*वीतराग बनने के लिए वीतराग का चिंतन आवश्यक: संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि*

संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि आप बहुत ही भाग्यशाली और किस्मत वाले हैं कि आपको वीतराग वाणी सुनने का मौका मिल रहा है। इसमें आपका उत्साह सराहनीय है। यह वाणी किसी साधारण पुरुष की वाणी नहीं है, यह साक्षात परमपिता परमात्मा की वाणी है। उत्तराधय्यन भगवान महावीर की अंतिम वाणी है इसे समझने के लिए महावीर को समझना भी जरूरी है। आचार्य श्री हेमचंद जी ने कहा है कि वीतराग बनने के लिए वीतराग का चिंतन आवश्यक होता है। तुलसीदास जी फरमाते हैं कि जिन कानों द्वारा राम कथा को नहीं सुना जाता है तो उसके कानों और सर्प के बिल में कोई फर्क नहीं है। हरि की भक्ति नहीं करने वाला मरे हुए व्यक्ति के समान है। जो राम रसायन रूपी घूटी को नहीं पिता उसे अंत समय में पछताना पड़ता है। अत:आप भी महावीर और महावीर प्रभु की वाणी को हृदय में उतारने का प्रयास करें। कहा भी है learn it यानी सीखिए, आप महावीर प्रभु के जीवन से सीखने का प्रयास करें। live it जीवन जीने का तरीका सीखे, की जीवन को कैसे जीना और love it यानी प्यार करें किससे?महावीर प्रभु से! क्योंकि आनंदघन जी ने कहा है कि जिनेश्वर ही मेरे एकमात्र स्वामी, प्रीतम और कांत है।और उनके अतिरिक्त मुझे और किसी के प्यार की जरूरत नहीं है। क्योंकि किसी ने कहा भी है कि मैंने पदार्थ को, परिवार को,संसार को दिल दिया तो उन्होंने मेरा दिल तोड़ दिया,मगर जब मैंने प्रभु आपको दिल दिया, तो आपने तो मेरा दिल ही बदल दिया। अत: प्रभु से प्रेम करें।
पूज्य गुरुदेव श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया की जैन आगमो में उत्तराधय्यन सूत्र का बहुत विशेष स्थान है। जिस प्रकार पिता की अंतिम समय में कही गई बात पुत्र के लिए आदरणीय होती है।उसी प्रकार यह प्रभु महावीर की अंतिम वाणी हमारे लिए अत्यंत आदरणीय है। इसमें 36 अध्याय में पहले अध्ययन का नाम विनयश्रुत है इसमें 48 गाथाएं हैं। गुरु और शिष्य के संबंध को जोड़ने में विनय धागे का कार्य करता है।जिस प्रकार सुगंध के लिए बगीचे में जाना, मेरिट के लिए विद्यार्थी को अध्ययन और संपत्ति प्राप्त करने के लिए व्यापार या उद्यम करना आवश्यक होता है। उसी प्रकार आत्मा के कल्याण के लिए विनय आवश्यक होता है। अतः विनीत शिष्य को चाहिए कि वह अविनीतता के समस्त कारणों का त्याग करें। दूसरे परिषह अध्ययन में 22 परिषह का वर्णन है, परी यानी कष्ट को जीवन के लिए आवश्यक बताया है। जैसे परीक्षा से विद्यार्थी में, सोने को तपाने से और हीरे को कसौटी में कसने पर उसमें और निखार आ जाता है। उसी प्रकार परिषहो से गुजरने के बाद साधुत्व में निखार आता है। तीसरे अध्ययन में चार अंग मनुष्यत्व,धर्मश्रवण, श्रद्धा करना और श्रद्धा के साथ सम्यक पराक्रम को क्रमशः आगे से आगे दुर्लभ बताया है।और चौथे असंस्कृत प्रमादाप्रमाद अध्ययन में प्रमाद त्याग का उपदेश दिया है। और कर्म बंध से सावधान रहने की प्रेरणा प्रदान की गई है।क्योंकि किए हुए कर्मों को भोगे बिना मुक्ति नहीं होती।धन व्यक्ति को बचाने में समर्थ नहीं हो सकता है।अतः व्यक्ति को उत्तराध्ययन सूत्र के अध्ययनों को, उनके भावार्थ को सुनकर और प्रभु महावीर की संगीतमय जीवन गाथा को सुनकर अपने जीवन को सुंदरतम बनाने का प्रयास करना चाहिए।
धर्म सभा को संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।
पदमचंद जैन

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