अजमेर। महार्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि भारत में होने वाले अनुसंधान का आधार भारतीय ज्ञान, भारतीय जीवन-दृष्टि और भारतीय आवश्यकताओं से जुड़ा होना चाहिए। भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा में अनुसंधान कभी संकीर्ण विषयगत सीमाओं में बंधा नहीं रहा, बल्कि ज्ञान की विभिन्न धाराओं के बीच संवाद, समन्वय और अंतर्संबंध इसकी मूल विशेषता रहे हैं।
कुलगुरु कनोडिया महिला महाविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘बहुविषयी अनुसंधान एवं नवाचार के माध्यम से भारत का रूपांतरण’ के समापन समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रांताओं तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने भारत की मौलिक अनुसंधान एवं शिक्षा प्रणाली को अलग-अलग खंडों में विभाजित कर दिया। इसका दीर्घकालीन प्रभाव यह हुआ कि भारतीय ज्ञान की समग्र दृष्टि कमजोर हुई और हम अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी मौलिक क्षमता के अनुरूप प्रगति नहीं कर सके।
प्रो. अग्रवाल ने कहा कि भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा में ज्ञान को अलग-अलग खांचों में नहीं देखा जाता था। एक ही गुरु के मार्गदर्शन में शस्त्र और शास्त्र, नीति और दर्शन, विज्ञान और जीवन-मूल्यों का अध्ययन संभव था। उन्होंने कहा कि आज शिक्षा और अनुसंधान को इसी समन्वित दृष्टि से पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है। हमें ज्ञान के विभाजन से ज्ञान के संवाद और अंततः ज्ञान के एकीकरण की ओर बढ़ना होगा।
उन्होंने भारतीय परंपरा में निहित समग्र अनुसंधान की अवधारणा पर विशेष बल देते हुए कहा कि भारतीय अनुसंधान-दृष्टि अत्यंत अंतर्विषयी और बहुविषयी रही है। भारतीय ज्ञान परंपरा में परा और अपरा विद्या के बीच भी संवाद और समन्वय की स्पष्ट अवधारणा दिखाई देती है। ज्ञान को केवल रोजगार अथवा उपयोगिता का माध्यम न मानकर जीवन, समाज, प्रकृति और मानव कल्याण से जोड़कर देखने की यह दृष्टि आज के अनुसंधान के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
कुलगुरु ने कहा कि वर्तमान समय में जब दुनिया पर्यावरण संकट, तकनीकी परिवर्तन, सामाजिक असमानता और सांस्कृतिक संक्रमण जैसी जटिल चुनौतियों का सामना कर रही है, तब किसी एक विषय की सीमाओं में रहकर इन समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। बहुविषयी और अंतर्विषयी अनुसंधान ही भविष्य की आवश्यकताओं को प्रभावी रूप से पूरा कर सकता है। भारतीय ज्ञान परंपरा इस दिशा में विश्व को एक वैकल्पिक और समग्र दृष्टि प्रदान करने की क्षमता रखती है।
उन्होंने शोधार्थियों का आह्वान किया कि वे केवल पश्चिमी शोध प्रतिमानों का अनुकरण न करें, बल्कि भारतीय संदर्भ, भारतीय अनुभव और भारतीय ज्ञान परंपरा को अपने अनुसंधान का सक्रिय आधार बनाएं। उन्होंने कहा कि भारत को ज्ञान का केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का सृजक और वैश्विक ज्ञान-विमर्श का नेतृत्वकर्ता बनना होगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ज्ञान को जीवन से जोड़ने की परंपरा रही है। इसलिए आज आवश्यकता केवल पाठ्यक्रमों में परिवर्तन करने की नहीं, बल्कि ज्ञान को देखने की दृष्टि में परिवर्तन करने की है। शिक्षा और अनुसंधान को प्रकृति, समाज, संस्कृति, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और मानवीय मूल्यों के साथ जोड़कर एक समग्र दृष्टिकोण विकसित करना समय की मांग है।
सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए तथा देश-विदेश से आए लगभग 450 प्रतिभागियों ने सहभागिता की। समापन समारोह में एच.एस. शर्मा, एन.डी. माथुर, रश्मि चतुर्वेदी, प्रसाद, सीमा अग्रवाल सहित अनेक शिक्षाविद्, शोधकर्ता एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे। सम्मेलन के दौरान बहुविषयी अनुसंधान, नवाचार तथा समकालीन भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप ज्ञान-सृजन पर व्यापक विमर्श हुआ।
समापन अवसर पर वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत के भविष्य का निर्माण केवल नई तकनीकों के विकास से नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा और आधुनिक अनुसंधान के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने से होगा। सम्मेलन ने भारतीय ज्ञान-दृष्टि, बहुविषयी अनुसंधान और नवाचार के समन्वय के माध्यम से भारत को ज्ञान-प्रधान राष्ट्र के रूप में आगे ले जाने का प्रभावी संदेश दिया।