महाभारत कालीन हिंदू परंपरा अनुसार टेसू और झेंझी का विवाह संपन्न

बाडी ।(अशोक लोढ़ा) हिंदू परंपरा अनुसार दशहरा के दिन से प्रतिवर्ष टेसू एवं झेझी का त्यौहार मनाया जाता है । इस दिन बच्चे रंग-बिरंगे बड़े एवं छोटे टेसू झेंझी बाजार से ला कर पहले दिन दीपक में तेल, घी डालकर 5 दिन की ज्योत जलाई जाती है और 5 दिन के लिए दीपक जलाकर टेसू एवं झेझी के गीत गाए जाते हैं, गली मोहल्लो के बच्चे टेसू झेंझी को ले जाकर गीत गाकर घर-घर दरवाजे पर जाकर भिक्षा मांगते हैं । इसके 5 दिन बाद टेसू और झेझीं का विवाह किया जाता है, जिसमें तीन भामर टेसू की एवं चार भामर झेंझी की डाली जाती है। इस खुशी के मौके पर जब टिशु झेंझी का ब्याह करते हैं तो बच्चे बुजुर्ग एवं नौजवान साथी खुशी का इजहार करते हैं। आतिशबाजी करते हैं। उसके बाद किसी को सजाया जाता है एवं पुआ और पंजीरी का प्रसाद लगाया जाता है। वह सभी में बांटा जाता है। क्योंकि आज दिनांक 28 अक्टूबर को चंद्र ग्रहण लग रहा है। आरती शिवहरे धौलपुर ने बताया कि टेसू और झेंझी, वह दो शख्यिसत जिनकी शादी के लिए बच्चे घर- घर जाकर रुपए एकत्रित करते हैं, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही टेसू को एक षड़यंत्र के तहत मौत के घाट उतार दिया जाता है। हर किसी को इस कहानी के आगाज लेकर अंत तक का पता है, लेकिन इसके बाद भी इसे बच्चे बच्ची पूरी शिद्दत के साथ खेलते हैं। इसे लड़के और लड़कियां की टोली टेसू और झेंझी को लेकर घर- घर जाकर रुपए एकत्रित करते हैं और पूर्णिमा के दिन इनकी शादी होती है। यह परंपरा महाभारत कालीन से सम्पूर्ण इंडिया में आज भी जीवित है। हालांकि अंतर बस इतना आया कि अब यह कॉलोनी और सोसाइटी की जगह यह मोहल्ले या बस्ती तक ही बची हुई है। यह एक खेल है जिसके माध्यम से शादी की रीति- रिवाज की शिक्षा दी जाती है।

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