
मनुष्य को परमात्मा से प्राप्त शरीर को भगवान का प्रसाद मान कर अपनी जिंदगी को एक उत्सव के रूप में जीना चाहिए | मनुष्य अपने जीवन प्रतेयक क्षण को सुखमय और आनन्दित बनाना चाहता है | प्रतेयक पर्वों का धार्मिक सामजिक और वैज्ञानिक महत्व होता है | होली के पर्व का सामाजिक पहलू भी है क्योंकि होली का पर्व परिवार, आस-पडोस,समाज, विभिन्न समुदाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है । होली का पर्व आपसी संबंधों को पुन: जीवित करने और मजबूती के टॉनिक के रूप में भी कार्य करता है | होली के पर्व का सामाजिक पहलू भी है क्योंकि होली का पर्व परिवार, आस-पडोस,समाज, विभिन्न समुदाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है ।
मनुष्य को परमात्मा से प्राप्त शरीर को भगवान का प्रसाद मान कर अपनी जिंदगी को एक उत्सव के रूप में जीना चाहिए | मनुष्य अपने जीवन प्रतेयक क्षण को सुखमय और आनन्दित बनाना चाहता है | प्रतेयक पर्वों का धार्मिक सामजिक और वैज्ञानिक महत्व होता है | होली के पर्व का सामाजिक पहलू भी है क्योंकि होली का पर्व परिवार, आस-पडोस,समाज, विभिन्न समुदाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है । होली का पर्व आपसी संबंधों को पुन: जीवित करने और मजबूती के टॉनिक के रूप में भी कार्य करता है | होली के पर्व का सामाजिक पहलू भी है क्योंकि होली का पर्व परिवार, आस-पडोस,समाज, विभिन्न समुदाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है ।
मनुष्य को परमात्मा से प्राप्त शरीर को भगवान का प्रसाद मान कर अपनी जिंदगी को एक उत्सव के रूप में जीना चाहिए | मनुष्य अपने जीवन प्रतेयक क्षण को सुखमय और आनन्दित बनाना चाहता है | प्रतेयक पर्वों का धार्मिक सामजिक और वैज्ञानिक महत्व होता है | होली के पर्व का सामाजिक पहलू भी है क्योंकि होली का पर्व परिवार, आस-पडोस,समाज, विभिन्न समुदाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है । होली का पर्व आपसी संबंधों को पुन: जीवित करने और मजबूती के टॉनिक के रूप में भी कार्य करता है | होली के पर्व का सामाजिक पहलू भी है क्योंकि होली का पर्व परिवार, आस-पडोस,समाज, विभिन्न समुदाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है ।
दाय और विभिन्न वर्ग के लोगो को स्नेह-सोहार्द सद्दभाव और भाईचारे के अटूट बंधन में बांधता है और उनके बीच में पनपे अविश्वास, शंका, विवादों को मिटाकर पारस्परिक रिस्तों को फेवीकोल के जोड़ जैसा मजबूत बनाता है ।
भारत में होली का त्योहार यों तो वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे,पशु-पक्षी एवं सभी नर-नारी उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है | यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन तक मनाया जाता है। इस वर्ष होलिका दहन 6 मार्च 2023 को धूमधाम से मनाया जाएगा |
सच्चाई तो यही है कि मानव का सम्पूर्ण जीवन विभिन्न रगों का फव्वारा ही है इस फव्वारे रंग प्रति क्षण बदलता रहता है | अग्नि के जैसे आपकी भावनाएं आपको भस्म कर देती हैं। परन्तु जब वे रंगों की फुहार के जैसी होती हैं, तो वे आपके जीवन में आनंद की बरसात बरसती है\ होली रंगों का त्यौहार है। सभी रंगों का उद्गम सफ़ेद रंग से हुआ है पर इन सभी रंगों को आपस में मिलाने पर ये काले रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। जब हमारा मन उज्जवल और चेतना शुद्ध, शांत, प्रसन्न एवं ध्यानस्थ हो तो विभिन्न रंगों एवं भूमिकाओं का जन्म होता है। हमें वास्तविक रूप से अपनी सभी भूमिकाओं को निभाने की शक्ति प्राप्त होती है। हमें अपनी चेतना में बार-बार डुबकी लगानी होगी। यदि हम केवल बाहर ही देखते रहे और आस-पास के बाहरी रंगों से खेलते रहे तो हम अपने चारों ओर अन्धकार पाने के लिए मजबूर हो जाएंगे। अपनी सभी भूमिकाओं को पूरी निष्ठा एवं गंभीरता के साथ निभाने के लिए हमें भूमिकाओं के मध्य गहन विश्राम लेना होगा। गहन विश्राम में बाधा पंहुचाने वाला सबसे बड़ा कारक इच्छाएं हैं। इच्छाएं तनाव की द्योतक हैं। यहां तक कि छोटी सी या तुच्छ इच्छा भी बड़ा तनाव देती है। बड़े-बड़े लक्ष्य अक्सर कम चिंताएं देते हैं ! अधिकतर, इच्छाएं मन को कष्ट देती हैं। इसी कारण से इन्सान को अपनी इच्छाओं को नियन्त्रण करना जरूरी है | सजगता से इच्छाओं की पकड़ कम हो जाती है, और आसानी से नियन्त्रण किया जा सकता है | देवी “कामाक्षी” ने अपने एक हाथ में गन्ना पकड़ रखा है और दूसरे में एक फूल। गन्ना काफी सख्त होता है और उसकी मिठास प्राप्त करने के लिए उसे निचोड़ना पड़ता है। जबकि फूल कोमल होता है और इससे रस निकालना बेहद आसान है। वास्तव में जीवन में भी तो यही होता है। जीवन इन्ही दोनों का मिश्रण है! इस परमानन्द को बाहरी संसार से प्राप्त करने की तुलना में अपने ही भीतर प्राप्त करना काफी आसान है। जबकि बाहरी संसार में इसके लिए बहुत प्रयास करने पड़ते हैं।
होली के दिन लोग रंगों से सराबोर होते हैं. होली से ठीक एक दिन पहले होलिका दहन होता है. होलिका दहन से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है. अगर आप होलिका दहन के दिन कुछ उपायों को प्रयोग करें तो पूरे साल अपने जीवन में खुशहाली और समृद्धि ला सकते है. होली की पूजा करने से महालक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं. तो चलिए बात करते हैं कि होलिका दहन में किन-किन चीजों को करने से जीवन की सभी परेशानियां दूर होती है और घर में सुख संपन्नता का संचार होता है |
भगवान क्रष्ण ने बताया कि स्त्री पुरुष को निष्काम भाव से सात्विक करते हुए उन्हें प्रभु के श्री चरणों में समर्पित कर देना चाहिए इसी वजह से आदि काल से सनातन धर्म में सात्विक, राजसी और तामसी तामसी प्रवृत्तियों को त्यागने को कहा गया में से सुखी जीवन के लिये सात्विक प्रवृत्ति को ही श्रेष्ट माना गया है, राजसी प्रवृत्ति को भी त्याग ने को कहा गया है | होलिका दहन का का वास्तविकता में मतलब है जीवन के रोम रोम में से समस्त दुष्कर्मों और तामसी आदतों का जड़ से समूल नाश और दहन | आप की मजबूत इच्छाशक्ति आपको सारी बुराइयों से बचा सकती है | तामसी प्रवत्ति होली की दिव्य अग्नि में भस्म कर देना ही सच्चा ‘होलिका दहन’ है।
होलिका दहन से पहले सभी परिवार के सदस्यों को हल्दी का उबटन, सरसों तेल में मिलाकर पूरे बदन पर लगाना चाहिए. फिर सूखने के बाद उसे एक कागज में शरीर से छुड़ाकर जमा कर लेना चाहिए. जिसे होलिका दहन के समय होलिका में डालना चाहिए. ताकि होलिका दहन के साथ ही सभी मलिनता भी भस्म हो जाए. मान्यता है कि ऐसा करने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है. तन और मन दोनों से मलिनता का त्याग करने का त्योहार है होली. इसलिए जिन लोगों मनमुटाव या मनभेद है वह सब नाराजगी होलिका में मानसिक रूप से अर्पित करके भस्म कर देनी चाहिए. इसी तरह उबटन से शरीर का मैल निकाल कर उसे भी होलिका की अग्नि में भस्म कर दिया जाता है |वास्तविकता से होल्र्र का पर्व तन और मन दोनों से मलिनता का त्याग करने का त्योहार है|
होली के सम्बन्ध पौराणिक कथाएं
पहली होलिका और भक्त प्रहलाद, दूसरी कामदेव और शिव, तीसरी राजा पृथु और राक्षसी ढुंढी और चौथी श्री कृष्ण और पूतना। लेकिन उक्त सभी में होलिका और भक्त प्रहलाद की कथा ही प्रमुख मानी जाती है होलिका दहन से जुड़ी ये कथाएं और मान्यताएं हमें बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती है। वहीं इनसे समानता और एकता की शिक्षा भी मिलती है।हिरण्यकश्यप राक्षसों का राजा था। उसका पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का परम भक्त था। राजा हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था। जब उसे पता चला कि प्रह्लाद विष्णु भक्त है, तो उसने प्रहलाद को रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रह्लाद के न मानने पर हिरण्यकश्यप प्रहलाद को यातनाएं देने लगा। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को पहाड़ से नीचे गिराया, हाथी के पैरों से कुचलने की कोशिश की, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद बच गया। हिरण्यकश्यप की होलिका नाम की एक बहन थी। उसे वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यप के कहने पर होलिका प्रह्लाद को मारने के लिए अपनी गोद में बैठाकर आग में प्रवेश कर कई। किंतु भगवान विष्णु की कृपा से तब भी भक्त प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। तभी से बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में होली का पर्व मनाया जाता है | यहां हिरण्यकश्यप बुराई का प्रतीक है और प्रह्लाद निश्छलता, विश्वास एवं आनंद का। आत्मा को केवल भौतिक वस्तुओं के प्रति ही प्रेम रखने के लिए सीमित नहीं किया जा सकता। हिरण्यकश्यप भौतिक संसार से मिलने वाला समस्त आनंद चाहता था, पर ऐसा हुआ नहीं। किसी जीवात्मा को सदा के लिए भौतिकता में कैद नहीं रखा जा सकता। इसका अंततः अपने उच्चतर स्व अर्थात नारायण की ओर बढ़ना स्वाभाविक है।
शिवजी और कामदेव को किया था भस्म
इंद्र ने कामदेव को भगवान शिव की तपस्या भंग करने का आदेश दिया। कामदेव ने उसी समय वसंत को याद किया और अपनी माया से वसंत का प्रभाव फैलाया, इससे सारे जगत के प्राणी काम से मोहित हो गए। कामदेव का शिव को मोहित करने का यह प्रयास होली तक चला। होली के दिन भगवान शिव की तपस्या भंग हुई। उन्होंने रोष में आकर कामदेव को भस्म कर दिया तथा यह संदेश दिया कि होली पर काम (मोह, इच्छा, लालच, धन, मद) इनको अपने पर हावी न होने दें।
राजा रघु के राज्य में ढुण्ढा नाम की एक राक्षसी ने शिव से अमरत्व प्राप्त कर लोगों को खासकर बच्चों को सताना शुरु कर दिया। भयभीत प्रजा ने अपनी पीड़ा राजा रघु को बताई। तब राजा रघु के पूछने पर महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि शिव के वरदान के प्रभाव से उस राक्षसी की देवता, मनुष्य, अस्त्र-शस्त्र या ठंड, गर्मी या बारिश से मृत्यु संभव नहीं, किंतु शिव ने यह भी कहा है कि खेलते हुए बच्चों का शोर-गुल या हुड़दंग उसकी मृत्यु का कारण बन सकता है। अत: ऋषि ने उपाय बताया कि फाल्गुन पूर्णिमा का दिन शीत ऋतु की विदाई का तथा ग्रीष्म ऋतु के आगमन का होता है। उस दिन सारे लोग एकत्र होकर आनंद और खुशी के साथ हंसे, नाचे, गाएं, तालियां बजाएं। छोटे बच्चे निकलकर शोर मचाए, लकड़ी या, घास, उपले आदि इकट्ठा कर मंत्र बोलकर उनमें आग जलाएं, अग्नि की परिक्रमा करें व उसमें होम करें। राजा द्वारा प्रजा के साथ इन सब क्रियाओं को करने पर आखिर में : ढुण्ढा नामक राक्षसी का अंत हुआ।
होली के दिन लोग रंगों से सराबोर होते हैं. होली से ठीक एक दिन पहले होलिका दहन होता है. होलिका दहन से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है. अगर आप होलिका दहन के दिन कुछ उपायों को प्रयोग करें तो पूरे साल अपने जीवन में खुशहाली और समृद्धि ला सकते है. होली की पूजा करने से महालक्ष्मी प्रसन्न हो जाती हैं. तो चलिए बात करते हैं कि होलिका दहन में किन-किन चीजों को करने से जीवन की सभी परेशानियां दूर होती है और घर में सुख संपन्नता का संचार होता है.
होली रंगों का त्यौहार है। प्रकृति के जैसे हमारे मनोभावों और भावनाओं के अनेक रंग होते है। प्रत्येक व्यक्ति रंगों का फव्वारा है, जो बदलता रहता है। अग्नि के जैसे आपकी भावनाएं आपको भस्म कर देती हैं। परन्तु जब वे रंगों की फुहार के जैसी होती हैं, तो वे आपके जीवन में आनंद ले आती हैं।रगों का प्रभाव हमारी भावनाओं और संवेदनाओं पर पड़ता है। जैसे क्रोध का लाल, ईर्ष्या का हरा, आनंद और जीवंतता का पीला, प्रेम का गुलाबी, विस्तार के लिए नीला, शांति के लिए सफेद, त्याग के लिए केसरिया और ज्ञान के लिए जामुनी। प्रत्येक मनुष्य रंगों का एक फव्वारा है।
इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी होली पर्व का प्रचलन था | वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है।
सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपनी ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि होली को केवल हिंदू ही नहीं वरन मुसलमान भी हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगलकाल की हैं, इसी काल में अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन भी\ मिलता है। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। उन दिनों में होली का पर्व धार्मिक सौहार्द और पारस्परिक भाई चारे के पर्व के रूप में मनाया जाता था |
होली दहन के दूसरे दिन को धुरड्डी,धुलेंडी,धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, इस दिन बच्चे-बूढ़े,स्त्री पुरुष अपने मनमुटाव मतभेद\ को भुला कर निसंकोच ढोलक, मंजीरे के साथ नाचते गाते हुए टोलियां बना कर आसपास के घरों और दोस्तों तथा रिश्तेदारों के घर पर जाकर उन्हें रगं गुलाल लगाते हैं पुरानी कटुता एवं दुश्मनी को भूल कर आपस में प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं और दुश्फिमनी को छोड़ कर घनिष्रट दोस्त बन जाते हैं | रंग खेलने के बाद देर दोपहर बाद हीस्त्री पुरुष बच्चे बुजुर्ग स्नान करते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर अपने स्वजनों ईष्ट मित्रों पास पड़ोसियों से मिलने उनके घर पर जाते हैं | आजकल किसी सार्वजनिक जगह पर भी होली मिल्न का सामूहिक आयोजन किया जाता है हैं। स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ प्रीति भोज में शामिल होकर मोजमस्तती करते हुए गाने बजाने का प्रोग्राम भी करते हैं |
फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण होली को फाल्गुनी भी कहते हैं । अन्न को होला भी कहते हैं, इसलिए इस पर्व का नाम से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। होली के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत के आरंभ का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादि तिथि भी कहते हैं।
निसंदेह होली का मतलब हो ली यानी जो हो गया सो हो गया अथवा जो बीत गया सो बीत गया | संत कबीर ने सही कहा था “ बीती ताई बिसार दे और आगे की सुध लें “अर्थात जबीत गया उसकी चिंता न करें तथा आगे के लिए जो भी काम करे वो सही करें | घ्रणा की जगह प्रेम करें, दूसरों का सम्मान करें और उनकी बात सुनें | इंग्लिश के शब्द Holy का हिन्दी में मतलब होता है “‘पवित्र” यानि हमारे सारे काम स्वार्थ की जगह समाज, परिवार और देश हित हो।
सही मायने में होली अन्याय पर न्याय की, कटुता पर मधुरता ,नकारात्मकता पर सकारात्मकता, झूठ-फरेब पर सच्चाई,स्नेह, सौहार्द एवं सद्भावना की जीत का पर्व है। इस होली पर हम संकल्प लें कि हम हमारे परिवार,समाज और देश में सभी तरह के भेदभाव और बुराइयों को जला देगें। होली या रंग महोत्सव को स्नेह-प्यार-मोहब्बत का त्यौहार” बनाएंगे। तामसी प्रवृत्ति यानी ईर्ष्या,अनाचार,दुर्भावना क्रोध हिंसा अभिमान असहिष्णुता,अविश्वास रूपी होलिका को होली की दिव्य अग्नि में भस्म कर देना ही सच्चा ‘होलिका दहन’ है। रंगोत्सव यानि होली खेलने की सार्थकता तभी होगी जब हम परमात्मा में श्रद्धा रखते हुए सात्विक विचार, सकारात्मकता,स्नेह, प्रेम, सौहार्द, सहिष्णुता,सहृदयता और करुणा दया के रंग में अपनी अंतरात्मा को आत्मसात कर देगें |
हम सभी जानते हैं कि हमारे आराध्य देव शिवजी के परिवार में बिच्छू , बैल और सिंह , मयूर एवं सर्प बैल और चूहा जैसे घोर विरोधी स्वभाव के प्राणी भी प्रेमपूर्वक साथ साथ प्रेमपूर्वक रहते हैं तो क्यों नहीं हम हमारे समाज एवं देश में बिना किसी भेदभाव के गिरे हुओं को , पिछड़े हुओं को , विभिन्न धर्मों के अनुयायियों को साथ लेकर चल सकते हैं ? जब मुगल काल के अंदर हिंदू मुसलमान मिलकर होली बनाते थे तो आज क्यों नहीं विभिन्न धर्मालंबी होली को परस्पर स्नेह प्रेम और भाई चारे के पर्व के रूप में मिलजुल कर बना सकते हैं | क्यों हम श्मशान कब्रिस्तान मंदिर मस्जिद के व्यर्थ विवादों में उलझे रहतें है ? क्यों हम हिजाब या भगवा के विवाद खड़े करते हैं ? राष्ट्र की प्रगति के लिये हम सभी मिलके क्यों नहीं काम करते हैं? अब तय आपको ही करना है कि इस होली पर भी आप विगत वर्षों की होली के भाति सिर्फ घास फूस जलाने ही जा रहे हैं या फिर अपनी बुराइयों राग द्वेष मनमुटाव को सच्चे दिल से जलाने और भस्म करने का मजबूत संकल्प लेंगे |
डा. जे. के. गर्ग
पूर्व संयुक्त निदेशक कालेज शिक्षा जयपुर