पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 58वीं पुण्यतिथि पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

एकात्म मानव दर्शन: राष्ट्रनिर्माण के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय का प्रेरक संदेश – चिन्तक हनुमान सिंह राठौड़

अजमेर। महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय के सिंधु शोध पीठ द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 58वीं पुण्यतिथि के अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता शिक्षाविद् एवं चिंतक श्री हनुमान सिंह राठौड़ ने युवाओं से संवाद करते हुए कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद आज के समय में भी समाज और राष्ट्र के समग्र विकास का मार्गदर्शक है। उन्होंने युवाओं से भारतीय ज्ञान परंपरा को समझते हुए राष्ट्रहित में सकारात्मक योगदान देने का आह्वान किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन और चिंतन समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने कहा कि उनका जीवन संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी दृढ़ संकल्प, परिश्रम और राष्ट्रनिष्ठा के माध्यम से महान लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और उच्च पदों के अवसरों को त्यागकर राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया और समाजहित को सर्वोपरि माना। श्री राठोड़ ने कहा कि एकात्म मानव दर्शन समाज के समग्र विकास का मार्ग प्रस्तुत करता है, जिसमें व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के बीच संतुलन तथा समन्वय पर विशेष बल दिया गया है। उन्होंने बताया कि किसी भी विदेशी विचार या व्यवस्था को अंधानुकरण से स्वीकार करने के बजाय उसे भारतीय परिस्थितियों और मूल्यों के अनुरूप अपनाना चाहिए, जबकि स्वदेशी परंपराओं को समयानुकूल रूप में विकसित करना चाहिए। यह दृष्टि आज के वैश्वीकरण के युग में अत्यंत प्रासंगिक है।

उन्होंने सामाजिक जीवन में नैतिकता, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का महत्व बताया। राजनीति हो या सामान्य नागरिक जीवन—सिद्धांतों से समझौता न करना, जाति या स्वार्थ के आधार पर निर्णय न लेना और समाजहित को प्राथमिकता देना उनके जीवन का प्रमुख संदेश है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं, बल्कि समाज के नियमों और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए जिम्मेदार जीवन जीना है। आज युवाओं के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय का संदेश है कि वे अपने वर्तमान को सशक्त बनाकर राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करें। भारतीय जीवन-दर्शन की समग्र और मानवकल्याणकारी दृष्टि को अपनाकर ही समाज में स्थायी शांति, समरसता और प्रगति स्थापित की जा सकती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय केवल विचारक ही नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने वाले कर्मयोगी थे। उन्होंने विश्वविद्यालयों में भारतीय दृष्टि पर आधारित अध्ययन, अध्यापन और शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। कुलगुरु ने अपने संबोधन में कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का दर्शन आज भी राष्ट्रनिर्माण के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।  कुलगुरु प्रो अग्रवाल के अनुसार राष्ट्र की भी एक आत्मा होती है, जिसके आधार पर समाज, शिक्षा और जीवन के लक्ष्य निर्धारित होते हैं। कुलगुरु ने विश्वविद्यालयों से भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित अध्ययन, अध्यापन और शोध को बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए कहा कि इसी दिशा में कार्य करना दीनदयाल जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

सिंधु शोध पीठ के निदेशक प्रो. सुभाष चंद्र ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया, जबकि कुलसचिव कैलाश चंद्र शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अंजू अग्रवाल ने किया। कार्यक्रम में प्रो. अरविंद पारीक, प्रो. ऋतु माथुर, प्रो. मोनिका भटनागर, प्रो. प्रवीण माथुर, डॉ. अश्विनी तिवाड़ी, डॉ. सूरज मल राव, डॉ. राजू शर्मा, डॉ. लारा शर्मा, डॉ. विवेक शर्मा सहित अन्य अतिथि, शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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