क्या प्रशासन ने चैनल गेट खोलने का मौका गंवा दिया?

अब जब कि शहर की ऐतिहासिक आनासागर झील छलक चुकी है, यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि यदि इसे छलकने ही देना था तो फिर क्यों उसे 12 फीट भराव क्षमता के बाद खोलने का विचार बनाने के लिए दुनियाभर की माथापच्ची की थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रशासन चैनल गेट खोलने का उपयुक्त मौका गंवा तो नहीं बैठा है?
आपको ख्याल होगा कि पिछले दिनों जब भारी बारिश के चलते आनासागर में पानी आवक तेज हो गई थी और झील से सटी कॉलोनियों की ओर पानी बढऩे लगा था तो यह विचार उठा था कि क्या इस बार झील के चैनल गेट खोलने की नौबत आई थी। तब शहर के कुछ बुद्धिजीवियों का कहना था कि आनासागर को उसकी जलभराव क्षमता तक भरने देना चाहिए, भले ही इससे इससे सटी कॉलोनियों में थोड़ी परेशानी हो। प्रशासन चाहे तो उसके लिए कोई उपाय करे, मगर चैनल गेट न खोले। उनका तर्क था कि आखिर यह ऐतिहासिक झील की खूबसूरती और शहर की पहचान का सवाल है। जाहिर तौर पर इसका प्रशासन पर दबाव बना और जिला कलेक्टर वैभव गालरिया ने संबंधित अफसरों से सलाह कर तय किया कि कम से कम 12 फीट तक तो चैनल गेट नहीं खोले जाएंगे। उसके बाद की स्थिति की समीक्षा की जाएगी। आखिर वह दिन भी आ गया कि पानी 12 फीट को पार करने लगा। इस पर प्रशासन को दुबारा विचार करना पड़ा कि अब क्या किया जाए? दिक्कत ये थी कि भारी बारिश के कारण एस्केप चैनल में पहले से ही शहर के तीन-चौथाई आबादी इलाके व कैचमेंट क्षेत्र का पानी बह रहा था और निचली बस्तियों में पानी भर गया। ऐसे में जब आनासागर में पानी का स्तर और बढ़ा तो प्रशासन लाचार हो गया। वह अब किसी भी सूरत में चैनल गेट खोलने की रिस्क नहीं उठा सकता था। यदि चैनल खोले जाते तो निचली बस्तियों में तबाही मच जाती।
प्रशासन उधेड़बुन में ही था कि सोमवार को हुई बरसात के बाद पानी 12.8 इंच तक आ गया, जो भराव क्षमता से केवल चार इंच कम था। मंगलवार को बारिश के बाद झील में देर रात तक पानी की आवक होती रही और शाम 5.45 बजे तक चैनल गेट के ऊपर से छह इंच पानी एस्केप चैनल में बहने लगा। रात 8 बजे तक झील का गेज 13.7 इंच हो गया और पानी छलकने लगा। उधर निचली बस्तियों में पानी पहले से भरा हुआ था। ऐसे में प्रशासन के पास कोई चारा न रहा। अब चैनल गेट खोलने अथवा न खोलने पर विचार के कोई मायने ही नहीं रह गए हैं। यहां उल्लेखनीय है कि भूतपूर्व नगर परिषद सभापति स्वर्गीय वीर कुमार ने अपने कार्यकाल में ऐसी नौबत आने पर युक्तिपूर्वक चैलन गेट खोले थे।
इस बारे में शहर जिला भाजपा के प्रतिनिधिमंडल ने अध्यक्ष प्रो. रासासिंह रावत के नेतृत्व में जिला कलेक्टर गालरिया से मिल कर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया है। इसमें आरोप लगाया गया है कि ताजा हालाल के लिए प्रशासन जिम्मेदार है, क्योंकि आनासागर एस्केप चैनल सहित सभी प्रमुख नालों की सफाई की मांग पर ध्यान नहीं दिया। आनासागर के ओवर फ्लो होने पर आपातकालीन स्थितियों में पानी की निकासी के लिये आनासागर एस्केप चैनल बना है। वर्षा आने से पूर्व ही इसकी सम्पूर्ण सफाई तथा इसकी टूटी हुई दिवारों की मरम्मत होनी चाहिये थी, लेकिन इस और ध्यान नही दिया गया। इस कारण बरसात का पानी तेज बहाव के साथ नगर की अनेक निचली बस्तियों व कॉलोनियों में घुस गया। अब जो स्थिति है, उसमें चैनल गेट खोले गये तो अजमेर की स्थिति और बद से बदतर हो जायेगी।
ताजा स्थिति ये यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या कहीं प्रशासन ने चैनल गेट खोलने का उचित मौका तो नहीं गंवा दिया? कुछ लोगों का मानना है कि जब निचली बस्तियों में पहले से ही पानी भरा हुआ है तो चैनल गेट कैसे खोला जा सकता है। उधर कुछ लोगों का मानना है कि सोमवार व मंगलवार की बारिशों के बीच तकरीबन 24 घंटे का समय था, जब कि बारिश थमने के कारण निचली बस्तियों में जमा पानी का स्तर कुछ कम हुआ था। उस वक्त यदि चैनल गेट थोड़े से खोल कर पानी निकाला जाता तो ठीक रहता। मगर प्रशासन ने वह मौका गंवा दिया। अब तो कोई उपाय ही नहीं बचा है। पानी गेज से ऊपर बहने लगा है। झील के ओवर फ्लो होने के बाद खानपुरा तालाब पर इसका सीधा असर पड़ा है। तालाब का गेज 10 फीट तक पहुंच गया है, जबकि तालाब 11 फीट गेज पर ओवर फ्लो हो जाता है। ओवर फ्लो होने के बाद तालाब की नीचे वाले इलाके के गांव दौराई, तबीजी, डूमाड़ा, नदी प्रथम व द्वितीय तथा इसके आगे के गांवों के पास से निकल रही नदी खानपुरा तालाब की वेस्ट वेयर में पानी का बहाव बढ़ जाएगा। इससे वेस्ट वेयर के आस-पास के भराव क्षेत्र में किसी भी प्रकार के निर्माण को हानि पहुंच सकती है।
प्रसंगवश बता दें कि ऐतिहासिक आनासागर झील की चादर पिछले चार दशक में चौथी बार चली है। सन् 1975 में हुई मूसलाधार बरसात के बाद 18 जुलाई 1997 को झील ओवर फ्लो हो गई थी। कई बस्तियां जलमग्न हो जाने से शहर बाढग़्रस्त हो चुका था। यहां उल्लेखनीय है कि उस समय झील की भराव क्षमता आज के मुकाबले तीन फीट अधिक यानि 16 फीट थी। भराव क्षमता तक पानी आने के कारण झील के पेटे में बसे कई आबादी इलाकों में पानी भर गया। प्रशासन ने इसके बाद झील की भराव क्षमता को 13 फीट तक ही सीमित कर दिया। चादर को बंद कर चैनल गेट का निर्माण भी कराया गया। झील दूसरी बार सन् 1979 में अपनी भराव क्षमता तक पहुंची और चादर चली। इसके बाद 18 साल तक झील में पानी की आवक नहीं हो सकी। सन् 1987 में झील लगभग सूख गई और इसमें से मिट्टी निकाली गई। इसी समय झील के बीच टापू का निर्माण भी कराया गया। इसके बाद 25 अगस्त 1997 को शहर में छह इंच बरसात के बाद झील की चादर चली।
-तेजवानी गिरधर

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