अजमेर डेयरी पर कुठाराघात – रामचंद्र चौधरी

मेरे प्रिय किसान और पशुपालक भाइयों-बहनों, पिछले 50 वर्षों से मेरा जीवन, मेरी हर एक सांस और मेरा हर एक पल केवल और केवल आपकी सेवा में बीता है। मैंने अजमेर सरस डेयरी को कभी एक संस्था नहीं माना, बल्कि इसे अपना परिवार माना है। मेरी इसी ईमानदारी, पूर्ण समर्पण और हमारे कठिन परिश्रम का ही परिणाम है कि आज हमारी ‘अजमेर सरस डेयरी’ पूरे भारतवर्ष की प्रमुख डेयरियों में एक गौरवशाली मुकाम पर खड़ी है। मेरे जीवन का अब एक ही सपना है कि आपके सहयोग से अपनी इस डेयरी को ‘डेनमार्क’ की तर्ज पर विश्व का सर्वश्रेष्ठ डेयरी मॉडल बनाऊँ। जो कुछ चापलूस लोग मुझ पर राजनीति चमकाने का आरोप लगा रहे हैं, उन्हें समय खुद जवाब देगा कि मेरा जीवन राजनीति के लिए नहीं, बल्कि केवल मेरे किसान भाइयों की निस्वार्थ सेवा के लिए समर्पित रहा है।  आज अत्यंत भारी मन से मुझे यह कहना पड़ रहा है कि हमारी अपनी डेयरी और आपके हकों पर कुठाराघात किया जा रहा है। इन विषम परिस्थितियों में, आपके हितों की रक्षा के लिए मेरे पास एमडी आरसीडीएफ (श्रीमती श्रुति भारद्वाज) की तानाशाही नीतियों का कड़ा विरोध करने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं बचा है। श्वेत क्रांति के अपने 50 सालों के लंबे सफर में मैंने आज तक ऐसी अपारदर्शी कार्यप्रणाली और नकारात्मक सोच वाली आईएएस (IAS) अधिकारी नहीं देखी है। आजादी के 75 वर्षों के इतिहास में यह अत्यंत शर्मनाक है कि कोई आईएएस अधिकारी अपनी “वसूली” के निजी लक्ष्य पूरे करने के लिए सेवानिवृत्ति के बाद पुनः संविदा पर आकर बैठ जाए।  इनकी इसी हठधर्मिता और किसान-विरोधी नीतियों के कारण आज हमारी अजमेर डेयरी को जानबूझकर करोड़ों रुपये के भारी घाटे में धकेला जा रहा है। मेरे द्वारा बार-बार हाथ जोड़ने और अनुरोध करने के बावजूद, एमडी साहिबा सरस घी की दरें ‘अमूल’ के बराबर नहीं कर रही हैं। आज अमूल का घी हमसे 150 रुपये महंगा है; ऊपर से हम 1 किलो के पैक में 910 ग्राम घी दे रहे हैं जबकि अमूल 810 ग्राम ही दे रहा है, जिससे 50 रुपये का अतिरिक्त अंतर आ जाता है। अमूल का घी हमसे 200 रुपये महंगा बिकने के बावजूद, हम प्रतिमाह 450 मीट्रिक टन घी बेचकर हर महीने 9 करोड़ रुपये का भारी घाटा सह रहे हैं। इसी तरह, व्हाइट बटर (सफेद मक्खन) बनाने में हमारी अजमेर डेयरी पूरे देश में प्रथम स्थान पर है, जिसकी मांग महाकाल उज्जैन सहित कई प्रतिष्ठित डेयरियां कर रही हैं। इसका बाजार भाव 550 रुपये प्रति किलो है और इसे बेचने पर हमारी डेयरी को सीधा 100 रुपये प्रति किलो का मुनाफा हो सकता है, लेकिन एमडी ने पिछले एक साल से इसके बनाने और बेचने पर अघोषित पाबंदी लगा रखी है। इतना ही नहीं, अन्य संघों का जो दूध पाउडर बनने आ रहा है, उसकी लागत 50 रुपये प्रति किलो आती है, लेकिन एमडी द्वारा हमें मात्र 30 रुपये ही दिए जा रहे हैं, जिससे हमारी डेयरी को प्रतिमाह 1 करोड़ रुपये की अलग से हानि हो रही है।  इन गलत नीतियों का सीधा असर हमारे बेजुबान पशुओं और पशुपालकों के जीवन पर पड़ रहा है। अजमेर स्थित कैटल फैक्ट्री द्वारा हमारे पशुपालकों को कभी भी समय पर और पूरा पशु आहार (Cattle Feed) नहीं दिया गया है। हालात इतने खराब हैं कि केवल अजमेर ही नहीं, बल्कि राजस्थान के कई अन्य जिला दुग्ध संघों में भी पशु आहार की भारी किल्लत है और उन्हें आहार नहीं मिल रहा है। इसके कारण हमारे पशुपालक भयंकर पीड़ा से गुजर रहे हैं और बेजुबान पशुओं के दूध उत्पादन में भी लगातार भारी गिरावट आ रही है। इसके अलावा, एमडी की घोर लापरवाही और शिथिलता के कारण, मिड-डे मील (Midday Meal) के 70 करोड़ रुपये और ‘मुख्यमंत्री दुग्ध उत्पादक संबल योजना’ के लगभग 30 करोड़ रुपये आज भी बकाया पड़े हैं। एक तरफ राजस्थान के विभिन्न जिला संघों और आरसीडीएफ में 3000 पद खाली पड़े हैं, परन्तु एमडी के कार्यकाल में एक भी बेरोजगार युवा की भर्ती नहीं की गई है। सबसे अधिक पीड़ादायक यह है कि अजमेर डेयरी के संचालक मंडल ने एलआईसी (LIC) के माध्यम से अपने पशुपालकों के लिए प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये के बीमे का जो जीवनरक्षक प्रस्ताव पास किया था, उसे भी एमडी ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से रोक कर रखा है।  मेरे किसान भाइयों, रामचन्द्र चौधरी जब तक जिंदा है, अजमेर डेयरी और आप पशुपालकों के हितों से किसी को भी खिलवाड़ नहीं करने देगा। यह लड़ाई अब सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि हमारे वजूद, हमारी मेहनत और हमारे बेजुबान पशुओं के हकों की लड़ाई है, जिसे मैं अपनी आखिरी सांस तक पूरी मजबूती से लड़ता रहूँगा।

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