काले धंधों की सफेदी…!!
तारकेश कुमार ओझा बचपन में सुस्वादु भोजन की लालच में ऐसे कई आयोजनों में चले जाना होता था, जहां पेट भरने के बजाय उलटे जलालत झेलनी पड़ती थी। हालांकि इसके विपरीत अनुभव भी जीवन में होते रहे।मनमाफिक मेनू की क्षीण संभावना वाले अनेक आयोजनों में यह सोच कर गया कि बस लिफाफा थमा कर निकल … Read more