पुरातात्विक महत्व भी कम नहीं

शताब्दियों पूर्व बसे आज के अजमेर ने कितनी ही सल्तनतों का उद्भव और पराभव होते देखा है। यहां कितनी ही विशाल इमारतें बनी और ढह गईं, लेकिन उनके जीवित अवशेष यहां पर हुई अनेक राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक घटनाओं के आज भी साक्षी हैं। पुरातात्विक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं।

अजमेर पुरातात्विक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण जिला है। शताब्दियों पूर्व बसे आज के अजमेर ने कितनी ही सल्तनतों का उद्भव और पराभव होते देखा है। कितनी ही विशाल इमारतें यहां बनी और ढह गईं, लेकिन उनके जीवित अवशेष यहां पर हुई अनेक राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक घटनाओं के साक्षी हैं। इस सिलसिले में जिले के पुष्कर, नांद, बघेरा तथा भवानीखेड़ा आदि क्षेत्रों का उल्लेख विशेष रूप से किया जा सकता है।
पुष्कर स्थित बूढ़ा पुष्कर पुरातात्विक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। वहां प्रागैतिहासिक कालीन पाषाण निर्मित अस्त्र-शस्त्र पाए गए हैं। नांद गांव में कुषाण कालीन रक्त पाषाण निर्मित मिला शिवलिंग भारतीय मूर्तिकला का अनूठी मिसाल है। इसी प्रकार बघेरा गांव में मिलीं जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां इशारा करती हैं कि यहां कभी बड़ी तादाद में जैन मतावलम्बी रहते थे। कुछ मूर्तियां नया बाजार स्थित राजकीय संग्रहालय में रखी गई हैं।
जिस गढ़ का नाम इस शहर का पर्याय है, उसी तारागढ़ को ही लीजिए। अकबर-उल-अख्यार में ऐसा उल्लेख है कि तारागढ़ का किला किसी पहाड़ी पर निर्मित भारतवर्ष का प्रथम किला है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुरातात्विक दृष्टि से इसका कितना महत्व है। इसका स्थापत्य अनूठा है। दुर्ग की अनूठी विशेषता उसके तोरण द्वार को ढ़कने वाली वर्तुलाकार दीवार है। ऐसा भारत के किसी भी दुर्ग में नहीं है। इसमें प्रवेश के लिए एक छोटा-सा द्वार है। उसकी बनावट भी ऐसी है कि बाहर से आने वाले दुश्मनों को पंक्तिबद्ध करके आसानी से सफाया किया जा सके। मुख्य द्वार को ढ़कने वाली दीवार में भीतर से गोलियां और तीर चलाने के लिए पचासों सुराख हैं। किले के चारों तरफ 14 बुर्ज हैं, जिन पर मुगलों ने तोपें जमा की थीं। इन्हीं बुर्जों ने तो दुर्जेय तारागढ़ को अजेय बना दिया था। इसलिए तारागढ़ जिसके भी अधीन रहा, वह दुर्ग के द्वार पर कभी लड़ाई नहीं हारा। तारागढ़ के दुर्ग-स्थापत्य में चौदह बुर्जों का विशेष महत्व रहा। बड़े दरवाजे से पूरब की ओर जा रही किले की दीवार पर तीन बुर्जें हैं-घूंघट बुर्ज, गुमटी बुर्ज तथा फूटी बुर्ज। घूंघट बुर्ज इमारतनुमा है-दूर से यह नजर नहीं आती। बुर्ज की इस प्रकार की संरचना युद्धनीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जाती है। आगे है नक्कारची बुर्ज। कहते हैं कि सैय्यद मीरां साहब के साथ युद्ध में नगाड़ा बजाते हुए हजरत बुलन्दशाह यहीं मारे गए थे, इसलिए बुर्ज का नाम नक्कारची बुर्ज पड़ गया। अब तो ध्वंसावशेष ही दिखते हैं। शहर जाने वाली गिब्सन रोड उसी के पास से गुजरती है। इस बुर्ज के बाद है शृंगार चंवरी बुर्ज। वह आजकल लोढ़ों की कोठी है। इसके आगे चार बुर्जें हैं-अत्ता बुर्ज, पीपली बुर्ज, इब्राहिम शहीद का बुर्ज व दौराई बुर्ज। इनके बाद बान्द्रा बुर्ज, इमली बुर्ज, खिड़की बुर्ज व फतह बुर्ज है। इन बुर्जों के अलावा दुर्ग का दो किलोमीटर लम्बा परकोटा भी इसकी विशेषता है। इस परकोटे पर दो घुड़सवार आराम से साथ-साथ दौड़ सकते थे।
सन् 1033 से 1818 तक इस दुर्ग ने सौ से अधिक युद्ध देखे। औरंगजेब व दारा शिकोह के बीच दौराई में हुए युद्ध के दौरान 1659 में यह काफी क्षतिग्रस्त हुआ। सन् 1832 से 1920 के बीच अंग्रेजों ने इसमें काफी फेरबदल किया, जिसके परिणामस्वरूप अब टूटी-फूटी बुर्जों, हजरत मीरां साहब की दरगाह आदि के अलावा यहां कुछ भी बाकी नहीं बचा है।
पुरातात्विक दृष्टि से औरंगजेब को छोड़ कर अकबर, जहांगीर व शाहजहां ने अजमेर के सांस्कृतिक वैभव को बढ़ाने में भरपूर योग दिया। अजमेर में अनेक ऐसे प्राचीन स्मारक हैं, जो प्राचीन और मध्यकाल की सांस्कृतिक संपदा के द्योतक हैं। इनमें सर्वप्रथम अढ़ाई दिन का झौंपड़ा का नाम लिया जा सकता है। यहां से उपलब्ध पुरातात्विक सामग्री से यह प्रमाणित हो चुका है कि यह मूलत: एक संस्कृत विद्यालय, सरस्वती कंठाभरण था। अजमेर के पूर्ववर्ती राजा अरणोराज के उत्तराधिकारी विग्रहराज तृतीय ने इसका निर्माण करवाया था। सन् 1192 में मोहम्मद गौरी ने इसे गिराकर कर मात्र ढ़ाई दिन में पुन: बनवा दिया। बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे मस्जिद का रूप दे दिया। इस स्थान से च्ललित विग्रह राज नाटकज् तथा च्हरकेलि नाटकज् नाम से प्रसिद्ध नाटकों से उत्कीर्ण पाषाण शिलाएं प्राप्त हुई हैं।
स्थापत्य के दृष्टि से मैग्जीन के नाम से प्रसिद्ध अकबर का किला बहुत ही महत्वपूर्ण है। अकबर ने यह किला सामरिक दृष्टि से बनवाया था, जहां से समस्त दक्षिणी पूर्वी व पश्चिमी राजस्थान को उसने अपने अधिकार में कर लिया। अकबर और जहांगीर ने यहां से कई सैनिक अभियानों का संचालन किया। मेगजीन के मुख्य द्वार के दोनों तरफ दो-दो झरोखे हैं और एक गैलरी है। इन झरोखों में बैठ कर जहांगीर जनता की फरियाद सुनता था। यहां पर स्थापित अजमेर संग्रहालय में संग्रहित शिलालेख, सिक्के, प्रतिमाएं, चित्र, मूर्तियां, ताम्रपत्र इतने महत्वपूर्ण हैं कि राजस्थान के इतिहास के स्रोत के रूप में इस सामग्री में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।
शिलालेखों में बरली के शिलालेख का विशेष महत्व है। बरली के पास से भिलोट माता के मंदिर से प्राप्त चतुर्थ शताब्दी ईस्वी पूर्व का यह लेख राजस्थान में प्राचीनतम तथा अशोक से पूर्व का माना जाता है। दूसरा शिलालेख 424 ई. का है, इसमें विष्णु पूजा का प्राचीनतम उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार राजा वर्मलात का बसंतगढ़ का शिलालेख, मेवाड़ के राजा शिलादित्य का साभोली का शिलालेख, पुष्कर से राजा दुर्ग राज तथा वाक्पतिराज का शिलालेख, बीसलदेव विग्रहराज के राज्याश्रित च्कवि सोमदेवज् द्वारा रचित च्हरकेलिज् नाटक का शिलालेख महत्वपूर्ण है। इनसे राजस्थान के तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण ज्ञान होता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से संग्रहालय में संग्रहित सिक्के बहुत ही महत्व के हैं। इनमें से कुछ राजस्थान से तथा कुछ अन्य प्रदेशों से एकत्रित किये गये हैं। द्वितीय शताब्दी ईस्वी पूर्व से लेकर ब्रिटिश काल तक के सिक्के संग्रहालय में संग्रहित हैं। कुषाण, हूण तथा गुप्त कालीन राजाओं के सिक्के शोध कार्यों के लिये बहुत सहायक हैं। बीसलदेव विग्रहराज तथा पृथ्वीराज चौहान के सिक्के भी यहां संग्रहित हैं।
गंगानगर जिले के कालीबंगा नामक स्थान से प्राप्त सामग्री राजस्थान में सैन्धव सभ्यता के अध्ययन में विशेष सहायक है। इसी प्रकार नगर और बैराठ से शुंग काल की मूर्तियां राजस्थान में प्रचलित तत्कालीन वेश भूषा का ज्ञान कराती है। चितौड़ के निकट नगरी नामक स्थान से प्राप्त मूणमय मूर्तियां भी यहां उपलब्ध हैं। यहां पर संग्रहित ताम्रपत्र राजस्थान के इतिहास में विभिन्न चरणों के अध्ययन के लिये कम महत्वपूर्ण नहीं।
संग्रहालय में प्रदर्शित कई प्रतिमाएं ऐसी हैं, जो भारतीय मूर्तिकला में अपना सानी नहीं रखती। महत्ता की दृष्टि से हर्षनाथ सीकर से प्राप्त लिंगोद्भव प्रतिमा तथा अढ़ाई दिन के झौंपड़े से प्राप्त नक्षत्रों की प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। जैन धर्म की दिगम्बर और श्वेताम्बर संप्रदायों से संबंधित प्रतिमाओं का यहां अच्छा संग्रह है।
अजमेर से वाया पुष्कर पीसांगन मार्ग पर स्थित नांद गांव का भी पुरातात्विक दृष्टि से बड़ा महत्व है। नागौर जिलान्तर्गत थांवला के 10वीं शताब्दी के रनादित्य के शिलालेख में इस स्थान का नाम नन्द ग्राम के रूप में प्रयुक्त हुआ है। वर्तमान नांद ग्राम में कुषाण कालीन रक्त पाषाण निर्मित शिवलिंग मिला है। शिवलिंग की उपलब्धि से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि यहां पर कभी शिव मंदिर रहा होगा।
पुरावस्तुओं का रजिस्ट्रीकरण
पुरातात्विक वस्तुओं का पंजीयन करने के लिए रजिस्ट्रीकरण कार्यालय की स्थापना अजमेर में पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम 1972, जो अप्रैल 1975 में यथा रूप से लागू किया गया है, के अन्तर्गत मई, 1976 में हुई। इस कार्यालय का कार्यक्षेत्र, अजमेर, पाली, भीलवाड़ा तथा सिरोही जिला है और अब तक अजमेर से लगभग 550, भीलवाड़ा से 68 और पाली से 30 पुरावस्तुओं का पंजीकरण किया गया है। पंजीकृत वस्तुओं में अब तक प्राप्त प्राचीनतम वस्तुओं में नवीं शताब्दी की पाषाण मूर्तियां हैं। पंजीकरण के लिये प्राप्त सामग्री में दूसरी व तीसरी शताब्दी ईस्वी की भी वस्तुएं, जिनमें एक बौद्ध मूर्ति उल्लेखनीय है, प्राप्त की गई है। अधिनियम के तहत वर्तमान में 100 वर्ष से अधिक पुरानी मूर्तियां, चित्र हस्त लिखित चित्रित ग्रन्थ आदि पुरावस्तुओं का पंजीकरण किया जाता है।
जिले में स्थित प्रमुख किले
तारागढ़, अकबर का किला, टॉडगढ़ में कर्नल टॉड द्वारा बनवाया गया किला और गोठियाना, बघेरा, धीरोता, धोलादांता, सरवाड़, धूंधरी, राताकोट, सावर, कादेड़ा, राजगढ़, पीपलाज, कदेड़ा, बांदनवाड़ा, जूनिया, जामोला, रलावता, केलू, श्यामगढ़, शोकलिया, मंडावरिया, गोविंदगढ़, पांडरवाड़ा, अरांई, रूपनगढ़, बाघसुरी, तिलोनिया, ढ़सूक, करकेड़ी, पाडलिया, भामोलाव, फतहगढ़, खरवा, मसूदा, रामगढ़ व सांपला।
केन्द्र सरकार की ओर से संरक्षित स्मारक
1. अढ़ाई दिन का झौंपड़ा
2. सोलह खंभा
3. आनासागर किनारे संगमरमर के बरामदे व पुराने हमाम
4. सुभाष उद्यान स्थित सहेली बाजार
5. नया बाजार स्थित बादशाह बिल्डिंग
6. तारागढ़ किले का द्वार
7. स्टेशन रोड स्थित अब्दुल्ला खां व उसकी बीवी का मकबरा
8. बादशाही महल
9. देहली गेट
10. त्रिपोलिया गेट
11. अजमेर-जयपुर रोड पर स्थित बावड़ी
12. अकबर द्वारा निर्मित कोस मीनार संख्या 1, 2, 3, 4, 7, 8, खानपुरा की कोस मीनार व चुगरा की कोस मीनार
राज्य सरकार की ओर से संरक्षित स्मारक-
1. अकबर का किला
2. अकबर के किले का मुख्य द्वार
3. संतोष बावला के स्मारक, पुष्कर
4. दिगम्बर जैन संतों के स्मारक
5. गोपीनाथ मंदिर, सरवाड़
6. चामुंडा माता का मंदिर।

तेजवानी गिरधर
227, हरिभाऊ उपाध्याय नगर (विस्तार), अजमेर
फोन: 0145-2600404, मोबाइल : 7742067000, 8094767000
ई-मेल:tejwanig@gmail.com

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