अजमेर, 13 अक्टूबर। ग्राहृय परीक्षण केंद्र तबीजी फार्म के उप निदेशक कृषि (शस्य) श्री मनोज कुमार शर्मा ने बताया कि चना जयपुर खंड जोन 3 ए में उगाई जाने वाली रबी की एक प्रमुख दलहनी फसल हैं। वर्तमान में चने की बुवाई का उपयुक्त समय हैं। चने के लिए लवण एवं क्षाररहित, जल निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त रहती हैं। चने की फसल में मृदा उपचार, बीजोपचार कर कीटों एवं रोगों से बचाकर उत्पादन में बढ़ोत्तरी की जा सकती हैं। कृषि रसायनों का उपयोग करते समय पूरे कपड़े, मास्क एवं दस्तानों का उपयोग अवश्य करें।
कृषि अनुसंधान अधिकारी (पौध व्याधि) श्री सुरेंद्र सिंह ताकर ने बताया कि चने की फसल में जड़ गलन, सूखा जड़ गलन एवं उकठा जैसे रोगों का प्रकोप होता हैं। इन रोगों से बचाव हेतु फसल चक्र अवश्य अपनाएं एवं बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा से भूमि उपचार करना चाहिए। भूमि उपचार करने के लिए बुवाई से पूर्व 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा को 100 किलो आद्र्रता युक्त गोबर की खाद में मिलाकर 10-15 दिन छाया में रखें तथा इस मिश्रण को बुवाई के समय प्रति हैक्टेयर की दर से पलेवा करते समय मिट्टी में मिला देवें। साथ ही रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें एवं बीजों को एक ग्राम कार्बेण्डाजिम एवं थाइरम 2.5 ग्राम अथवा 2 ग्राम कार्बाेक्सीन 37.5 प्रतिशत के साथ थाइरम 37.5 प्रतिशत अथवा ट्राइकोडर्मा 10 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।
सहायक कृषि अनुसंधान अधिकारी (कीट) डॉ. सुरेश चौधरी ने बताया कि चने की फसल में कटवर्म एवं वायरवर्म की रोकथाम हेतु क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से आखिरी जुताई से पूर्व भुरकाव करने एवं बीजों को दीमक से बचाव हेतु फिप्रोनिल 5 एससी 10 मिली अथवा इमीडाक्लोप्रिड 600 एफएस का 5 मिली प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करने की सलाह दी।
कृषि अनुसंधान अधिकारी (रसायन) डॉ. कमलेश चौधरी ने बताया कि चने की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए उर्वरकों का उपयोग सही समय पर मृदा परीक्षण सिफारिश के आधार पर उपयुक्त एवं संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। असिंचित क्षेत्रों में 10 किलो नत्रजन और 25 किलो फास्फोरस तथा सिंचित क्षेत्रों में 20 किलो नत्रजन, 40 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से 12-15 सेंटी मीटर की गहराई पर आखिरी जुताई के समय ऊरकर देवें।
श्री रामकरण जाट (शस्य) ने बताया कि चने की सिंचित फसल में खरपतवार नियंत्रण हेतु पेंडीमिथेलीन 30 ईसी की 2.5 लीटर मात्रा अथवा पेंडीमिथेलीन 38.7 सीएस की 1.9 लीटर प्रति हैक्टेयर शाकनाशी को बुवाई के बाद परंतु बीज उगने से पूर्व 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।