समाज के बदलने से पहले अपने को बदलने का साहस होना चाहिये। “

आजादी आंदोलन में शामिल होने के लिए छोड़ी वकालत
अपने मित्र रायबहादुर हरिहर प्रसाद सिंह के मुकदमों की पैरवी के लिए उन्हें इंग्लैण्ड जाना पड़ा। वरिष्ट बैरिस्टर अपजौन इंग्लैंड में हरिहर प्रसाद सिंह का मुकदमा लड़ रहे थे| उन्हीं के साथ राजेन्द्र बाबू को काम करना था। अपजौन राजेन्द्र बाबू की सादगी और विनम्रता से बहुत प्रभावित हुए। एक दिन किसी ने अपजौन को कहा कि राजेंद्र बाबू भारत के सफलतम वकीलों में से हैं किन्तु उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने हेतु अपनी वकालत त्याग दी है और वे असहयोग आन्दोलन में गांधीजी के निकटतम सहयोगी बन गये हैं।
बैरिस्टर अपजौन को आश्चर्य हुआ और वे सोचने लगे कि राजेन्द्र बाबू इतने दिनों से मेरे साथ काम कर रहे है पर अपने मुंह से आज तक अपने बारे में कुछ नहीं बताया। अपजौन एक दिन राजेन्द्र बाबू से बोले लोग सफलता, पद और पैसे के पीछे भागते हैं और आप हैं कि इतनी चलती हुई वकालत को आपने ठोकर मार दी। आपने गलत किया। राजेन्द्र बाबू ने जवाब दिया “ एक सच्चे हिंदुस्तानी को अपने देश को आजाद कराने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए, वकालत छोड़ना तो एक छोटी सी बात है”। अपजौन उनकी देश भक्ति की भावना के सम्मुख नत मष्तक हो गये।