
तेजाजी अपनी घोड़ी लीलण पर बैठ करके डाकुओं का पीछा करने को चल दिए किया, रास्ते में उन्हें एक इच्छाधारी काला नाग आग में जलता हुआ दिखाई दिया तेजाजी ने तुरंत अपने भाले से नाग को आग से बाहर निकाला | नाग उन्हें धन्यवाद देने बोला क्योंकि तुम मेरी मुक्ति में बाधक बने हो इसलिए मे तुमको डसूंगा | तेजाजी बोले नागराज मरते, डूबते व जलते को बचाना मानव का धर्म है, | तेजाजी ने प्रायश्चित स्वरूप नागराज की बात मान ली और नागराज को वापिस लौट आने का वचन देकर सुरसुरा की घाटी में पहुंचें जहाँ मंदारिया की पहाड़ियों में डाकुओं के साथ उनका भंयकर संघर्ष जिसमें तेजाजी के शरीर पर अंको गहरे घाव हो गये और वो लहूलुहान हो गये लडाई मे अनेको डाकू मारे गये इव बाकी के डाकू भाग गये | तेजाजी सारी गायों को लेकर उन्हें पनेर में किन्तु इन गयो मे उसका काणां केरडा नहीं था , उसने तेजा जी को केरडा को लाने के लिए प्राथना की | तेजा जी वापस चलेगये और बचे हुए डाकुओं को मार कर लच्छा को उसका केवड़ा डे दिया |