राजस्थानी उपन्यास को नए तरीके से समझने और चुनौती लेने का आह्वान

upanyas par sangoshti 02-07-2017 (4)बीकानेर02 जुलाई 2017। साहित्यकार नंद भारद्वाज ने कहा कि राजस्थानी को अब नए सोच और भावबोध की जरूरत है। हमें भाषा के रचाव व विकास पर ध्यान देना होगा तभी हमारा साहित्य नई पहचान बना पाएगा। भारद्वाज साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और नेहरु शारदा पीठ महाविद्यालय की ओर से रविवार को राजस्थानी उपन्यास विधा पर आयोजित संगोष्ठी के उद्धाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उद्घाटन नंद भारद्वाज, डॉ.अर्जुनदेव चारण और शांतनु गंगोपाध्याय ने किया।
भारद्वाज ने कहा कि रचनाकार का पहला संघर्ष स्वयं से होता है और जरूरी नहीं है कि वह दलित लेखन के लिए दलित ही आए और स्त्री की संवेदनाएं सिर्फ स्त्री ही समझ और अभिव्यक्त सके। लेखन की वास्तविक शुरुआत ही तब मानी जाती है जब वह स्त्री-पुरुष के भेद से मुक्त हो जाए। सत्राध्यक्ष डॉ.अर्जुनदेव चारण ने भारतीय साहित्य में उपन्यास विधा आगमन संबंधी जानकारी साझा करते कहानी और उपन्यास में भेद बताते वर्तमान समय में राजस्थानी उपन्यास को नए तरीके से समझने की रचनाकारों को कोशिश करते हुए चुनौती लेने का आह्वान किया। इससे पहले आगंतुकों का स्वागत अकादेमी की ओर से शांतनु गंगोपाध्याय ने किया। नेहरू शारदा पीठ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रशांत बिस्सा ने राजस्थानी उपन्यास विधा पर आयोजित संगोष्ठी को साहित्यकारों के साथ-साथ स्कॉलरों और नए रचनाकारों के लिए भी महत्त्वपूर्ण बताया। संगोष्ठी के सत्रों की अध्यक्षता देवकिसन राजपुरोहित; भरत ओला; मधु आचार्य ने की। डॉ.सत्यनारायण सोनी; नवनीत पांडे; डॉ नीरज दइया ने पत्रवाचन किए।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि मालचंद तिवाड़ी ने इस मौके पर कहा कि उपन्यास एक विशाल फलक पर जीवन की धड़कन को खोजना है।
कार्यक्रम के संयोजक राजेंद्र जोशी ने राजस्थानी लेखन के लिए यह समय एक चुनौती जैसा बताया। आभार नेहरु शारदा पीठ महाविद्यालय के प्राचार्य प्रशांत बिस्सा ने जताया तथा संस्था द्वारा मंचस्थ अतिथियों एवं पत्रवाचकों को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
– मोहन थानवी

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