लो आया नव-वर्ष का पहला त्योहार,
संक्रांति पर्व लाया है खुशियाँ अपार।
हल्की-हल्की चल रही ये ठंडी हवाऍं,
हमारी तरफ से अनेंक शुभकामनाऍं।।
सुबह सवेरे बाजरे की खिचड़ी बनातें,
तिलपट्टी व गुड़ के लड्डू सभी खाते।
गली और मौहल्लों में हम धूम मचाते,
छत पर चढ़कर यह पतंग हम उड़ाते।।
तिल के लडडू तो कोई गजक बनातें,
कोई मूॅंगफली और कोई रेवडी़ लाते।
कोई करते दान धर्म कोई करते पूजा,
सारे भारत में इस दिन उत्सव मनातें।।
त्योंहार है ये एक लेकिन नाम अनेंक,
तमिल नाडु में पोंगल लोहडी पॅंजाब।
असम में मनाते है माघ-बिहू के नाम,
गुजरात में मनाते उत्तरायण ये ख़ास।।
सूर्य नारायण की पूजा करते है सभी,
मिट्टी के बर्तनों में खीर बनातें मीठी।
सुहागिन महिलाओं का ये ख़ास पर्व,
मकर संक्रांति है सुख व समृद्धि पर्व।।
रचनाकार- ✍️
गणपत लाल उदय, अजमेर राजस्थान
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