लिपि पुती देहरीया और सजी संवरी मेहरिया किसके मन को नहीं भा ती ?यह मन भी ऐक तिलस्म है,न रूप न रंग,न छाया न काया न माया,फिर भी भटकता है ।उत्सव में रेखा से लक्ष्मी प्यारे ने गवाया था मन क्यूँ बहका रे बहका आधी रात को ।कुछ यूं भी कि मन भावे मू न्ड हिलावे ।बिहार के सरताज का भी आधी रात को मन डोला तो भगवाई छतरी उतार लालुइ चोला पहन लिया ।चोपायों के चारे को चबेना बना जुगाली करते करते महामना अब पटना लौट आये हैं और जेल यात्राओं के संस्मरण बघार रहे हैं ।महामना के मदरसे में नवमी तक के तालीम याफ्ता नायब सदर और पार्टी के तेजस्वी शानो चिराग ने दूर की कौड़ी भांपते हुए पलटू चाचा के मिजाज में यह भर दिया है कि,चाचा सोलह सत्रह साल से पटना के रंग महल में प्रदेश को इंगलैण्ड,दुबई बनाते अघा गये होंगे ।अब हवा बदलो और आंख भर देखो दिल्ली के लाल किले की दीवारें बड़ी हसरत से आपकी ओर निहार रही हैं,और तिरंगा तो इठलाता झूमने लगा है कि डेढ दो साल बाद बिहार के सपूत से ही डोरी खींची जाएगी ।।पीछे का मोह छोडो,यहाँ हम हैं ना,राज्य के गरीब गुरबो,खुशहाल रेयत,गाय बछड़,सब की और खानदान की पूरी भलाई में लगे रहेंगे ।पूरा देश बड़ी उम्मीद से आपका आशीर्वाद लेने को तरस रहा है ।।।।जितनी बड़ी कुर्सी उतनी ही बड़ी लार की लटकन ।अन्त डियों में कुर्सी की भूख गरियाने लगी तो पलट सलट बाबू झोला डण्डा ले बड़ी राजधानी चले आये ।कहा हम तो चाहते हैं अलग अलग अपने जंगलों में चरने का क्या लाभ?? सब ऐक बाडे में मिलकर चारे को खायेंगे तो सभी का जान बची रहेगी ।नहीं तो फिर सीबी आई ,ईडी,इन्कम ,महकमें दरवाजे पर ही बैठें हैं ।मैं तो सिर्फ हाका लगाने आया हूं।
जैसा दांव वैसा भाव,विधाता बुद्धि के धवल उजियारे पर कालिख न चुप डे ।नाई ने बाल पूरे भी न उतारे थे कि झमझम होने लगी ।ओले वो भी बेर के आकार के ।भागकर पास की तुगलक लेन में जा घुसे ।युवराज ऐक बडे जमाव डे को परचून की रेट बता लोटे थे ।बाबू ने चश्मा साफ कर पूँछा क्या ले आये??जवाब मिला ऐक लीटर आटा लाया हूँ ।
बिहारी बाबू बोले;राज राजेश्वर की जय हो;ऐसे ज्ञानी राज कुंवर सात जन्मों की तपस्या के बाद मिलते हैं ।मैं कल ही पटना ऐक्स प्रेस पकड़ लूंगा ।।।।।।फिर लौटूंगा ऐक ब्रेक के बाद???
कुर्सी की चाहत अच्छे भले को भी बदहवास कर देती है,अमित भी यही कहते हैं,,
कुछ इस तरह बदहवास हुए आंधियों में लोग
जो पेड़ खोखले थे उन्हीं से लिपट गए ।।।
नरेंद्र चौहान