कुमार बकवास कि नई कविता
-कोई बंटी समझता है, कोई बबली समझता है। मगर कुर्सी की बैचेनी को, बस “कजरी” समझता है। -मैं कुर्सी से दूर कैसा हूँ, मुझसे कुर्सी दूर कैसी है ! फकत शीला समझती है या मेरा दिल समझता है !! -सत्ता एक अहसासों की पावन सी कहानी है ! कभी शीला दीवानी थी कभी कजरी दीवाना … Read more