अजमेर। लोक पर्व एवं संस्कृति सागर संस्थान द्वारा गत वर्षों की भाँति इस वर्ष भी भाद्र पद शुक्ल पूर्णीमा से अष्विन कृष्णा अमावस्या तक चलने वाला साझी उत्सव का आज दिनांक 23.9.14 को विश्राम किया गया। उपरोक्त कार्यक्रम के तहत् संध्या देवी एवं श्री राधे कृष्ण के युगल स्वरूप की दिव्य लीलाओं को सूखे रंगों एवं पुष्पों से चित्रित कर पूजन एवं आरती की गई। लोक संस्कृति की महक को बिखेरता ये पर्व नारी के स्वाभिमान को अभिव्यक्त करता है एवं श्री राधे कृष्ण के प्रेम विहार का उत्सव के साथ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने, धरती के श्रृंगार, प्रकृति प्रेम के अतिरिक्त कलात्मक सौन्दर्य बोध का सन्देष देने वाला पर्व है।
सांझी एक अनूठी परम्परा –
वैष्णव जन के हर घर के आंगन और तिवारे में बनाने की परम्परा है जो रसिक भक्त राधारानी के स्वागत के लिये सजाते रहे हैं। राधारानी अपने पिता वृषभान जी आंगन में सांझी पितृ पक्ष में प्रतिदिन सजाती थी। उनके भाई एवं परिवार का मंगल हो इसके लिये वे फूल एकत्रित करने के लिये बगीचों में जाती थी और इसी बहाने श्री राधा-कृष्ण (प्रिया-प्रियतम) का मिलन होता था। उसी मर्यादा को जीवित रखते हुए अविवाहित कन्याएं आज भी पितृ पक्ष में अपने घरों में गाय के गोबर से सांझी सजाती हैं। इसमें राधा कृष्ण की लीलाओं का चित्रण अनेक सम्प्रदाय के ग्रंथों में मिलता है। विष्वास है कि श्री राधा-कृष्ण उनकी सांझी को निहारने के लिये अवष्य आऐंगे। शुरू में पुष्प और सुखे रंगों से आंगन को सांझी से सजाया जाता था। लेकिन समय के साथ सांझी सिर्फ सांकेतिक रह गयी है। सरसमाधुरी काव्य में सांझी का कुछ इस तरह उल्लेख किया गया है- ‘सलोनी सांझी आज बनाई, श्यामा संग रंग सों राधे, रचना रची सुहाई। सेवाकुंज सुहावन कीनी, लता पता छवि छाई। मरकट मोर चकोर कोकिला, लागत परम सुखराई।’
कला, प्रेम, भक्ति, एकता, सौहाद्र और सामाजिकता का सन्देष देने वाला यह पर्व आज भी हमारी भावनाओं को जीवंत रखे हुये है। यदि हमें हमारी वैभवषाली सांस्कृतिक धरोहर को जीवन्त रखना है तो ऐसे पर्वों को पुनर्जीवित करने एवं भव्यता से सामूहिक रूप से मनाने की नितान्त आवष्यकता है। आप के कार्यक्रम में श्रीमती सुषीला अग्रवाल, वर्तिका शर्मा, सुनीता शर्मा, उर्मिला, सरला गोयल सहित अनेक महिलाओं ने भाग लिया।
अरुणा गर्ग
8764051325