सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता समाप्त करने की तैयारी

– विश्वविद्यालयों की विधियां (संशोधन) विधेयक पर सदन में बोले देवनानी
– पद से हटाने का प्रावधान कर कुलपतियों को भयभीत करने की तैयारी
– कांग्रेस के जनघोषणा पत्र में उच्च शिक्षा के संस्थानों में भयमुक्त वातावरण बनाने की थी घोषणा, सरकार कर रही है उलटा
– सक्षमता, सत्यनिष्ठा, नैतिक आचार व संस्थानिक प्रतिबद्धता की बात करने वाली सरकार ने नियुक्त किये है विवादित व्यक्ति

प्रो. वासुदेव देवनानी
जयपुर/अजमेर, 30 जुलाई। पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री व विधायक अजमेर उत्तर वासुदेव देवनानी ने विधान सभा में विश्वविद्यालयों की विधियां (संशोधन) विधेयक पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि राज्य सरकार ने राजनैतिक षड़यंत्र रचते हुए विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता समाप्त करने की तैयारी कर ली है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस संशोधन विधेयक के माध्यम से विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को उनके निर्धारित कार्यकाल से पूर्व हटाये जाने का जो प्रावधान किया गया है वह सीधे-सीधे कुलपतियों को भयभीत करने की तैयारी प्रतीत होती है साथ ही इस प्रावधान के द्वारा उन्हें एक सरकारी अधिकारी बनाया जा रहा है जोकि विश्वविद्यालय की स्वायत्ता की धज्जियां उडाने के समान है।

पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री देवनानी ने कुलपतियों को हटाने के लिए लाए गये विधेयक के पिछे राजीव गांधी स्टडी सर्किल नामक कांग्रेसी विचारधारा के संगठन को जिम्मैदार ठहराया है ताकि वर्तमान में कार्यरत कुलपतियों को हटाकर उनके संगठन से जुड़े व्यक्तियों को कुलपति नियुक्त किया जा सके।

उन्होंने सदन में विधेयक पर चर्चा के दौरान विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को उनके पद से हटाये जाने के सम्बंध में सरकार द्वारा एक शिक्षक संगठन विशेष के इशारों पर किये जा रहे प्रावधान पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि राजस्थान में प्रत्येक विश्वविद्यालय का अलग-अलग एक्ट बना हुआ है जिन्हें विधान सभा में पारित किया गया किन्तु सरकार एक ही एक्ट से सभी विश्वविद्यालयों के एक्ट में परिवर्तन करने जा रही है जोकि नियम विरूद्ध है। उन्होंने कहा कि होना यह चाहिए था कि सरकार कुलपति चयन प्रक्रिया को सुंसंगत बनाती परन्तु इस विधेयक ने तो कुलपति की स्वायत्त निर्णय क्षमता पर ही अंकुश लगा दिया। प्रदेश में एक बार यह कानून बन गया तो किसी भी कुलपति पर कोई आरोप लगाकर उसे हटाया जा सकता है जोकि देश के मत के भी विपरीत है। हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा को अधिकाधिक शैक्षणिक, प्रशासनिक व वित्तीय स्वायत्ता देना प्रस्तावित किया गया है तथा कुलपति को बोर्ड आॅफ गवर्नर्स के प्रति जिम्मैदार बनाया गया है। क्या राजस्थान इस माॅडल को नहीं अपना सकता।

देवनानी ने कहा कि दो विधेयक कुलपति की योग्यता व उसको हटाने के सम्बंध में लाए गये है जिनमें 11 सामान्य विश्वविद्यालय व 2 तकनीकी विश्वविद्यालय शामिल है जबकि राजस्थान में कुल 27 विश्वविद्यालय है। सरकार एसा भेदभाव क्यों करने जा रही है।

उन्होेंने कहा कि सरकार ने कुलपति के रूप में नियुक्त किये जाने वाले व्यक्ति द्वारा सक्षमता, सत्यनिष्ठा, नैतिक आचार और संस्थानिक प्रतिबद्धता के उच्चतम स्तर को धारित करने का उल्लेख किया है, परन्तु राज्य सरकार तो इसके विपरित गुणों वाले व्यक्तियों को नियुक्त कर रही है। गत सरकार द्वारा लगाये गये सिंडिकेट और बोर्ड आफ मेनेजमेंट के सदस्यों को हटाकर जिन्हें लगाया गया है उनमें से एक प्रो. रामलखन मीणा जिन्हें राजस्थान विश्वविद्यालय के सिंडीकेट सदस्य व चयन समिति सदस्य के रूप में लगाया गया है वे केन्द्रीय विश्वविद्यालय राजस्थान से धोखाधड़ी के कारण बर्खास्त किये गये है। इसी प्रकार प्रो. दरियाव सिंह चूंडावत जो कि सुखाड़िया विश्वविद्यालय की चयन समिति व बोर्ड आफ मेनेजमेंट में लगाये गये है वे जोधपुर विश्वविद्यालय भर्ती घोटाले में जेल जा चुके है तथा जमानत पर है। उन्होंने कहा कि कुलपति नियुक्ति के लिए प्रोफेसर पद पर 10 वर्ष के अनुभव की भी शर्त है परन्तु हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में जिन्हें कुलपति लगाया गया है उनका अनुभव तो 10 वर्ष नहीं है।
देवनानी ने विधेयक पर चर्चा के दौरान यह सुझाव भी दिया कि यदि कुलपति के विरूद्ध किसी गंभीर आरोप की जांच की बात आती है तो उसके लिए गठित कमेटी में सदन के नेता मुख्यमंत्री व नेता प्रतिपक्ष से नामित कुलपति अथवा भूतपूर्व कुलपति स्तर के व्यक्ति तथा कोई न्यायाधीश/सेवानिवृत न्यायाधीश हो ताकि यदि कोई अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो तो भी तो जांच की निष्पक्षता बनी रहे। उन्होंने कहा कि एसा नहीं होना चाहिए जैसे कि सुखाड़िया विश्वविद्यालय में कुलपति की जांच के लिए बनाई गई समिति में महाविद्यालय के शिक्षकों को ही लगा दिया गया। उन्होंने दूसरा सुझाव यह भी दिया कि विश्वविद्यालयों में प्रो वी.सी. (Pro VC) नियुक्त किये जाने चाहिए जिससे कुलपति के नहीं होने पर कार्य प्रभावित ना हो।

देवनानी सदन में उच्च शिक्षा के हालात दयनीय होने का जिक्र करते हुए तथा कांग्रेस के जन घोषणा पत्र जिसे सरकार का नीतिगत दस्तावेज माना गया है के बिन्दु संख्या 21 का उल्लेख करते हुए कहा जिसमें प्रदेश के महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में भयमुक्त वातावरण स्थापित करते हुए अकादमिक स्वायत्ता तथा स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की बात कही गयी है परन्तु सरकार यह कैसी स्वायत्ता व स्वतंत्रता देने जा रही है। कुलपतियों को हटाने वाले विधेयक के अतिरिक्त भी महाविद्यालय शिक्षकों के स्थानान्तरण व प्रतिनियुक्तियों के नाम पर उनमें भय का वातावरण बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय विचारधारा के शिक्षकों को 500 किमी. तक स्थानान्तरण किये जा रहे है । यह सब कांग्रेसी विचारधारा के संगठन राजीव गांधी स्टडी सर्किल की शह पर एक अन्य मंत्री के हस्तक्षेप द्वारा कराया जा रहा है। इनके इशारे पर स्थानान्तरण पर ट्रिब्यूनल व उच्च न्यायालय के स्थगन आदेशों को भी नहीं माना जा रहा है। महाविद्यालयों के सामान्य अकादमिक, प्रशासनिक कार्य भी आयुक्तालय पर केन्द्रित किये जा रहे है। कौनसा पाठ्यक्रम पढाना व प्रश्न पत्र निर्माण भी आयुक्तालय स्तर पर तय किये जा रहे जो कि राज्य के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ।

प्रदेश के 12 विश्वविद्यालयों में कुलपति नहीं है। कुछ कुलपतियों के पास 3-4 विश्वविद्यालयों का चार्ज है। अजमेर के म.द.स. विश्वविद्यालय के कुलपति पर अक्टूबर 2018 से उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाई हुई है परन्तु सरकार द्वारा किसी अन्य कुलपति को यहां का चार्ज नहीं दिया गया है। यहां पर रजिस्ट्रार तक का पद रिक्त पड़ा है। विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, प्रशासनिक, वित्तीय सभी कार्य अटके पड़े है, परन्तु सरकार का कोई ध्यान नहीं है।

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