*भीतर के महाविरत्व को जागृत करें: गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि*

संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि हम बहुत भाग्यशाली है जो हमें जिनवाणी सुनने का मौका मिल रहा है। उत्तराध्यन सूत्र का 14वां अध्ययन है इक्षुकारीय।इक्षुकार राजा व इक्षुकार नगर का नाम होने से इस अध्ययन का यह नाम रखा गया। इस अध्ययन में जब भृगु पुरोहित के पुत्र दीक्षा लेने को तैयार हुए तो वह उन्हें रोकने का प्रयास करता है, वह कहता है कि पहले वेद पढ़ो, संतान पैदा करो, और फिर पिछली अवस्था में संयम लेना।तब वह पुत्र कहते हैं कि वेद भी जीव को त्राण देने में समर्थ नहीं हो सकते हैं। संसार के सुख क्षणिक है जिनके पीछे बहुत काल का दुख छिपा हुआ है। काल पर भरोसा वही व्यक्ति कर सकता है,जिसकी मृत्यु से मित्रता होती है।जो मौत से भाग सकता है।और जो यह समझे कि मुझे कभी मरना ही नहीं है। वही व्यक्ति काल का भरोसा कर सकता है। आत्मा के संबंध में पूछने पर पुत्रों ने कहा की आत्मा अमूर्त है और इंद्रियां मुर्त है, तभी तो जीवित रहते हुए इंद्रियां कार्य करती है। मगर आत्म तत्व के शरीर से निकल जाने पर इंद्रियां भी निस्चेस्ट हो जाती है।
बेटों के नहीं मानने पर भृगु पुरोहित व उसकी पत्नी भी दीक्षा को तैयार हो जाते हैं। परिवार में और कोई सदस्य नहीं होने के कारण राजा इक्षुकार उनकी संपत्ति को राज्य में मिलाने का प्रयास करता है। तब रानी कमलावती उन्हें धिकारती है, कि पुरोहित की छोड़ी हुई संपत्ति हमें लेना शोभा नहीं देता। क्योंकि वमन किए हुए को तो श्वान ग्रहण करता है।हमें भी संसार का त्याग करके संयम जीवन को स्वीकार करना चाहिए। राजा ने भी संयम की उपादेयता को समझा। राजा रानी और भृगु पुरोहित आदि छ ही सदस्य संयम जीवन को स्वीकार करते हैं। और मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
15वां अध्याय है सभिक्षु।इसमें साधु जीवन की विशेषताएं बताई है।इसमें द्रव्य साधु से भाव साधुत्व में प्रवेश की प्रेरणा प्रदान की गई है। साधु को मंत्र,विद्या आदि का प्रयोग नहीं करना होता है।संघ रक्षा या संघ हित की बात अलग होती है। साधु को नित्य सरस आहार का सेवन नहीं करना। साधु को देव, त्रियंच व मनुष्य आदि के भय उत्पन्न करने वाले शब्दों को सुनकर भयभीत नहीं होना।आदि विशेषताओं को सुनकर जीवन परिवर्तन का प्रयास करना चाहिए।
महावीर कथा में मरीचि का जीव देव व मनुष्य के भव करते हुए 16 वे भव में राजकुमार विश्वभूति बनते हैं।वहां पर संसार की स्वार्थ भरी स्थितियों से उनका मन संसार से उचट जाता है और वह संयम जीवन को स्वीकार कर लेते हैं।हमारे सामने भी संसार के स्वार्थ वाली बहुत सारी घटनाएं आती है मगर हम उनमें से कितनी शिक्षाएं ले पाते हैं।राजकुमार विश्वभूति संयम लेकर मास मास खमण की उग्र तपस्या से अपनी आत्मा को भावित करते हैं।
हमें उत्तराध्यन सूत्र व महावीर कथा के माध्यम से हमारे भीतर में महाविरत्व को जागृत करना है।अगर ऐसा प्रयास व पुरुषार्थ रहा तो यत्र तत्र सर्वत्र आनंद ही आनंद होगा।
धर्म सभा में सूत्र का मूल वचन पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने किया।
धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।
पदमचंद जैन

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