अजमेर में पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं

अरावली पर्वतमाला की उपत्यका में बसी ऐतिहासिक अजमेर नगरी की धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक दृष्टि से विशिष्ट पहचान है। जगतपिता ब्रह्मा की यज्ञ स्थली तीर्थराज पुष्कर और महान सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को अपने आंचल में समेटे इस नगरी को पूरे विश्व में सांप्रदायिक सौहाद्र्र की मिसाल के रूप में जाना जाता है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, बौद्ध और आर्य समाज का अनूठा संगम है। यही वजह है कि इसे राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में भी जाना जाता है। पिछले कुछ सालों में नारेली स्थित ज्ञानोदय दिगम्बर जैन तीर्थ स्थल और साईं बाबा मंदिर के निर्माण के साथ ही इसका सांस्कृतिक वैभव और बढ़ा है।
पर्यटन दिवस के मौके पर यहां कुछ ऐसे प्रमुख स्थलों का विवरण दिया जा रहा है, जिन पर हमारा ध्यान कम ही गया है। इन्हें ठीक से विकसित किया जाए तो देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है।
ख्वाजा साहब का चिल्ला
ख्वाजा साहब 1191 ईस्वी में अजमेर आए और आनासागर के पास एक छोटी सी पहाड़ी पर सबसे पहले जिस स्थान पर ठहरे, उसे चिल्ले के नाम से जाना जाता है। यहां ख्वाजा साहब ने वर्षों तक इबादत की। बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन अधिकतर चमत्कार यहीं पर दिखाए। ख्वाजा साहब और अजयपाल जोगी का विवाद भी इसी स्थान हुआ, जिसके अनेक किस्से चर्चित हैं। हिजरी 1037 में दौलत खान ने चिल्ले की दीवार व मस्जिद बनवाई। 1933 में नवाब गुदड़ी शाह बाबा ने चिल्लागाह के ऊपर गुम्बद बनवाया। इस्लामी शैली में इसे वहदानियत (अद्वैतवाद) का प्रतीक माना जाता है।
अढ़ाई दिन का झौंपड़ा
दरगाह के सिर्फ एक किलोमीटर फासले पर स्थित अढ़ाई दिन का झौंपड़ा मूलत: एक संस्कृत विद्यालय, सरस्वती कंठाभरण था। अजमेर के पूर्ववर्ती राजा अरणोराज के उत्तराधिकारी विग्रहराज तृतीय ने इसका निर्माण करवाया था। सन् 1192 में मोहम्मद गौरी ने इसे गिराकर कर मात्र ढ़ाई दिन में बनवा दिया। बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे मस्जिद का रूप दे दिया। मराठा काल में यहां पंजाबशाह बाबा का ढ़ाई दिन का उर्स भी लगता था। कदाचित इन दोनों कारणों से इसे अढ़ाई दिन का झौंपड़ा कहा जाता है। दरगाह शरीफ से कुछ ही दूरी पर स्थित यह इमारत हिंदू-मुस्लिम स्थापत्य कला का नायाब नमूना है। सात मेहराबों से युक्त सत्तर स्तम्भों पर खड़े इस झौंपड़े की बारीक कारीगरी बेजोड़ है। छत पर भी बेहतरीन कारीगरी है। यहां बनी दीर्घाओं में खंडित मूर्तियां और मंदिर के अवशेष रखे हैं।
फॉयसागर झील
शहर से करीब छह किलोमीटर दूर बनी यह कृत्रिम झील शहरवासियों का सबसे करीबी और पसंदीदा पिकनिक स्थल है। इसका निर्माण सन् 1891-92 के अकाल राहत कार्यों के दौरान बांडी नदी के भराव क्षेत्र में इंजीनियर फॉय की देखरेख में हुआ था। उस जमाने में इस पर करीब 2 लाख 69 हजार रुपए की लागत आई। झील की गहराई 24 फीट है। बारिश के दिनों में यहां की प्राकृतिक छटा निखर जाती है। इससे पानी ओवर फ्लो हो कर आनासागर में आता है।
चामुंडा माता का मंदिर
यह भारत के 151 शक्तिपीठ में से एक है। फायसागर रोड पर चश्मे की गाल पहाड़ी के पश्चिमी ढ़लान पर यह मंदिर बना हुआ है। चामुंडा माता सम्राट पृथ्वीराज चाहौन की आराध्य देवी थी। यहां नवरात्रि के दौरान बली चढ़ाई जाती है। सावन शुक्ला अष्ठमी को यहां मेला भरता है।
हैप्पी वैली
तारागढ़ के पश्चिम में स्थित गहरी घाटी में मीठे पानी का चश्मा बहता है, इसे हैप्पी वैली के नाम से जाना जाता है। इस घाटी के प्रवेश मार्ग पर बादशाह जहांगीर ने नूर महल बनवाया था। इसे आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
चश्मा-ए-नूर
तारागढ़ की तलहटी में स्थित यह एक ऐसी प्राकृतिक जगह है, जहां पैदल ही जाया जा सकता है। बादशाह जहांगीर यहां करीब सत्रह मर्तबा गया था। यहां बाग-बगीचे के अतिरिक्त एक कुंड भी था, जिसमें नूरजहां गुलाब की पंखुडिय़ों से स्नान किया करती थी। कहा जाता है कि नूरजहां ने यहीं गुलाब के इत्र का अविष्कार किया था। अंग्रेज इस स्थान को हैप्पी-वैली कहा करते थे।
बादशाही बिल्डिंग
नया बाजार स्थित यह भवन मूलत: किसी हिंदू का था, जिसको अकबर के जमाने में उनके मातहतों के लिए आवास के रूप में उपयोग किया गया। मराठा काल में यहां पर कचहरी थी। वर्तमान में यह उपेक्षा के कारण जुआरियों व नशाखोरों का अड्डा बना हुआ है।
खोबरानाथ भैंरू जी का मंदिर
यह ऋषि घाटी के दाहिनी तरफ व पुष्कर रोड संपर्क सड़क पर स्थित है। मान्यता है कि यहां जल्द शादी के इच्छुक युवक-युवतियां मनौती मांगते हैं। कायस्थ समाज के लोगों में इसकी विशेष मान्यता है। इस समाज के नवविवाहित जोड़े यहां मत्था टेकने जरूर आते हैं। समाज के वरिष्ठ वकील अनिल नाग के प्रयासों से इसकी बेहतर देखभाल की जा रही है। यह एक अच्छा सन सेट पाइंट भी है।
नौसर माता का मंदिर
पुष्कर घाटी में स्थित नौसर माता के मंदिर की काफी मान्यता है। यहां हर साल नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना होती है।
बाबा बैजनाथ
भगवान शंकर के इस प्राचीन मंदिर को बैजनाथ ज्योतिर्लिंग की मान्यता है। बारिश के दिनों में यहां लोग पिकनिक को पहुंच जाते हैं।
अजयपाल
पुष्कर में सृष्टि यज्ञ के समय प्रजापिता ब्रह्मा ने भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए जो चार शिवलिंग स्थापित किए थे, उनमें एक अजगंध महादेव यहां प्रतिष्ठित किया था। कदाचित इस अज नाम से ही अजयसर गांव बसा। बारहवीं सदी में चौहान राजा अर्णोराज ने यहां एक शिव मंदिर बनवाया था, जो कि आज भी मौजूद है। इसी कारण यह स्थान अजयपाल बाबा के नाम से जाना जाने लगा। पौराणिक मान्यता के अनुसार अजयसर गांव के पास स्थित इस स्थान पर भगवान शंकर ने बकरे का रूप धारण कर वाष्कलि राक्षस का वध किया था। इसे अजोगंध महादेव भी कहते हैं। माना जाता है कि चौहान राजा अजयपाल ने छठी-सातवीं शताब्दी में इसका निर्माण करवाया। उसने उम्र के आखिरी यहीं पर संन्यास धारण कर बिताये थे। हालांकि कुछ लोग उसे गुर्जर जाति का सिद्ध तांत्रिक मानते हैं, जो कि हिंदुओं की रक्षा करता था। यह स्थान पिकनिक स्पॉट के रूप में भी जाना जाता है। इसके नीचे रूठी रानी का महल है। जहांगीर की बेगम नूरजहां रूठ कर यहां आ गई थी, जिसे मनाने के लिए जहांगीर 27 बार आया।
भिनाय कोठी
इस स्थान पर सन् 1883 में स्वामी दयानंद सरस्वती को उनके निजी रसोइये ने भोजन में जहर मिला कर दे दिया था। स्वामी जी ने यहीं अपना शरीर त्याग दिया था। स्वामीजी का अंतिम संस्कार पहाडग़ंज स्थित श्मशान स्थल पर किया गया था, जिसे दयानंद निर्वाण स्थली के रूप में जाना जाता है। स्वामी जी द्वारा हस्तलिखित लगभग 18 हजार पृष्ठों की पांडुलिपियां केसरगंज स्थित परोपकारिणी सभा भवन में संग्रहित हैं।
दाहरसेन स्मारक
सन् 621 में सिंध (अब पाकिस्तान में) के अंतिम हिंदू सम्राट पराक्रमी सिंधुपति महाराजा दाहरसेन की स्मृति में सन् 1997 में इसका निर्माण पुष्कर रोड पर कोटड़ा आवासीय योजना में हरिभाऊ उपाध्याय नगर (विस्तार) में नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष श्री औंकारसिंह लखावत के विशेष प्रयासों से हुआ। इसका लोकार्पण तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। इसमें राजा दाहरसेन, शहीद हेमू कालानी, विवेकानंद आदि की मूर्तियां हैं। हिंगलाज माता का छोटा मंदिर भी इसी प्रांगण में है। भाजपा शासनकाल में शिक्षा राज्यमंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, नगर सुधार न्यास अध्यक्ष श्री धर्मेश जैन व सांसद प्रो. रासासिंह रावत के प्रयासों से यहां राजा दाहरसेन की तांबे की विशाल मूर्ति भी स्थापित की गई है।
सावित्री मंदिर
पुष्कर में रत्नागिरी पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में बारे तथ्य यह बताया जाता है कि ब्रह्माजी द्वारा गायत्री को पत्नी बना कर यज्ञ करने से रुष्ठ सावित्री ने वहां मौजूद देवी-देवताओं को श्राप देने के बाद इस पहाड़ी पर आ कर बैठ गई, ताकि उन्हें यज्ञ के गाजे-बाजे की आवाज नहीं सुनाई दे। बताते हैं कि वे यहीं समा गईं। मौजूदा मंदिर का निर्माण मारवाड़ के राजा अजीत सिंह के पुरोहित ने 1687-1728 ईस्वी में करवाया था। मंदिर का विस्तार डीडवाना के बांगड़ घराने ने करवाया। सावित्री माता बंगालियों के लिए सुहाग की देवी मानी जाती है। ऐसा इस वजह से कि ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री का अंशावतार सत्यवान सावित्री को माना जाता है।
निम्बार्क तीर्थ, सलेमाबाद
रूपनगढ़ के पास किशनगढ़ से लगभग 19 किलोमीटर दूर सलेमाबाद गांव में निम्बार्काचार्य संप्रदाय की पीठ ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि बहुत महत्वपूर्ण है। यहां भगवान सर्वेश्वर की मूर्ति पूजनीय है। वस्तुत: वैष्णव चतुर्सम्प्रदाय में श्री निम्बार्क सम्प्रदाय का अपना विशिष्ट स्थान है। माना जाता है कि न केवल वैष्णव सम्प्रदाय अपितु शैव सम्प्रदाय प्रवर्तक जगद्गुरु आदि श्री शंकराचार्य से भी यह पूर्ववर्ती है। इस सम्प्रदाय के आद्याचार्य श्री भगवन्निम्बार्काचार्य हैं। आपकी सम्प्रदाय परंपरा चौबीस अवतारों में श्री हंसावतार से शुरू होती है। भगवान श्री निम्बार्काचार्य का प्राकट्य युधिष्ठिर शके 6 में दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश के वैदुर्यपंतनमुंजी में गोदावरी तटवर्ती श्रमणाश्रम में हुआ। अल्प वय में ही वे उत्तर भारत के ब्रज मंडल स्थित गिरिराज गोवर्धन की सुरम्य उपत्यका में आ गए। वहीं उनको देवर्षि नारद मुनि से वैष्णवी दीक्षा के साथ सूक्ष्म दक्षिणवर्ती चक्रांकित शालग्राम स्वरूप श्री सनकादि संसेवित श्री सर्वेश्वर प्रभु की अनुपम सेवा प्राप्त हुई। (यही सेवा अद्यावधि अखिल भारतीय श्री निम्बार्काचार्य पीठ, सलेमाबाद में आचार्य परंपरा से सम्प्रति परिसंवित है। विश्व में इतनी प्राचीन व सूक्ष्म श्री शालग्राम स्वरूप और कहीं भी नहीं है। जब भी आचार्यश्री धर्म प्रचार अथवा भक्तों के आग्रह पर कहीं जाते हैं तो यह सेवा उनके साथ ही रहती है।) एक बार श्री निम्बार्काचार्य ने अपने आश्रम में दिवामोजी दंडी महात्मा के रूप में आए ब्रह्माजी को रात्री हो जाने के कारण भोजन से निषेध करते देख नीम वृक्ष पर अपने तेज तत्त्व श्रीसुदर्शनचक्र को आह्वान कर सूर्य रूप में दर्शन करवा कर भोजन कराया। निम्ब (नीम) पर सूर्य (अर्क) के दर्शन करवाने के कारण ब्रह्माजी ने उन्हें श्री निम्बार्क नाम से संबोधित किया। उन्हीं की आचार्य परंपरा में श्री परशुराम देवाचार्य महाराज ने सलेमाबाद में अखिल भारतीय श्री निम्बार्काचार्य पीठ की स्थापना की।
कल्पवृक्ष, मांगलियावास
अजमेर शहर से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर ब्यावर मार्ग पर मांगलियावास गांव में स्थित कल्पवृक्ष की बहुत मान्यता है। बताया जाता है कि यह ऐतिहासिक है। उसके पास हरियाली अमवस्या के दिन विशाल मेला भरता है। यहां कल्पवृक्ष नर, नारी व राजकुमार के रूप में मौजूद है।
वराह मंदिर, बघेरा
अजमेर से लगभग 80 किलोमीटर दूर बघेरा गांव में वराह तालाब पर स्थित वराह मंदिर पुरातात्वि और स्थापत्य की दृष्टि से काफी महत्पपूर्ण है। कहते हैं कि मंदिर में स्थित मूर्ति भीतर से पोली है और कोई वस्तु टकराने पर मूर्ति गूंजती है। मुस्लिम आक्रमणकारियों के हमले के दौरान इसे तालाब में छिपा दिया गया। आक्रमणकारियों ने मंदिर तोड़ दिया। बाद में मूर्ति को वापस बाहर निकाल कर नए मंदिर में उसकी प्रतिष्ठा की गई। हाल के कुछ वर्षों में यहां खुदाई में निकली प्राचीन जैन मूर्तियों से इस गांव का पुरातात्विक महत्व और बढ़ा है। जैन तीर्थङ्करों के अतिरिक्त यहां से विष्णु, शिव, गणेश आदि देवताओं की प्रतिमायें भी प्राप्त हुई हैं, जिनमें से कुछ राजकीय संग्रहालय अजमेर में प्रदर्शित हैं। बघेरा का पुराना नाम व्याघ्ररक है।
मसाणिया भैरवधाम, राजगढ़
अजमेर शहर से दक्षिण दिशा में लगभग 22 किलोमीटर दूर और नसीराबाद से उत्तर-पश्चिम दिशा में 14 किलोमीटर दूर स्थित राजगढ़ गांव में स्थापित श्री मसाणिया भैरवधाम की बड़ी महिमा है। इस गांव का इतिहास काफी पुराना है। गांव के आसपास की पहाडिय़ों में एस्बेसटॉस, क्वार्ट्ज व फेल्सपार के प्रचुर भंडार हैं। कुछ खानों से पन्ना भी निकलता है। करीब पांच सौ साल पुराने इस गांव में चारों ओर परकोटा है और पहाड़ी पर स्थित किया ऐतिहासिकता की झलक देता है। वस्तुत: यह गांव गौड़ राजपूत शासकों की रियासत रही है। करीब 220 गांव इसके अधीन थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार गांव को श्री विट्ठलदास ने अपने प्रपौत्र राजसिंह के नाम पर बसाया था। प्रदेश के कल्याणजी के तीन में एक मंदिर इस गांव में है, जहां हर शरद पूर्णिमा पर मेला भरता है। यह गांव वर्तमान में श्री मसाणिया भैरवधाम और उसके मुख्य उपासक श्री चंपालाल जी महाराज के कारण विख्यात है। वर्तमान में यह गांव यहीं पर मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे श्री चम्पालाल जी महाराज की ओर से की जा रही मानव सेवा के कारण जाना जाता है।
रानीजी का कुंड, सरवाड़
सरवाड़ में तहसील दफ्तर के पास बना खूबसूरत रानीजी का कुंड पांच सौ साल पहले गौड़ राजपूतों के शासनकाल में किसी रानी ने बनवाया था। इसकी शिल्पकला बेहतरीन है। यह काफी गहरा है और सीढिय़ों के नीचे नहाने के लिए चौकियां बनी हुई हैं। यहां बरामदे में खूबसूरत झरोखे, मेहराबदार छज्जे व तोरणद्वार हैं। कुंड के पास ही दो छतरियां बनी हुई हैं, जिनमें से एक ऋषि दत्तात्रेय की बताई जाती है।
खोड़ा गणेशजी का मंदिर
अजमेर से किशनढ़ के बीच एक मार्ग खोड़ा गांव की ओर जाता है। यह मंदिर वहीं पर स्थित है और इसकी बहुत मान्यता है। अजमेर व किशनगढ़ सहित आसपास के लोग यहां अपनी मनौती पूरी होने पर सवा मनी आदि चढ़ाते हैं। कई श्रद्धालु नया वाहन खरीदने पर सबसे पहले यहां आ कर गणेश जी को धोक दिलवाते हैं।           -तेजवानी गिरधर

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