चुनाव में पार्टियाँ अपने उम्मीदवारों के लिए जनता से भरोसा माँगती हैं। कहती हैं कि इन्हें चुनिए, ये आपकी आवाज़ बनेंगे। लेकिन जब चुनाव के आसपास उन्हीं उम्मीदवारों की बाड़ेबंदी की खबर आती है, तो एक सवाल उठता है—क्या पार्टी को डर है कि जीतने के बाद वे उसका साथ छोड़ देंगे?
बाड़ेबंदी के पीछे राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है। फिर भी इसकी ज़रूरत पड़ना अपने आप में भरोसे की कमी दिखाता है। जिस उम्मीदवार को साथ रखने के लिए पार्टी को निगरानी करनी पड़े, वह जनता से पाँच साल के भरोसे की उम्मीद कैसे कर सकता है?
वोट सिर्फ किसी व्यक्ति को जिताने के लिए नहीं दिया जाता। उसके साथ यह उम्मीद भी जुड़ी होती है कि वह जनता से किए वादों और मिले जनादेश का सम्मान करेगा। अगर चुनाव जीतते ही उसकी निष्ठा पर सवाल खड़े हो जाएँ, तो जवाब केवल उम्मीदवार को नहीं, उसे टिकट देने वाली पार्टी को भी देना चाहिए।
जिस पर पार्टी को भरोसा न हो, उस पर जनता भरोसा कैसे करे?
सोचने वाली बात है।