- एमडीएसयू में राष्ट्रीय वन शहीद दिवस पर संगोष्ठी; खेजड़ली के 363 बलिदानियों को नमन, पर्यावरण संरक्षण को जीवनशैली बनाने का आह्वान
अजमेर। यदि समय रहते जल संरक्षण और पर्यावरण रक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई तो वर्ष 2040 तक गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। आने वाले समय में तापमान 53 से 56 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है। उक्त विचार जल संरक्षण को लेकर गंभीर चेतावनी देते हुए पद्मश्री एवं प्रख्यात पर्यावरणविद् हिम्मत राम भांभू ने राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के अवसर पर महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय (एमडीएसयू), अजमेर के पर्यावरण विज्ञान, वनस्पतिशास्त्र एवं प्राणीशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को चरक भवन में “वन धर्म: भारत के पारिस्थितिक ज्ञान का पुनर्जागरण” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर व्यक्त किये. उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा लगाने और उसे वृक्ष बनाने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि उन्होंने वर्ष 1975 से अब तक करीब सात लाख पौधे लगाए हैं, जिनमें लगभग पांच लाख वृक्ष का रूप ले चुके हैं। भांभू ने कहा कि जीवन में जन्मदाता माता, धरती माता, हरित माता और गौ माता के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। उन्होंने नेपाल में हाल ही हुई हिमानी झील फटने की घटना का उल्लेख करते हुए इसे प्रकृति के असंतुलन की गंभीर चेतावनी बताया। वन्यजीव संरक्षण के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने शिकारियों के विरुद्ध अब तक 28 मुकदमे लड़े हैं, जिनमें 13 शिकारियों को जेल भेजा जा चुका है। उन्होंने पक्षी एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए किए जा रहे अपने प्रयासों का भी उल्लेख किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि भारतीय चिंतन में “मनुष्य प्रकृति के लिए है, प्रकृति मनुष्य के लिए नहीं” का भाव निहित रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में वन केवल पेड़ों का समूह नहीं रहे, बल्कि वे तप, साधना, आराधना, ज्ञान और संस्कृति के केंद्र रहे हैं। उन्होंने महाभारत के खांडव वन का उदाहरण देते हुए भारतीय ग्रंथों में जैव विविधता एवं प्रकृति के महत्व की चर्चा की। उन्होंने कहा कि पश्चिमी दृष्टिकोण में जहां प्रकृति को अक्सर संसाधन और उपभोग की वस्तु के रूप में देखा गया, वहीं भारतीय परंपरा ने मनुष्य को प्रकृति का संरक्षक और सह-अस्तित्व का सहभागी माना। कुलगुरु ने भारतीय आश्रम व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन के उत्तरार्ध को प्रकृति, समाज और आध्यात्मिक चिंतन से जोड़ने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि प्रकृति संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम न मानकर प्रत्येक व्यक्ति की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए।
मुख्य वन संरक्षक महेश चंद गुप्ता ने राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के ऐतिहासिक संदर्भ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्ष 1730 में खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 ग्रामीणों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। उन्होंने बताया कि वर्ष 1985 से अब तक करीब 25 वनकर्मी कर्तव्य-निर्वहन के दौरान शहीद हो चुके हैं। इनमें अधिकांश ने वन्यजीवों की रक्षा करते हुए बलिदान दिया, जबकि हाल के वर्षों में अवैध खनन और बजरी माफिया से जुड़े मामलों में भी वनकर्मियों की जान गई है।
पूर्व कुलपति आचार्य कैलाश चंद्र शर्मा ने खेजड़ी के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में खेजड़ी एक “कीस्टोन स्पीशीज” है। इसके नष्ट होने का प्रभाव केवल एक वृक्ष तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ता है। उन्होंने जैव विविधता एवं जैव-संपदा के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए जैव-चोरी की आशंका से भी आगाह किया।पर्यावरण जागरूकता प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों ने दिखाई रचनात्मकता
कार्यक्रम के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण एवं जागरूकता से संबंधित विभिन्न प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं। पोस्टर प्रतियोगिता में प्रिया बैरवा ने प्रथम, सिद्धि जैन ने द्वितीय तथा यशस्वी सिंह ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।इसी प्रकार निबंध प्रतियोगिता में सिद्धि जैन ने प्रथम, दिव्यांशी सुथार ने द्वितीय तथा चेतना खोरवाल ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
विषय प्रवर्तन पर्यावरण विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. सुब्रोतो दत्ता ने किया तथा आभार ज्ञापन वनस्पतिशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. अरविंद पारीक ने किया | इस अवसर पर कुलसचिव नेहा शर्मा, विभागाध्यक्ष प्रो. सुभाष चंद्र, प्रो ऋतू माथुर, प्रो प्रवीण माथुर, नन्द लाल प्रजापत सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी उपस्थित थे| कार्यक्रम का सञ्चालन डॉ विवेक शर्मा ने किया