*स्वराज तो आ गया, सुराज कब आएगा*

*▶️जिन मूलभूत समस्याओं पर फोकस होना था, आज तक नहीं हुआ*
*▶️सुराज की लच्छेदार बातें महज राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह गईं*

*✍️प्रेम आनन्दकर, अजमेर।*
📱8302612247

*👉देश को आजाद हुए 77 साल बीत गए हैं। आजादी के दौरान जिस स्वराज की कल्पना की गई थी, वह आजादी मिलते ही पूरी हो गई। स्वराज यानी खुद का राज, भारत का अपना राज। लेकिन अफसोस इस बात का है कि सुराज आज तक नहीं मिल पाया। जिस देश के जिन लोगों ने आजादी पाने के लिए अपने प्राणों की आहूति तक दे दी थी, उन्हीं लोगों की संतानें अपनी मूलभूत समस्याओं के समाधान के लिए आजादी के बाद से आज तक जूझ रही हैं। सुराज की लच्छेदार बातें महज राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह गई हैं। जनता से लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लंबे-चौड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही या तो वे वादे चुनावी जुमले बनकर रह जाते हैं या फिर राजनेताओं द्वारा जानबूझकर भुला दिए जाते हैं। हम देश का अतीत और वर्तमान परिदृश्य देख लें। आजादी के बाद चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार, महंगाई, जनसंख्या, पानी, बिजली, सड़क जैसी मूलभूत जरूरतों को पूरा करना हर सरकार की पहली जिम्मेदारी और प्राथमिकता होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई। हालांकि आजादी के बाद से महंगाई दिनों-दिन बढ़ती गई, लेकिन किसी भी सरकार ने इसे थामने की कोशिश नहीं की। बढ़ती आबादी को रोकने के लिए कोई ज्यादा ठोस और कारगर कदम नहीं उठाए गए, यही कारण है कि हम डेढ़ अरब को भी पार करने के मुहाने पर आ गए हैं। चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार की तरफ जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना आज तक नहीं दिया गया।

प्रेम आनंदकर
बढ़ती आबादी के साथ बेरोजगारी का ग्राफ भी दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। समस्या की सबसे बड़ी जड़ बढ़ती आबादी है, जिसके आगे तमाम साधन-संसाधन, सुख-सुविधाएं हमेशा बौनी ही रही हैं। चलिए यह बात भी मान लेते हैं कि बढ़ती आबादी के कारण समस्याएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं और विकास के सारे प्रयास विफल साबित हो रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है, लेकिन इस बात को भी मानना पड़ेगा कि जो भी सरकार आती है, वह या तो जल्दी से भर्तियों की प्रक्रियाएं शुरू नहीं करती हैं या फिर पदों में कटौती करती जाती है। सरकार केंद्र की हो या राज्य की, कमोबेश सभी केंद्रीय और राज्य सरकारों के कार्यालयों में कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है। स्कूल, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में रोजगारपरक शिक्षा बंद कर दी गई है। किताबी ज्ञान के आधार पर डिग्रीधारियों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है। लोगों को बौद्धिक रूप से सक्षम तो बनाया जा रहा है, लेकिन उन्हें हुनरमंद बिल्कुल भी नहीं बनाया जा रहा है। यही कारण है कि आज लाखों युवाओं के खाली हाथों के पास काम नहीं है। अनेक सरकारी क्षेत्रों का निजीकरण किया जा चुका है और लगातार किया जा रहा है। ना सरकार की ओर से और ना ही निवेशकों की ओर से बड़े उद्योग, कारखाने, फैक्ट्रियां लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। तकनीकी शिक्षा पर फोकस तो है, लेकिन टैक्नोक्रेट्स भी खाली हाथ लिए रोजगार की तलाश में इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे हैं। हम चांद-आसमान पर भले ही पहुंच गए और अब सूरज तक छलांग लगाने की सोच रहे हैं, लेकिन लाखों लोगों के भूखे पेटों को रोटी, बेघरों को सिर छिपाने के लिए छत, आजीविका चलाने और परिवार का पालन-पोषण करने के लिए रोजगार नहीं दे पा रहे हैं। चिकित्सा सेवाओं के विस्तार में कमी होने के कारण अस्पताल भीड़-भाड़ वाले स्थान के सिवाय अब कुछ नहीं रह गए हैं। मानाकि गुलामी के दौरान अंग्रेजों ने हम पर जुल्म ढहाए, भूखा-प्यासा रखा, लेकिन अंग्रेजों की गुलामी के खत्म होने के बाद भी तो हालात में कोई बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया। स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार था, जो हमने ले लिया, लेकिन सुराज कब आएगा, इसका देश की जनता को इंतजार रहेगा।*

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