
क्योंकि…
मैं साँपों के शहर में रहती हूं
मेरे आसपास साँप रहते हैं
ज़हरीले और बड़े-बड़े साँप
जिनका डंसा न माँगे पानी भी
हाँ मगर मैं तो फिर भी ज़िन्दा हूँ???
उन साँपों के डसने के बावजूद
लेकिन…
मेरे जिस्म में ज़हर भर चुका है
मैं सोचती हूँ कि क्या होगा उस दिन
जबकि…..!
मैंने किसी को डस लिया…..!
भेड़िये
ज़िन्दगी एक सहरा है
रिश्तों का पहरा है
अपनों के इस जंगल में
खुलूस का नक़ाब ओढ़े
कितने भेड़िये पोशीदा हैं…..?
कौन जाने
परिचय
डॉ. फरग़ाना का जन्म राजस्थान जयपुर में हुआ। आपकी शिक्षा जयपुर महारानी कॉलेज एवं राजस्थान विश्वविद्यालय से हुई। एम.ए. उर्दू गोल्ड मेडल लेकर किया। एम. फिल एवं पीएच.डी. के बाद बैचलर ऑफ जर्नलिज़्म किया। आपने बीकानेर डूंगर कॉलेज, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य किया एवं साथ-साथ वार्डन के पद पर भी कार्यरत रहीं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की महिला फैलोशिप के अन्तर्गन 2011 से 2016 तक आपने राजस्थान विश्वविद्यालय में पी.डी.एफ. के पद पर रहते हुए एक प्रोजेक्ट पर कार्य किया। वर्तमान समय में अपेक्स विश्वविद्यालय, जयपुर में वार्डन एवं असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं एवं समाजसेवा से भी जुड़ी हुई हैं। काफी समय से लेखन का कार्य भी कर रही हैं। विभिन्न विधाओं में कविता लेख, अफसान्चे, बच्चों की कवितायें एवं किताबें लिखी हैं, ड्रामे पर काफी काम किया है एवं उत्तर आधुनिकता पर काफी काम किया है।
डॉ. फरगाना उर्दू एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में लिखती हैं। उर्दू ड्रामे पर दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं एवं कई पुस्तकों पर अभी काम चल रहा है जो जल्द ही प्रकाशित होने वाली हैं। अब तक 60 से अधिक लेख प्रकाशित हो चुकी हैं एवं 50 से अधिक राष्ट्रीय एवं अर्न्तराष्ट्रीय सेमीनारों में पत्रवाचन कर चुकी हैं। डॉ. फरगाना की पुस्तक को राजस्थान उर्दू एकेडमी से अवार्ड भी मिल चुका है एवं बहुत से अन्य अवार्ड भी मिल चुके हैं। महिला सशक्तिकरण पर भी अवार्ड मिला है।
This is very nice poem