
आत्मा क्या है ?
आत्मा जीव है जबकि शरीर इसका वस्त्र (कपड़ा ) है | आत्मा शरीर द्वारा किये गये कार्यों को मात्र देखती है , किन्तु कभी भी शरीर के द्वारा कियें गये कार्यों का भाग नहीं बनती है | आत्मा अमर है, ना ही आत्मा को उत्पन्न किया जा सकता है ना ही इसे नष्ट किया जा सकता है | भगवान कृष्ण ने गीता मे कहा है “ आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीँ होता है | जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रो को त्याग कर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा अपने पुराने शरीर को त्याग कर दूसरे नये शरीर को प्राप्त होती है “
शरीर एक वाहन के समान है जिसमे आत्मा अपना अस्थाइ निवास बना कर जीवन की यात्रा पूरी करती है | आत्मा अपने परम धाम या गोंलोक धाम या हमारे वास्तविक घर पर वापस लोटने के समय तक एक यात्री के रूप मे होती है |
आत्मा चेतन ( चेतन्य ) है, आत्मा ज्ञान स्वरूप है |
सांसारिक आनंद / वस्तु / कार्यो का आनंद/ उपभोग करने हेतु आत्मा शरीर मै प्रवेश करती है एवं शरीर की म्रत्यु उपरांत आत्मा अपने परम धाम लौट आती है |
आत्मा का उद्देशय क्या है ?
आत्मा का उद्देशय है जीवन-–मरण ( जीवन चक्र ) से मुक्ती ( LIBERATION ) प्राप्त करना, जिससे हम सभी प्रकार के दुःख–दर्द से छुटकारा पा कर परम पिता परमात्मा का आशीर्वाद पा सकेँ और प्रभु की शरणागती प्राप्त कर लें इसी को मुक्ती या मोक्ष प्राप्त करना कहते है
हमेशा याद रखे की मैं मात्र शरीर ( पांच महाभूते/पांच तत्व से निर्मित ) नहीं हूँ किन्तु परम पवित्र , शांत ओर निर्मल आत्मा हूँ, मै आत्मा, इस शरीर से सर्वथा पृथक हूँ, शरीर तो नाशवान है किन्तु मै आत्मा अमर हूँ ( इस आत्मा को भी अस्त्र-शस्त्र काट नहीं सकते है, इसको आग जला नहीं सकती है, इसको जल गीला नहीं कर सकता है, वायु सुखा नहीं सकती है क्योकी आत्मा नित्य ,सर्वव्यापक, अचल और सनातन है | आत्मा का न कोई प्रारम्भ है और ना कोई अंत | )
जीवन मे जब हम आत्मा के कल्याण के बारे मे सोचते है या आत्मा के कल्याण के लिये काम/ कर्म करते है तो निश्चय ही अपनी आत्मा को अपव्यय/ हानि/दुष्कर्मो से बचाते है| जो इन्सान संतुष्ट रहता है वो हमेशा शांतचित्त रहेगा एवं स्थायीत्व को भी प्राप्त होता है, ऐसे शांत चित इन्सान के आस-पास मे रहने वाले उसके मित्र बन जाते है, उसकी प्रशंसा करते है एवं उसका अनुशरण भी करते है| शांत प्रव्रत्ती वाले पुरुष पर हमेशा प्रभु का आशिर्वाद रहता है ओर उस पर प्रभु की दया अनुकम्पा भी होती है | जो आत्म कल्याण के पथ का अनुगामी है उसने जीवन मे सब कुछ प्राप्त कर लिया है एवं उसे ओर किसी वस्तु की चाह नहीं रहती है|
7 “P”( Peace, Preparation, Planning, Purpose, Preventation, Pranam and Prayer ) के द्वारा आत्मा का विवेचन :-
P 1—–यंहा P1 का अर्थ “ शांती “(Peace) है | जहाँ शांती है वहां स्थिरता है | विभिन्न पुरुषों से व्यवहार, भिन्न-भिन्न परिस्थियों का सामना करने एवं जीवन मे लक्ष्यों की प्राप्ती हेतु हमारे अंतर्मन का शांत होना और उसका अविचल रहना जरुरी है | जो जैसा है उसे उसी रूप मे स्वीकार करें तथा जीवन मे सफलता पूर्वक काम करने की भी जिम्मेवारी लें | मुश्किल समय मे भी सफलता के बीज खोज कर सफलता प्राप्त करने के लिये प्रयास रत रहें , ओर अंतरमन की शांती के लिए हमेशा शांत रहें, मन ( mind) को तनाव मुक्त रखें |
P2—–यंहा P 2 का अर्थ “तैयारी “ (Prepration) से है | हम सबको यह याद रखना होगा की हमे सब कुछ यंही पर छोड़कर, वापस अपने असली घर को जाना होगा इस लिये जिन वस्तुओं को हम अपना मानते है, (जो वास्तव मे हमारी है ही नहीं ) को छोड़ने के लिये हमे अपने आपको मानसिक एवं अध्यात्मिक रूप से तैयार करना होगा | प्राचीन वैदिक धर्म-परम्परा, ऋषी- मुनी एवं योगी हमे सिखाते हैं की हर सुबह को नया जीवन व् रात्री को मत्यु के रूप मे स्वीकार करें | हर दिन मरने की कला और भूत काल को भूलने की क्षमता का होना अति आवश्यक है |
P3—यंहा पर P 3 का अर्थ “ योजना “ ( Planning ) से है | मन मे प्रश्न उठता है की हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त एवं अर्जित करने हेतु किस प्रकार की योजना ( Planning ) बनानी चाहिए ? या हमे घटना के घटित हो जाने का इंतजार करना चाहिए ? समय से पूर्व कार्य योजना बनाना बहुत जरुरी होता है, याद रखे की हम भविष्य की अनावश्यक चिंता कर अपने वर्तमान को ही भूल कर अपना ही अहित कर रहे हैं और चिंताओं को निमत्रण भी दे रहें हैं |
P4——P4 से अर्थ अपने जीवन का “लक्ष्य (उद्देश्य) ( Purpose ) “ निर्धारित करना | हमें अपने जीवन के लक्ष्य की पहचान कर उसे प्राप्त करने की कार्य योजना भी बनानी होगी | हमे यह भी सोचना होगा की हमारे पास, जो हमारी अपनी आवश्यकता से अधिक है, उसका क्या करना है ? क्या हमे इसे दूसरों के साथ सांझा करना चाहिए ? | हमारा जन्म क्यों हुआ ? मेरी योग्यता ( skill) क्या है ? याद रखे जिस प्रकार हर इलेक्ट्रान अपने आप मैं विशीष्ट होता हैं, इसी प्रकार हर प्राणी भी अपने आप मे विशीष्ट ( unique ) होता हैं और हम सभी एक विशेष प्रयोजन –लक्ष्य प्राप्ती हेतु जन्म लेते हैं | सबसे महत्वपूर्ण बात है अपने जीवन के लक्ष्यों की पहचान करना और उसे प्राप्त करने की कोशिश करना |
P5 —–यहाँ P5 का अर्थ है “निरोध/बचाव/रोकथाम” ( prevention) से हैं | शोधकर्ताओं ने मालूम किया है की जीवन मैं घटित होने वाली 100 दुर्भाग्यपूर्ण ( unpleasant ) घटनाओं मैं से 90% घटनाएँ स्वंय के द्वारा निर्मित होती है जबकि मात्र 10 % ही स्वाभाविक होती हैं | हमारी इन 90% दुर्भाग्यपूर्ण ( unpleasant ) घटनाओं के प्रती निराशावादी सोच के बजाय “निरोध/बचाव/रोकथाम” के सकारात्मक (proactive) उपायों से हम इन दुर्भाग्यपूर्ण ( unpleasant ) घटनाओं को अपने से दूर रख सकते हैं|
P6—– यहाँ P6 का अर्थ “प्रणाम”( Pranam ) से हैं | प्रणाम का मतलब है जो भी हमारे पास है उसके लिए प्रभु का क्रतज्ञ,/ नमक-हलाल, एवं एहसानमंद होना | जब कभी हम किसी से मिलते हैं और दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम करते हैं, ऐसा करके हम उन्हें हमारा आदर/ सम्मान देते है उनके प्रति हमारी क्रतज्ञता भी प्रकट करते हैं, ऐसा करके हम हमारी दिल की सदभावना को जाहिर कर न्यूनतम प्रतिरोधक का मार्ग अपनाते हैं और स्वंय का आत्मकल्याण भी करते हैं, प्रणाम करने से हमे भी दूसरों से सम्मान/ क्रतज्ञता कहीं ज्यादा गुणा वापस प्राप्त होती है |
P7——– यहाँ P7 का अर्थ “ प्राथना “ (prayer ) हैं | प्राथना का अर्थ होता है समर्पित कर देना, प्राथना के द्वारा हम हमारी अधीन सारी सम्पती/ वस्तुओं को भगवान के श्री चरणों में समर्पित कर देते हैं, जो है उसका है, उसका उसी को समर्पित | ऐसा कर हमे आन्तरिक एवं बाहरी दोनों रूपों मे असीम सम्पदा एवं सुख-शांती की प्राप्ती होती है |
डा. जे. के. गर्ग—डा. सुरभी गर्ग