
यह समय संसद के लीए कितना शर्मनाक था खुलेआम जिस संविधान की शपथ ली जा रही थी उसी संविधान की धज्जियां उसी जगह उसी के मन्दिर में उड़ाई जा रही थी आज उस मन्दिर की दीवारें और छत पहली बार सदन के अंदर बिखरते सोहार्द के चिथड़ों को देखकर तिलमिला रही थी और सबका साथ सब का विकास के परमपिता मोदीजी बैठे बैठे मन्द मन्द मुस्करा रहे थे और मुसलमानों का मन जित रहे थे ।
क्या यह कथनी और करनी में फर्क नही है ?
होना तो आज यह चाहिए था कि मोदीजी इस संसद की कार्यवाही में प्रधानमन्त्री के रूप में अपने दल के सदस्यों को गन्दगी फैलाने से रोकते और समझाते की संसद और सड़क में बहुत फर्क होता है और अपने दल को सयंम में रहने की हिदायत देते ।
मगर ऐसा नही हुआ, सायद हमने भटकने का मानस पूर्णरूपेण बना लीया है यह कल का संसद के अंदर का वातावरण किसी अनहोनी की तरफ इशारा कर रहा है ।
महेन्द्र सिंह भेरुन्दा