लोहागल गौशाला की चारदीवारी का शिलान्यास

सत्यनारायण व्रत से शिक्षा मिलती है कि सत्यरूप ब्रह्म जीवात्मा रूप में हमारे अंदर विद्यमान:श्री पुष्करदास जी महाराज
नरसी मेहता और नानी बाई का मायरा कथा समापन

4अजमेर। श्री पुष्कर गौ आदि पशुशाला समिती की ओर से लोहागल रोड स्थित गौशाला में चल रही भक्त नरसी मेहता और नानी बाई का मायरा कथा के अंतिम दिन शनिवार को सुविख्यात संत एवं कथावाचक श्री पुष्करदास जी महाराज ने कथा पूर्णाहुति के पश्चात श्री सत्यनारायण भगवान की कथा का वाचन किया।
संत एवं कथावाचक श्री पुष्करदास जी महाराज ने कथा के दौरान नरसी भक्त के नानीबाई के सुसराल जाने का वृतांत सुनाया। इस कथा में बेटियों को बेटों से ज्यादा जिम्मेदार, समझदार आदर्शवादी बताया। उन्होंने कहा कथा से भगवान से मिलने का रास्ता खुल जाता है। एक बार रास्ता खुल जाता हैं तो भक्त और भगवान के बीच की दूरी खत्म हो जाती है। वो सत्मार्ग पर चल पड़ता है। भगवान् को भक्तवत्सल कहा जाता है। वत्स गाय के बछड़े को कहा जाता है। श्रीकृष्ण भगवान हैं तो भक्त उसके वत्सल यानि बछड़े हैं। जैसे गाय हमेशा अपने बछड़े का ध्यान रखती है उसी प्रकार प्रभु अपने भक्तों का ध्यान रखते हैं।
विशेष रूप से उपस्थित राजस्थान प्रदेश काँग्रेस कमेटी के सचिव महेंद्र सिंह रलावता ने कहा कि दिव्य गुणों की स्वामिनी गौ माता | गौ या गाय हमारी संस्कृति की प्राण है। यह गंगा, गायत्री, गीता, गोव‌र्द्धन और गोविंद की तरह पूज्य है। अनादिकाल से मानवजाति गोमाता की सेवा कर अपने जीवन को सुखी, सम्रद्ध, निरोग, ऐश्वर्यवान एवं सौभाग्यशाली बनाती चली आ रही है।
unnamed (1)श्री पुष्कर गौ आदि पशुशाला समिती के तत्वाधान में आयोजित कथा के आयोजक गौभक्त लक्ष्मीनारायण हटूका ने बताया कि संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि विकार को जीतने और जीवन को पवित्र बनाने के लिए मनुष्य को अपनी असल और नसल को याद रखना चाहिए । असल का अर्थ है हम वास्त्व हैम सब निमित्त मात्र आत्मा हैं । यह पाँच तत्वों से बना शरीर हमसे भिन्न है। हम तो परम पिता परमात्मा की संतान हैं और उसकी संतान होने के कारण सभी प्राणी मेरे समान ही हैं । ऐसा भाव मन में रखने से मनुष्य की दृष्टि, वृति और स्थिति बदल जाती है और संस्कार बदलने शुरू हो जाते हैं ।
संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि इस दुनिया का संचालन करने वाला कोई ओर है। मानव में मैं का अहं कभी नहीं होना चाहिए। यदि हमारा अहं अधिक है तो हम स्वयं को आत्मा अथवा हमारे अंतर में विद्यमान ईश्‍वरीय तत्व से कम पहचानते हैं। अहं को स्वयं के विषय में अभिमान के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। मेरा शरीर, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा जीवन, मेरी संपत्ति, मेरी पत्नी और बच्चे, मुझे सुख मिले इत्यादि विचार अहं के कारण उत्पन्न होते हैं। व्यक्ति का अहं अधिक होने के कारण वह स्वयं को आत्मा के रूप में नहीं पहचानता । अहं के कारण उसके चारों ओर काली शक्ति का आवरण एकत्रित हुआ है। साथ ही, जब किसी का अहं अधिक होता है तब ईश्‍वरीय कृपा का प्रवाह भी अवरुद्ध होता है।
संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि ईश्वर ने जो प्रकृति बनाई है वह तो अति सुन्दर और स्वच्छ है। गंदगी तो इंसान करता है। उन्होंने कथा के माध्यम से स्वच्छता का सन्देश देता हुए कहा कि सभी बीमारियों और मौतों में से आधी घटनाएँ गंदे हाथों से, या गंदे खाने और पानी से उनके मुँह में जानेवाले रोगाणुओं के कारण होती है। अच्छी स्वास्थ्य आदतों के कारण बहुत-सी बीमारियों से बचाव हो सकता है। स्वच्छता उतना ही ज़रूरी है जितना दान-पुण्य के काम और उद्धार का प्रचार करना। स्वच्छता, शुद्ध और पवित्र परमेश्‍वर का एक गुण है और उसी से स्वच्छता की शुरूआत हुई है। दरअसल वह हमारे लाभ के लिए सिखाता है। और जब हम अपने हर काम में पवित्र और स्वच्छ रहते हैं तो इससे हमें ही फायदा होता है।
संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि भक्त होने का मतलब है कि वह अपने खुद के विचारों को, अपनी भावनाओं को कोई महत्व नहीं देता, क्योंकि वह जानता है कि वह कुछ भी नहीं है। वह किसी काम का नहीं है। वह नहीं सोचता कि ईश्वर को देख लेना महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके लिए वह महत्वपूर्ण नहीं है, जो वह करता है। वह जानता है कि अपने विचार, अपनी भावनाएं बनाने के लिए इस अस्तित्व में वह बेहद छोटा है। अगर आप इस बात को समझ पाते हैं तो आप स्वाभाविक रूप से भक्त हैं।
संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं। उनके व्रत-पूजन करो जिसे करने से मुनष्य सब प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाता है। इस व्रत में उपवास का भी अपना महत्व है किंतु उपवास से मात्र भोजन न लेना ही नहीं समझना चाहिए। उपवास के समय हृदय में यह धारणा होनी चाहिए कि आज श्री सत्यनारायण भगवान हमारे पास ही विराजमान हैं। अत: अंदर व बाहर शुचिता बनाये रखनी चाहिए और श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान का पूजन कर उनकी मंगलमयी कथा का श्रवण करना चाहिए। श्री सत्यनारायण की कथा बताती है कि व्रत-पूजन करने में मानवमात्र का समान अधिकार है। चाहे वह निर्धन, धनवान, राजा हो या व्यवसायी, ब्राह्मण हो या अन्य वर्ग, स्त्री हो या पुरुष, सभी को यह कथा सामान फल प्रदान करती है। कथासार ग्रहण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि जिस किसी ने सत्य के प्रति श्रद्धा-विश्वास किया, उन सबके कार्य सिद्ध हो गये। श्री सत्यनारायण व्रत से हमें शिक्षा मिलती है कि सत्यरूप ब्रह्म जीवात्मा रूप में हमारे अंदर विद्यमान है। हम सब सत्य के ही स्वरूप हैं, पर माया के वश में आकर नष्ट होने वाली वस्तुओं को संग्रह करने की सोचकर संसार में मग्न हो रहे हैं। इस अज्ञान को दूर करके सत्य को स्वीकार करना और प्रभु की भक्ति‍ करना ही मानव का धर्म है, यही सत्यनारायण व्रत और कथा का सार है।
गौशाला की चारदीवारी का शिलान्यास:-
कथा से पूर्व संत श्री पुष्करदास जी महाराज के सानिध्य में श्री पुष्कर गौ आदि पशुशाला समिती की ओर से लोहागल रोड स्थित गौशाला के चरों ओर बनने वाली चारदीवारी का शिलान्यास किया गया। गौशाला समिति के अध्यक्ष माणकचंद सिसोदिया, लक्ष्मी नारायण हटूका, दिनेश प्रणामी, ओम प्रकाश मंगल, सूरज जी अग्रवाल और सत्यनारायण पालीवाल ने शिला पूजन किया।
कथा के दौरान संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने साज की मधुर धुन पर जय राधा माधव जय कुंज बिहारी, चक्र चलाया था श्याम तेरी ऊँगली ने दुनिया बनाने वाला दुनिया मिटने वाला सब कुछ है भगवान, प्रभु सुनियो अर्ज़ी लाया हूँ, नहीं है मन का कुछ भी ठिकाना, भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना, आदि भजन भी प्रस्तुत किये जिस पर कथा प्रांगण मे उपस्थित श्रद्धालु भाव विभोर होकर नृत्य करने लगे। श्रीमती सरोज गर्ग ने बांसुरी वादन किया तो पंडाल में उपस्थित गौभक्त कथाप्रेमी मंत्रमुग्ध हो गए।
कथा मे सहयोग देने वालों का सम्मान:-
कथा में विशेष रूप से उपस्थित राजस्थान प्रदेश काँग्रेस कमेटी के सचिव महेंद्र सिंह रलावता, नगर सुधर न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन और विश्व हिन्दू परिषद के शशि प्रकाश इन्दोरिया एवं लेखराज सिंह ने कथा पूजन कर संत श्री पुष्करदास जी महाराज का चरणवन्दन किया। कथा में सक्रिय सहयोग के लिए विजय कुमार शर्मा, गोपाल गर्ग, शशि प्रकाश इन्दोरिया, कैलाश डीडवानिया, शान्ति स्वरुप अग्रवाल, किशनजी अग्रवाल, सूरज जी अग्रवाल, अशोक ओझा, डॉ. के जी. गोपाल, सत्यनारायण पालड़ीवाला, प्रभात फेरी परिवार के आलोक माहेश्वरी और करणसिंह का अभिनंदन किया गया। योगेंद्र ओझा ने कथा आयोजकों और कथा में उपस्थित श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया।
शुक्रवार की कथा का शुभारम्भ ग्रन्थ पूजन से हुआ। विद्वान आचार्यगण पंडित गोविन्द जी कोइराला, आचार्य बालकिशन और आनंद जी ने भगवत पूजन कराया। मंच संचालन उमेश गर्ग ने किया।

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