो रहे है। सहाड़ा तहसील क्षैत्र के भूणास,महेन्द्रगढ़,तिलोली,आमली,गुढ़ा व कालीमंगरी का खेडा आदि गांवो में अभ्रक की प्रचूर मात्रा होने के कारण खनन व्यवसाय पूर्ण यौवन पर था। इस अस्पताल में टीबी से ग्रसित ब्यावर व कोटा से मजदुर उपचार हेतु लाये जाते थे। प्रशासनिक व जनप्रतिनिधियो की उदासीनता के चलते बंद हुए  अस्पताल नये सिरे से किसी संस्थान के संचालन की कोशिशे भी नाकाम होती प्रतीत हो रही है।

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