आतंकवादी इस्लाम की गलत तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं

अजमेर 13 मार्च । सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के वंशज एवं वंशानुगत सज्जादानशीन दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान ने मुसलमानों से एकजुटता पर जोर देते हुए तालीम को हथियार बनाने का आह्वान किया उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि हिंदुस्तान में इस्लाम खानकाहों के बूते फैला है ना की मदरसों से । खानकहां (दरगाह) मुल्क में अमन और इत्तेहाद की गवाह है। अमेरिका और इजरायल के इशारों पर काम कर रहे मुट्ठी भर आतंकवादी इस्लाम की गलत तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
दरगाह दीवान आबेदीन अपने पूर्वज सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के 807वें सालाना उर्स के समापन की पूर्व संध्या पर ख्वाजा साहब की दरगाह स्थित खानकाह में देश की प्रमुख दरगाह के सज्जादगान चिष्तिया खानकाहों के प्रमुख एवं धर्मगुरुओं की वार्षिक सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि हिन्दुस्तान में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती जैसे सूफियों की बदौलत इस्लाम फैला है ख्वाजा गरीब नवाज ने हर मजहब और मिल्लत के मानने वालों को रास्ता दिखाया। सूफी औलिया ही इस मुल्क में इस्लाम की पहचान हैं। इस्लाम की बुनियाद ही अमन और भाईचारा है तमाम खानकाहों से जोड़कर एक नए इत्तेहाद और सद्भावना के
रिश्ते की शुरूआत करना चाहते हैं।
बैठक में रफ्तार से फैल रहे देश में समाज व धर्मीक नफ़रत के माहोल पर गम्भीर चिंतन किया गया कि इस्लाम हर रूप में चरमपंथ के विरूद्ध है, चाहे उसका उद्देश्य कुछ भी हो। भारत का हर समाज व धर्म इस समय दोहरे दबाव से गुजर रहे हैं एक तरफ भारत के सीमांत क्षेत्रों में पाकिस्तान द्वारा लगातार की जा रही आतंकवाद की गैर इस्लामी हरकतों से लोग धार्मिक तौर पर दुख महसूस कर रहे हैं तो दूसरी ओर माॅबलिचिंग वह देश के अंदर हर समाज कट्टरवाद के निशाने पर हैं ख़ास तौर से देश में मुस्लिम विरोधी विचारधारा वाले संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत का एक व्यवस्थित आंदोलन चला रखा है. टीवी चैनलों, अखबारों, सोशल मीडिया पर इस्लाम विरोधी और मुसलमान विरोधी भावनाएं व्यक्त की जा रही हैं भारतीय समाज में एक दूसरे के प्रति विकसित हो रही घृणा देश के विकास के लिय विनाश का प्रतीक है। इन प्रवृत्तियों के कारण बन रहे माहौल में न हम अपने मन की बात से भिन्न कुछ सुनना चाहते हैं, न कुछ समझना चाहते हैं।हमें देखना होगा कि , भय एवं असंयम की चेतना समाज के आधार तलों में पहुंचकर कहीं हमारे समाज वृक्ष की जड़ों को कुतर न दे।
दरगाह दीवान ने कहा कि धर्मो और समाज में पनप रही आपसी घृणा केवल समाज के ताने-बाने को ही छिन्न-भिन्न नहीं करती है, बल्कि इसका राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, उसके विकास एवं अंतर्राष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आज वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय वित्त एवं व्यापार व्यवस्था में किसी भी देश की छवि का बहुत महत्त्व है। यह छवि ही अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों को उनकी पूंजी के सुरक्षित होने को लेकर आश्वस्त करती है। बढ़ता नफ़रत का माहोल राष्ट्र के अंदर चल रहे राजनीतिक विमर्श में भी भटकाव पैदा करती है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में जहाँ गरीबी, बढ़ती जनसंख्या और भूख इत्यादि राष्ट्रीय चिंता एवं चर्चा के विषय होने चाहियें, वहाँ खान-पान के तरीके राजकीय चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनकर उभर रहे हैं। इससे भी दीर्घकाल में राष्ट्र की विकास यात्रा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे अंततः समाज में वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील सोच को विकसित करने की कोशिशों को भी धक्का लगता है।
उन हो ने कहा की इतिहास गवाह है की भारत में हिंदुओ और मुसलमानो व अन्य धर्मों के लोगो के दरम्यान रवायती बिरादराना रिश्ते को आज़ादी की लड़ाई से पहले लड़ाई के दौरान व इस लड़ाई के बाद भी मोदूद रहे है । ये दोनो समुदाय स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान अंगरेजो के ख़िलाफ़ कन्धे से कन्धे मिलाकर लड़े । भारत की गंगाजमुनि तहज़ीब हमारी साझा संस्कृति की मिसाल है ।जिसे हमें हमेशा ज़िंदा रखना होगा ताकि आपसी भाईचारा बना रहे ।आज भी भारत के गली कूचों में कई एसे धार्मिक स्थान दरगाह व अन्य महत्वपूर्ण स्थल मिल जाएँगे जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनो अपने अपने श्र्धासुमन अर्पित करने या मन्नते माँगने जाते है । जिस का उदाहरण अजमेर शरीफ़ हज़रत निज़ामुद्दीन , क्लीयर शरीफ़ , बदायू , देवा शरीफ़ , व अन्य धार्मिक स्थल है जहाँ सभी धर्मों के लोग हमेशा की तरहें अभी भी आते जाते रहते है ।आस्था और ज्ञान में बड़ा फ़र्क़ है । ज्ञान किसी भी धर्म के बारे में बुरा नही है ये हमारी साझा विरासत है इसे संस्कृति भी कहा जा सकता है । हो सकता है किसी भी साथी के इस बारे में विचार ठीक न हाई लेकिन इसमें सच्चाई है , धार्मिक लोग इस बात से शायद सहमत न हो लेकिन एसे उदाहरण कई राज्यों में मिल सकते है ।हमारी साझा संस्कृति में अक्सर यह देखा गया है की अगर मस्जिद का निर्माण हो रहा है तो हिंदू भाई उसमें सहियोग करते है और अगर मंदिर का निर्माण हो रहा है तो मुस्लिम भाई उसमें सहयोग करते है यह साझा संस्कृति हमें विरासत में मिली है ।
देश में बढ़ती इस नफ़रत्त की दीवार के बीच समाज की भूमिका पर विचार करते हुऐ वक्ताओं ने इससे निपटने या उसकी रोकथाम के लिये पूरे समाज की सम्मिलित ऊर्जा को कार्य पर जौर देते हुऐ कहा कि इसके अभाव में समाज के बिखराव या फिर अधिनायकवादी हो जाने का खतरा मंडराता रहता है। इस प्रयास में बुद्धिजीवी वर्ग, राजनीतिक वर्ग, आम लोगों एवं पत्रकारिता सभी पर महत्त्वपूर्ण दायित्व होते हैं। बुद्धिजीवी वर्ग के अंतर्गत आने वाले इतिहासकारों, लेखकों एवं कलाकारों को समझना होगा कि कट्टरवाद का विरोध चयनात्मक नहीं हो सकता। राजनीतिज्ञों को भी परिपक्वता का परिचय देते हुए
एसे मुद्दे पर प्रतिस्पर्द्धी राजनीति से ऊपर उठकर और एक मंच पर आकर इन समाज के दुश्मनों का विरोध करना होगा। यह कोई दिवास्वप्न नहीं है अपितु एक स्वस्थ लोकतंत्र की सहज संभावना है जिसमें जनता के लिये और जनता के द्वारा ही राजनीति का निर्माण होता है। आम नागरिकों को चाहिये कि वे धार्मिक कट्टरवाद पर आधारित राजनीति करने वालों को नकार दें ताकि एक बेहतर समाज का स्वप्न समाज व धर्मीक नफ़रत की भेंट न चढ़ जाए।
इस पारंपरिक आयोजन में देष प्रमुख चिष्तिया दरगाहों के सज्जादगान व धर्म प्रमुखों में शाह हसनी मियां नियाजी बरेली शरीफ, मोहम्मद शब्बीरूल हसन गुलबर्गा शरीफ कर्नाटक, अहमद निजामी दिल्ली, सैयद तुराब अली हलकट्टा शरीफ आध्रप्रदेष, सैयद जियाउद्दीन अमेटा शरीफ गुजरात, बादषाह मियां जियाई जयपुर, सैयद बदरूद्दीन दरबारे बारिया चटगांव बंगलादेष, सहित भागलपुर बिहार, फुलवारी शरीफ यु.पी., उत्तरांचल प्रदेष से गंगोह शरीफ दरबाह साबिर पाक कलियर के अलीषाह मियां, गुलबर्गा शरीफ में स्थित ख्वाजा बंदा नवाज गेसू दराज की दरगाह के नायब सज्जादानशीन सैयद यद्दुलाह हसैनी, दरगाह सूफी कमालुद्दीन चिष्ती के सज्जानषीन गुलाम नजमी फारूकी, नागौर शरीफ के पीर अब्दुल बाकी, दिल्ली स्थित दरगाह हजरत निजामुद्दीन के सैयद मोहम्मद निजामी, सहित देशभर के सज्जादगान मौजूद थे।

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