dr. j k gargरविदास जी सुप्रसिद्ध संत रामानंद और कबीर दास के शिष्य थे | जूते बनाना रविदास जी का पारिवारिक व्यवसाय था | जिसे वे पूरी लगन तथा कर्तव्य निष्ठा से करते थे | संत रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना और मानव-प्रेम से ओत-प्रोत होती थी | उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके भक्त बन गये | कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्य बन गयी थीं | मुग़ल शासक बाबर भी रविदास जी का अनुयायी बन गया और उनसे प्रभावित होकर बाबर अच्छे सामाजिक कार्य भी करने लगा | रविदास जी मानते थे कि यदि आदमी का मन पवित्र है और वो अपना कार्य करते हुए, ईश्वर की भक्ति में तल्लीन रहता हैं और उसके लिये प्रभु भक्ति से से बढ़कर कोई तीर्थ-स्नान नहीं है तो ऐसा इंसान सच्चा भक्त है | कोई भी व्यक्ति छोटा या बड़ा अपने जन्म के कारण नहीं बल्कि अपने कर्म के कारण होता है | मनुष्य के कर्म ही उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं | राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के अलग अलग नाम हैं | वास्तव के अंदर वेद आदमी , कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है | आदमी को परमात्मा की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है | घमंड एवं अहंकार-शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में जरुर सफल रहता है जैसे विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकितिनके के समान छोटी सी चींटी इन कणों को सफलतापूर्वक आसानी से चुन लेती है | इसी प्रकार अहंकार त्याग कर, विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का सच्चा भक्त बन सकता है | कर्म हमारा धर्म है और फल हमारा सौभाग्य | इसलिए हमें हमेशा सात्विक कर्म करते रहना चाहिए | काम, क्रोध लोभ, अहंकार, मोह और ईर्ष्या मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं जो मनुष्य के चरित्र, आचरण दोनों को नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं इसलिए सभी को इन दुशपरवर्तियों से हमेशा दूर ही रहना चाहिए | हमारा यह शरीर माटी का यह पुतला है जो नाचता-उड़ता फिरता रहता है. इसे अगर कुछ मिल जाता है, तो वह घमंडी हो जाता है और माया के खत्म होते ही रोने लगता है | रविदास जी मानना था कि शरीर तो भौतिक वस्तु है, उसे तो एक न एक दिन नष्ट हो ही जाना है | इसलिए हमें इस पर अभिमान न कर अपनी अंतरात्मा को शुद्ध और निर्मल रखना चाहिए |जिसके हृदय में रात-दिन राम समाये रहते हैं, ऐसा भक्त वास्तव के अंदर राम के समान ही है | उस पर न तो क्रोध का असर होता है और न ही काम-भावना उस पर कभी हावी हो सकती है |