सावन का तीसरा मंगला गौरी व्रत मंगलवार को

कन्याएं और सुहागिनों की मनोकामना होती पूर्ण
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आज यानी छह अगस्त को सावन के तीसरे मंगलवार को कन्याएं और सुहागिनें मंगला-गौरी व्रत रखेंगी। मंगला गौरी का व्रत श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को किया जाता है।

सावन की व्रत तिथियां
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1.पहला मंगला गौरी व्रत (23 जुलाई 2019)
2.दूसरा मंगला गौरी व्रत (30 जुलाई 2019)
3. तीसरा मंगला गौरी व्रत (6 अगस्त 2019)
4.चौथा मंगला गौरी व्रत (13 अगस्त 2019)

मंगला गौरी व्रत का महत्व
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यह व्रत माता पार्वती यानी गौरी को समर्पित है। महाराष्ट्रीयन समाज में यह उनका श्रावण आरंभ होने पर किया जाता है लेकिन अन्य प्रांतों में इसे श्रावण मास के प्रथम मंगलवार से किया जाता है। मंगला गौरी का महत्व हिंदू शास्त्रों में बहुत अधिक बताया गया है। मंगला गौरी के दिन माता पार्वती का व्रत किया जाता है। इस व्रत को करने से सुहागन स्त्रियों को वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है साथ ही जो दंपत्ति नि:संतान है उसे संतान सुख की प्राप्ति होती है। यह व्रत संतान की लंबी आयु के लिए भी किया जाता है। अगर कोई कुंवारी कन्या इस व्रत को करती है तो उसकी शादी में आ रही सभी बाधाएं समाप्त होती है।

मंगला गौरी व्रत की पूजा सामग्री
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एक चौकी, सफेद और लाल कपड़ा, कलश, गेंहू और चावल, आटे का चौ मुखी दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती, कपूर, माचिस, रूई की बत्ती, साफ और पवित्र मिट्टी, साफ और शुद्ध जल, दूध और पंचामृत, मां के लिए लाल वस्त्र, पूजा की सभी सामग्री, 16 तरह के फूल, माला, पत्ते, आटे के लड्डू, फल, पांच तरह के मेवे, 7 प्रकार के अनाज, 16 पान, सुपारी, लोंग, श्रृंगार का सभी समान, श्रद्धा के अनुसार प्रसाद।

मंगला गौरी व्रत की विधि
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1. मंगला गौरी का व्रत श्रावण मास के प्रथम मंगलवार के दिन रखा जाता है। इसके लिए महिलाओं को स्नान करने के बाद कोरे वस्त्र ही धारण करने चाहिए।
2. इसके बाद एक साफ चौकी लेकर पूर्व दिशा की और मुख करके बैठना चाहिए। चौकी पर आधे भाग में सफेद कपड़ा बिछाकर चावल की नौ छोटी- छोटी ढेरी बनानी चाहिए और आधे भाग में लाल कपड़ा बिछाकर गेहुं की सोलह ढेरी बनाएं।
3. इसके बाद थोड़े से चावल चौकी पर अलग रखकर पान के पत्ते पर सातिया बनाएं और उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा रखें और ऐसे ही गेहूं की अलग ढेरी पर कलश स्थापित करें। उस पर पांच पान के पत्ते और नारियल रखें।
4. इसके बाद चौमुखी दीपक में 16 रूई की बत्ती लगाकर जलाएं। दीपक को प्रज्ववलित करने के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद गणेश जी को जनेऊ, रोली -चावल, सिंदूर चढ़ाएं और पूजन करने के बाद भोग लगाएं।
5. गणेश जी के पूजन के बाद एक साफ थाली में मिट्टी लें और उसमें गंगा जल मिलाकर उससे माता गौरी की प्रतिम बनाएं। प्रतिमा बनाने के बाद उसे पंचामृत से स्नान कराएं और वस्त्र धारण कराएं।
6. माता गौरी को श्रृंगार की सभी वस्तुएं अर्पित करें और रोली – चावल, फूल माला, फल, पत्ते. आटे के लड्डू, पान, सुपारी, लोंग, इलायची तथा पांच मेवाओं का प्रसाद रखें।
7. इसके बाद माता की कथा, मंत्र जाप कपने के बाद आरती उतारें। सावन के प्रत्येक मंगलवार इसी तरह पूजन करें और अंत में प्रतिमा को विसर्जन कर दें। जब आपकी मन्नत पूरी हो जाए तब इस व्रत का उद्यापन कर दें।

मंगला गौरी व्रत कथा
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पौराणिक कथा के अनुसार श्रुतिकीर्ति नामक का एक सर्वगुण सम्पन्न राजा कुरु देश नाम के देश में राज करता था। वह अनेक विध्याओं में निपुण था। लेकिन फिर भी वह परेशान और दुखी रहता था। क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी। राजा संतान प्राप्ति के लिए जप, तप, अनुष्ठान और देवी की विधिवत पूजा करता था। देवी राजा की भक्ति- भाव को देखकर बहुत प्रसन्न हो गई और एक दिन राजा को सपने में दर्शन देकर राजा से कहा- हे राजन! मैं तुमसे बहुत अधिक प्रसन्न हूं। मांगो, क्या मांगते हो। राजा ने माता से कहा- हे मां। मैं सभी चीजों से संपन्न हुं। यदि मेरे पास कुछ नहीं है तो वह है संतान सुख।मां मुझे अपना वंश चलाने के लिए एक पुत्र की आवश्यकता है। मां ने राजा से कहा हे राजन! तुमने एक दुर्लभ वरदान मांगा हैं। लेकिन में तुमसे बहुत अधिक प्रसन्न हूं। मैं तुम्हें एक पुत्र का वरदान देती हुं पर वह पुत्र सोलह साल तक ही जीवित रहेगा। माता की यह बात सुनकर राजा और उसकी पत्नी बहुत अधिक व्याकुल हो उठे। सभी बातों को जानते हुए भी राजा और रानी ने माता से फिर भी यही वरदान मांगा। मां के आर्शीवाद से रानी को कुछ महिनों बाद एक पुत्र की प्राप्ति हुई। राजा ने बड़ी धूमधाम से अपने पुत्र का नामकरण संस्कार किया। राजा ने अपने पुत्र का नाम चिरायु रखा। राजा का पुत्र जैसे – जैसे बड़ा होता गया राजा को उसकी मृत्यु की चिंता सताने लगी। राजा ने इस समस्या के समाधान के लिए एक विद्वान से सलाह ली। उस विद्वान ने राजा से कहा कि वह अपने पुत्र का विवाह ऐसी कन्या से कर दे। जो मंगला गौरी का व्रत करती हो। राजा ने अपने पुत्र का विवाह ऐसी ही कन्या से कर दिया। जिसे सौभाग्यशाली और सुहागन रहने का वरदान प्राप्त था। इसके बाद राजा के पुत्र की मृत्यु का दोष भी समाप्त हो गया। इसलिए जो भी स्त्री या कुंवारी कन्या मंगला गौरी का व्रत रखती है। उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद
मो. 9611312076
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