महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती पर विशेष

भारतीय शिक्षा परंपरा केवल सूचना प्राप्ति का माध्यम नहीं अपितु मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वित विकास का साधन रही है। इसी दिव्य परंपरा को पुनर्जीवित करने का महान संकल्प महर्षि दयानंद सरस्वती ने लिया था। उन्होंने ऐसी शिक्षा की कल्पना की थी जो वेदसम्मत हो, तर्कसंगत हो, वैज्ञानिक हो, नैतिक हो और राष्ट्रोक़ति की प्रेरक हो । महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय उसी ऋषि- दृष्टि का आधुनिक मूर्त रूप हैजहाँ शिक्षा केवल उपाधि अर्जन का साधन नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि का निर्माण है; जहाँ ज्ञान का उद्देश्य केवल आजीविका नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कृति और चेतना का संवर्धन है।
यह विश्वविद्यालय अपने संचालन और शैक्षणिक दर्शन में महर्षि दयानंद सरस्वती के सिद्धांतों से अनुप्राणित है। महर्षि दयानंद ने जिस प्रकार वैदिक अनुशासन, आत्मसंयम, शुचिता, कर्मयोग, राष्ट्रनिष्ठा और आध्यात्मिक वैज्ञानिकता का जीवन में समन्वय किया, वही यहाँ की संस्थागत आत्मा बन गया है। विश्वविद्यालय का प्रशासनिक वातावरण, शिक्षण पद्धति, शोध की दिशा तथा सह-पाठ्य गतिविधियाँ – सबमें एक स्पष्ट ध्येय दिखाई देता है: भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्स्थापित करना ।
महर्षि दयानंद का आह्वान था – “वेदों की ओर लौटो”। इसका आशय अतीतगमन नहीं, बल्कि उस सनातन ज्ञानधारा से वर्तमान और भविष्य को आलोकित करना है। विश्वविद्यालय इसी भाव के साथ वेदों को केवल आस्था के ग्रंथ न मानकर ज्ञान-विज्ञान के शाश्वत स्रोत के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ वेद अध्ययन, वैदिक दर्शन, संस्कृत, भारतीय संस्कृति और नैतिक चिंतन केवल पाठ्यक्रम का अंश नहीं, बल्कि शैक्षणिक वातावरण की मूल धारा हैं।
इसी सांस्कृतिक-वैचारिक परंपरा को सजीव बनाए रखने की दृष्टि से विश्वविद्यालय में एक अत्यंत भावपूर्ण शिष्टाचार भी विकसित हुआ है। यहाँ पधारने वाले विद्वान अतिथिगणों को सम्मान स्वरूप उपहार के रूप में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ तथा प्रसिद्ध चिंतक श्री हनुमान सिंह द्वारा रचित ‘महर्षि दयानंद सरस्वती’ ग्रंथ भेंट किए जाते हैं। यह केवल औपचारिक उपहार नहीं, बल्कि उस ऋषि-विचारधारा के प्रति विश्वविद्यालय की आत्मीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है-मानो प्रत्येक अतिथि को ज्ञान-यज्ञ की एक पवित्र आहुति सौंप दी जाती हो ।
इस विश्वविद्यालय की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है – महर्षि दयानंद शोधपीठ । यह शोधपीठ महर्षि दयानंद के विचारों, उनके ग्रंथों, उनके सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों तथा वैदिक सिद्धांतों के आधुनिक संदर्भों में अध्ययन का सशक्त केंद्र है। यहाँ शोध केवल इतिहास तक सीमित नहीं, बल्कि यह खोजने का प्रयास है कि महर्षि दयानंद की विचारधारा आज की वैश्विक चुनौतियों-नैतिक संकट, पर्यावरणीय असंतुलन, शिक्षा का बाजारीकरण, सांस्कृतिक विखंडन के समाधान में किस प्रकार सहायक हो सकती है। शैक्षिक सम्मेलन, संगोष्ठियाँ, व्याख्यानमालाएँ और प्रकाशन कार्य इस विचारधारा को जीवंत अकादमिक विमर्श का अंग बना रहे हैं |
इसी क्रम में स्थापित महर्षि दयानंद सरस्वती चेयर विश्वविद्यालय में एक जीवंत बौद्धिक मंच के रूप में कार्यरत है। यह चेयर विभिन्न विषयों के विद्वानों को एकत्र कर अंतरविषयी दृष्टि से वैदिक चिंतन और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के बीच सृजनात्मक संवाद स्थापित करती है। दर्शन, समाजशास्त्र, शिक्षा, पर्यावरण अध्ययन, भाषाविज्ञान तथा विज्ञान के क्षेत्र के विशेषज्ञ यहाँ वैदिक सिद्धांतों की समकालीन प्रासंगिकता पर मंथन करते हैं, जिससे परंपरा और आधुनिकता के बीच समन्वय की एक नई बौद्धिक संस्कृति विकसित हो रही है।
महर्षि दयानंद का जीवन यज्ञमय था-यज्ञ अर्थात् सर्वहितकारी कर्म । विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित यज्ञशाला इसी भावना का सजीव प्रतीक है। यहाँ किसी भी कार्यक्रम की शुरुआत के पहले वैदिक मंत्रों के साथ यज्ञ सम्पन्न होते हैं, जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक और कर्मचारी सहभागी बनते हैं। यह यज्ञशाला केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान का केंद्र नहीं, बल्कि वैदिक ध्वनि-विज्ञान, पर्यावरणीय शुद्धता और मानसिक संतुलन के वैज्ञानिक आयामों को समझने का भी माध्यम है। इससे परिसर में एक सकारात्मक, अनुशासित और सात्त्विक वातावरण निर्मित होता है। विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस पर भी भव्य यज्ञ हवन आयोजित किए जाते है।
इसी वैदिक चेतना को और अधिक साकार रूप देने की दिशा में विश्वविद्यालय ने एक दूरदर्शी पहल की है- विश्वविद्यालय परिसर में वैदिक पार्क की स्थापना का प्रस्ताव। यह केवल उद्यान निर्माण की योजना नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, प्रकृति-दर्शन और वैदिक जीवन-दृष्टि को अनुभवात्मक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है। इस वैदिक पार्क में वेदों में वर्णित औषधीय वनस्पतियाँ, पवित्र वृक्ष, पर्यावरण संतुलन से जुड़े पौधे, पंचमहाभूत की अवधारणा को दर्शाने वाले खंड तथा वैदिक ऋचाओं के शिलालेख स्थापित करने की परिकल्पना है, ताकि विद्यार्थी ज्ञान को पुस्तकों में नहीं, प्रकृति के मध्य अनुभव कर सकें। यह प्रस्ताव विधिवत तैयार कर राज्य सरकार को प्रेषित किया जा चुका है, जो इस बात का प्रमाण है कि विश्वविद्यालय वैदिक विचारों को केवल सिद्धांत रूप में नहीं, बल्कि भौतिक संरचना में भी साकार करना चाहता है। भविष्य में यह वैदिक पार्क शोध, पर्यावरण शिक्षा, आयुर्वेदिक वनस्पति अध्ययन, योग-ध्यान और सांस्कृतिक शिक्षण की जीवंत प्रयोगस्थल बनाने की क्षमता रखता है।
विश्वविद्यालय ने महर्षि दयानंद के सिद्धांतों को पाठ्यक्रमों में भी अंतर्निहित करने की योजना बनाई हैं। विभिन्न विषयों में मूल्य शिक्षा, भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक दर्शन, पर्यावरण चेतना, राष्ट्रनिर्माण और नागरिक दायित्व जैसे आयामों को सम्मिलित किया गया है। विज्ञान, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों को भी वैदिक चिंतन की वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टि से परिचित कराया जाता है, जिससे शिक्षा का चरित्र समग्र और मूल्याधारित बन सके।
दयानंद सरस्वती के जीवन का एक प्रमुख पक्ष था- अनुशासन और आत्मसंयम । विश्वविद्यालय के दैनिक जीवन में यह स्पष्ट दिखाई देता है। प्रार्थना, समयपालन, स्वच्छता, सरल जीवनशैली और पारस्परिक सम्मान यहाँ की संस्कृति के अंग हैं। यहां विद्यार्थी केवल विषय विशेषज्ञ नहीं, बल्कि संस्कारवान नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर होते हैं। महर्षि दयानंद ने अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया था । विश्वविद्यालय उसी तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है। यहाँ विचार-विमर्श, प्रश्नोत्तर और बौद्धिक संवाद की परंपरा जीवित है। वैदिक सिद्धांतों को भी तर्क, प्रमाण और अनुभव के आधार पर समझने का वातावरण है-आस्था और बुद्धि का संतुलन यहाँ की विशेषता है। नारी शिक्षा और सम्मान भी विश्वविद्यालय की प्राथमिकता है। छात्राओं को नेतृत्व, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की दिशा में प्रेरित किया जाता है। यह महर्षि दयानंद के उस स्वप्न की पूर्ति है जिसमें नारी को समाज द्वारा समान भागीदार माना गया। सामाजिक दायित्व की भावना से प्रेरित होकर विद्यार्थी ग्राम संपर्क, पर्यावरण संरक्षण, साक्षरता और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। यह ‘यज्ञ भावना का आधुनिक रूप है – सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय ।
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्था नहीं, बल्कि ऋषि-चिंतन का आधुनिक तीर्थ है। यहाँ वेद का प्रकाश, विज्ञान की दृष्टि, नैतिकता की नींव और राष्ट्रभावना की ऊर्जा एक साथ प्रवाहित होती है। यह संस्थान विद्यार्थियों को केवल सफल पेशेवर नहीं, बल्कि सजग, संवेदनशील, नैतिक और राष्ट्रनिष्ठ मानव बनने की प्रेरणा देता है। यहाँ शिक्षा सचमुच एक यज्ञ है – जिसमें ज्ञान आहुति है और उज्ज्वल भविष्य उसकी परिणीति ।
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय की शिक्षा-दृष्टि का एक महत्वपूर्ण पक्ष है – विवेकपूर्ण आधुनिकता । यहाँ आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञानों का अध्ययन केवल व्यावसायिक दक्षता के लिए नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और नैतिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाता है। विद्यार्थियों को यह बोध कराया जाता है कि ज्ञान यदि मूल्यहीन हो जाए तो वह विनाश का कारण भी बन सकता है, किंतु जब वही ज्ञान वैदिक ‘ऋत’ और ‘सत्य’ के आलोक में संयमित होता है, तब वह मानवता के उत्कर्ष का साधन बनता है। इस प्रकार यह विश्वविद्यालय तकनीकी दक्षता और नैतिक चेतना का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत करता है।
विश्वविद्यालय का सांस्कृतिक वातावरण भी महर्षि दयानंद की चेतना से ओतप्रोत है। यहाँ आयोजित साहित्यिक गोष्ठियाँ, वैदिक मंत्रोच्चार प्रतियोगिताएँ, संस्कृत संवाद सत्र, योग-प्रशिक्षण, ध्यान- कार्यशालाएँ और भारतीय संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। यह वातावरण उन्हें केवल शिक्षित नहीं, बल्कि संस्कृत, सुसंस्कृत और संवेदनशील बनाता है। परिसर में विद्यमान आध्यात्मिकता और बौद्धिकता का यह संतुलन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को बहुआयामी बनाता है।
महर्षि दयानंद ने समाज-सुधार को शिक्षा का अनिवार्य अंग माना था। विश्वविद्यालय इसी भावना के साथ विद्यार्थियों को सामाजिक दायित्व के लिए प्रेरित करता है। ग्राम संपर्क अभियान, पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम, स्वच्छता अभियान, साक्षरता अभियान और सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों में विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी उन्हें “मैं” से “हम” की ओर ले जाती है। यही यज्ञ भावना का आधुनिक रूप है-स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकमंगल के लिए समर्पित होना ।
यह विश्वविद्यालय शोध और नवाचार के क्षेत्र में भी वैदिक दृष्टि से प्रेरित सोच को प्रोत्साहित करता है। यहाँ यह समझ विकसित की जाती है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल नए आविष्कार नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना भी है। पर्यावरणीय अध्ययन, भारतीय चिकित्सा परंपरा, योग-विज्ञान, नैतिक प्रबंधन और सांस्कृतिक अध्ययन जैसे क्षेत्रों में शोध को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यह प्रयास भारतीय ज्ञान परंपरा को भविष्य की वैश्विक दिशा से जोड़ता है।
विश्वविद्यालय विभिन्न विषयों में भारतीय ज्ञान परंपरा, मूल्य शिक्षा, नैतिक दर्शन, पर्यावरण चेतना और नागरिक दायित्व को समाहित कर रहा है। इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में विश्वविद्यालय ने महर्षि दयानंद सरस्वती पर एक क्रेडिट का वैल्यू एडेड कोर्स प्रारंभ करने की योजना बनाई है, जिससे प्रत्येक विद्यार्थी ऋषि – विचारधारा से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ सके।
महर्षि दयानंद के अनुशासन और आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि को संस्थागत रूप देने के लिए विश्वविद्यालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है- अब संपूर्ण विश्वविद्यालय में प्रत्येक कक्षा के संचालन से पूर्व प्रार्थना की जाएगी। इससे विद्यार्थियों में एकाग्रता, शांति और मूल्यबोध का विकास होगा। इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालय स्तर पर एक दिन सामूहिक प्रार्थना आयोजित की जाएगी, जिसमें सभी शिक्षक, कर्मचारी, अधिकारी और कार्यकर्ता सहभागी होंगे। यह केवल आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संस्थागत एकात्मता और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव होगा।
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय वास्तव में एक ऐसा ज्ञान परिसर है जहाँ शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि संस्कृति है, केवल अध्ययन नहीं, बल्कि साधना है; केवल करियर नहीं, बल्कि चरित्र है। यहाँ विद्यार्थी डिग्री लेकर नहीं, बल्कि दृष्टि लेकर निकलते हैं-एक ऐसी दृष्टि जो उन्हें स्वयं से समाज से और राष्ट्र से जोड़ती है। यही इस विश्वविद्यालय की वास्तविक उपलब्धि है।
वस्तुत: यह विश्वविद्यालय केवल ईंट-पत्थरों से निर्मित संस्था नहीं, बल्कि ऋषि-विचारों का स्पंदित केंद्र है। यहाँ महर्षि दयानंद का स्वप्न, वैदिक ज्ञान की गरिमा, नैतिक जीवन की महत्ता और राष्ट्रनिर्माण का संकल्प एक साथ जीवंत हैं। यह सचमुच आधुनिक भारत में वैदिक चेतना का एक प्रकाशस्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान, संस्कार और स्वाभिमान से प्रकाशित करने के लिए निरंतर प्रज्वलित है।
प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल
कुलगुरू
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय
अजमेर